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समय पर गीत

समय अनुभव का सातत्य

है, जिसमें घटनाएँ भविष्य से वर्तमान में गुज़रती हुई भूत की ओर गमन करती हैं। धर्म, दर्शन और विज्ञान में समय प्रमुख अध्ययन का विषय रहा है। भारतीय दर्शन में ब्रह्मांड के लगातार सृजन, विनाश और पुनर्सृजन के कालचक्र से गुज़रते रहने की परिकल्पना की गई है। प्रस्तुत चयन में समय विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।

समय का पहिया

गोरख पांडेय

तरकुल के छाँव में

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

समय कहैए, समय सुनैए

मार्कण्डेय प्रवासी

दुपहरियाक रौदमे

गंगेश गुंजन

गामकेँ प्रणाम

गंगेश गुंजन

आँजुर भरि कचनारक फूल

मार्कण्डेय प्रवासी

लौ जरे अविरल हो...

अशोक द्विवेदी

घाटी बना रहल छी

मार्कण्डेय प्रवासी

ऐसा कुछ भी दिखा नहीं

अंकित काव्यांश

नुका रहल अछि चान

मार्कण्डेय प्रवासी

दर्द

रमाकान्त मुकुल

समय कइसन आ गइल

रमाकान्त मुकुल

व्यर्थ बाँग देलक मुर्गा

मार्कण्डेय प्रवासी

जीवन जे कहि रहल

गंगेश गुंजन

मन काहे विकल भइल

रमाकान्त मुकुल

मर गईं संवेदनाएँ

अंकित काव्यांश

एक इहो दिन

शान्ति सुमन

समय के अहेरिया

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

ये कैसी दोपहरी है

अन्नू रिज़वी

एक-दू-तीन

शान्ति सुमन

का हो गइल

तैयब हुसैन पीड़ित

आज

नरेंद्र शर्मा

यह भी बीत जाएगा, बंधु!

राघवेंद्र शुक्ल

सभ दिन होत न एक समान

महेन्द्र मिसिर

क्षणों के फूल

शंभुनाथ सिंह

कितना पानी

चित्रांश वाघमारे

थक गया है दोपहर

राघवेंद्र शुक्ल

रेत भर गई है आँखों में

विनोद श्रीवास्तव