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रांगेय राघव

1923 - 1962 | आगरा, उत्तर प्रदेश

प्रगतिशील कथाकार। कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना, अनुवाद आदि गद्य विधाओं के साथ-साथ पद्य लेखन में भी प्रवीण। 'मुर्दों का टीला' ख्याति का मूल आधार।

प्रगतिशील कथाकार। कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना, अनुवाद आदि गद्य विधाओं के साथ-साथ पद्य लेखन में भी प्रवीण। 'मुर्दों का टीला' ख्याति का मूल आधार।

रांगेय राघव के उद्धरण

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स्त्री की बुद्धि चंचल और विनाशकारी होती है।

ईसा की वाणी में भारतीय चिंतन ही बोला था, यूरोप में उस वाणी की कोई परंपरा ही नहीं थी। इराक़ तक फैले हुए बौद्ध, शैव और वैष्णव चिंतनों का दर्शन ही उसकी पृष्ठभूमि में था।

स्त्री में दो ही चमत्कार हैं, प्रजनन और हृदय।

प्रेम और स्नेह की ज्योति स्त्री के कारण जीवित है।

तुम संन्यासिनी बनो, ताकि यौन जीवन से विरक्ति दिखाकर लोगों को प्रभावित कर सको। तुम वेश्या बनो कि उसी के बल पर जियो।

भारतीय इतिहास अत्यंत दुर्गम है। इसका शोध केवल इतिहास का विवेचन नहीं है, वह मनुष्य की समस्त वासनाओं और अपूर्णता तथा पूर्णताओं के क्रमिक विकास का अध्ययन है, जो बाह्य रूप में सभ्यता है ओर आंतरिक रूप में अध्यात्म की उन्नति है।

प्रेम से प्रेम करने वाली आँख का पानी जब घास पर पड़ता है तो ओस का हीरा बनकर चमकता है, जब इंसान पर ज़ुल्म देखा है तो अँगारा बन कर गिरता है, जब दर्द देखकर गिरता है तो लहू की बूंद बनकर, और जब इंसान को भूखा देखता है तो वह गेहूँ बन जाता है। और नफ़रत से प्रेम करने वाली आँखों का पानी जब घास पर पड़ता है तो घास झुलस जाती है, जब इंसान पर ज़ुल्म देखता है तो उसमें बर्फ़ की-सी बे-दिल ठंडक जाती है, जब दर्द देखकर गिरता है तो बंदूक़ की गोली बनकर और जब इंसान को भूखा देखता है तो वह ग़ुलामी का दस्तावेज़ बन जाता है।

राणा प्रताप का चरित्र एक भावावेश नहीं है, वह तो एक कुशल राजनीतिज्ञ देशभक्त है, जिसने अपने उद्देश्य को अपने जीवन से ऊँचा रखा है।

यश तो अहं की तृप्ति है।

दुःख सत्य नहीं है, दुःख की प्रतीति सत्य है।

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मृत्यु मनुष्य की पराजय नहीं, पराजय है उसका मृत्यु से डरना।

आँधी से भी भयानक होती है रक्त की वह हलचल जिसे मनुष्य ने प्रेम की संज्ञा दी हैं।

ईमानदारी वैभव का मुँह नहीं देखती, वह तो मेहनत के पालने पर किलकारियाँ मारती है और संतोष पिता की तरह उसे देखकर तृप्त हुआ करता है।

स्त्री मूलतः स्त्री की शत्रु होती है।

पिंजरा तो सोने का होने पर भी पिंजरा ही रहेगा।

भारतीय संस्कृति सदियों से कहती रही है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसकी सम्पत्ति है।

मुसलमानों का भारतीयकरण नहीं, बल्कि मुल्लावर्ग की विदेशों से प्रेरणा लेकर अपने को विदेशी समझने की भावना और उच्च मुस्लिम वर्ग के ईरानी संस्कृति के उस प्रेम का (जो कि देशी जनता को संस्कृति से सदैव दूर रहने की चेष्टा करता है और भारतीय इतिहास की प्राचीनता और उसकी मानववादी परंपराओं से प्रेरणा नहीं लेता) भारतीयकरण होना चाहिए, क्योंकि यह दोनों धर्म के नाम पर विभिन्न जातीयताओं में बँटी मुस्लिम जनता को ग़लत मार्ग पर चलाकर अपने सामंतीय स्वार्थों को जीवित रखते आए है।

मेहनत से धरती जो देती है, वह सोना बनता है।

जो औरों के लिए रोते हैं, उनके आँसू भी हीरों की चमक को हरा देते हैं।

जीवित का अर्थ खड़ा रहना नहीं, चलते रहना है।

जिन बातों को मनुष्य भूल जाना चाहता है, वही उसे बार-बार क्यों याद आती हैं? क्या मनुष्य का अतीत एक वह भयानक पिशाच है जो उसके भविष्य में वर्तमान का पत्थर बनकर पड़ा रहता है?

काव्य जीवन है, जीवन की नकल नहीं। जीवन प्रेम और प्रगति है, सौहार्द है।

जिस समाज में व्यक्ति को पूर्ण विकास का अवसर मिलता है, वहाँ उसके अंतर्द्वन्द्व भी कम होते जाते हैं।

प्रगतिशील चिंतन मनुष्य की इस मूल स्वतंत्रता को चाहता है कि व्यक्ति स्वतंत्र हो। व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता उसके समाज की स्वतंत्रता है, और स्वतंत्र समाज में स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास की क्षमता प्राप्त करना है।

नवीनता यदि अपना रूप पुराने से जोड़ नहीं पाती, तो उसका जनजीवन से संबंध स्थापित नहीं हो पाता।

साहित्य का ऐतिहासिक यथार्थवाद है—प्रत्येक युग में वास्तविकता को ढूँढ़ना। समाज के सम्बन्धों को ठीक तरह से देखना, निष्पक्ष रहना

आनंद वहीं तक सीमित है, जहाँ वह अन्य पर हावी होकर उनकी स्वतंत्रा का हनन नहीं करता। व्यक्ति के आनंद का संकोच यह नहीं है कि वह दूसरों के आनंद की तनिक भी चिंता नहीं करता।

संसार का श्रेष्ठ साहित्य, मनुष्य जीवन की गहराइयों को मापने में समर्थ हुआ है।

जिसमें समाज की गतिविधि में संवेदनात्मकता अधिक बढ़ जाती है, वही कवि हो जाता है और कवि का छोटा होना, बड़ा होना भी इसी संवेदनात्मक ग्राह्य शक्ति पर निर्भर होता है।

भारत में निरंकुशता को काव्य ने कभी अच्छा नहीं कहा। यह सत्य है कि कहीं-कहीं वर्ग स्वार्थ की रक्षा की प्रशस्ति मिलती है, किंतु बहुतायत में ऐसा नहीं होता। इसका कारण यह है कि सामंतीय व्यवस्था में भी मनुष्य का मनुष्य से संबंध रहता था

हमारी संस्कृति इस बात का साक्ष्य प्रदान करती है कि जब समाज कोई नया रूप धारण करता है, तब पहले उस परिवर्तन के अनुरूप ही पुरानी परंपरा को नया रूप देकर प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।

व्यक्ति के समस्त साधन जब उसे किसी शांति की ओर ले जाते हैं, तब उसका एकांतिक हो जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है

काव्य किसी विशेष दृष्टिकोण का प्रचार नहीं है। वह स्वतः सिद्ध आनन्द है, जिससे लाभ हो या हो, वह स्वयंपूर्ण है। वह तो एक अमूर्त काल्पनिक स्वायत्त गरिमा है, जिसकी अक्षुण्णता को किसी भी प्रकार की चुनौती नहीं दी जा सकती

कला उस जीवन का बालरूप है, जो जीवन से निचले स्तर की वस्तु है। वह अपने आपके लिए नहीं है, जीवन के लिये है। शास्त्र और भी निचले स्तर की वस्तु है, जो कि उपयुक्त दोनों की व्याख्या ही कहला सकता है—यह इन दोनों का स्थान नहीं ले सकता

एक का प्रेय यदि दूसरे के प्रेय का हनन करता है, तब तो निश्चय ही एक ऐसी मर्यादा की आवश्यकता पड़ेगी; जो किसी सीमा के निर्धारण में अपनी-अपनी स्वतंत्रता का संरक्षण बन सके, अन्यथा उसका तो विकास ही संभव नहीं हो सकेगा।

कला मनुष्य की सामूहिक क्रियाओं की वह अनुभूमि है, जो उसके अपने सुख-दुःख, श्रम को हल्का करने के लिए बनाई थी।

शास्त्र याद की व्याख्या मात्र है, जिसे पुराने अनुभवों का संचय कह सकते हैं।

विज्ञान का सत्य शीघ्र बदलता है, काव्य का सत्य उतनी शीघ्र नहीं बदलता; क्योंकि काव्य का मानव के अन्तःस्थ जगत से संबंध है और विज्ञान का जगत के बाह्यरूपों से।

प्रतिभा का अभाव ही भाषा की वैशाखियों पर अधिक से अधिक निर्भर होता है।

व्यक्ति वह नहीं है; जो ऐसा है कि उस जैसा और संसार में कोई है ही नहीं—व्यक्ति एक प्रतिनिधि है

प्रेय वहाँ तक श्लाघ्य है, जहाँ तक स्वातन्त्र्य के नाम पर उसमें अनर्गलता प्रारंभ नहीं होती, वह जो कि अंततोगत्वा व्यक्ति-वैचित्र्य की भी निकृष्ट कोटि में परिगणित नहीं होती।

कला काव्य के भावोद्रेक के बाद अपने आप अनुसरण करती है।

किसी भी युग का काव्य तब ही जनमानस में उतरता है, जब वह जीवन का सांगोपांग चित्रण करता है। सृष्टि की मूल समस्या, समाज की व्यवस्था, प्रकृति, व्यक्ति, और समस्त वस्तुओं का चित्रण साहित्य का अधिकार है। इन सब का चित्रण जब भावपक्ष से सानिध्य स्थापित करता है, तब ही वह काव्य है।

व्यक्ति का पूर्ण महत्त्व स्वीकार करते हुए भी; भारतीय चिंतन ने उसी व्यक्ति को अधिक ऊँचा माना है, जो अपने जीवन को समाज के लिए ही अर्पित कर देता है।

जब काव्य समाज के प्रति उत्तरदायित्व नहीं रखता, वह किसी मतवाद के प्रति उत्तरदायी हो जाता है, तब उसका धर्म के ‘मूल’ अर्थ से तादात्य नहीं रहता और इस प्रकार जन-जीवन से भी संबंध छूट जाता है।

जब प्रतिभा अपनी व्यक्तिपरकता में इतनी डूब जाती है कि उसका समाज से संबंध विच्छिन्न हो जाता है, तब उसका स्रोत सूख जाता है और उसका विस्तार भी रुक जाता है।

कला का विकास प्रतिभा ही करती है। जहाँ प्रतिमा का अभाव होता है, वहाँ कला उतनी क्रियाशील नहीं रहती।

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महाकवियों की तो कला चेरी होती है, जब कि मध्यम कोटि के कवियों के लिए वह सहायक दिखाई देती है। निम्न कोटि के कवियों को तो शास्त्र का आधार लेकर ही जीवित रहना पड़ता है।

महान् कला वही है, जिसमें प्रगति का बीज है।

मनुष्य समाज का कल्याण युद्ध से नहीं, शांति से है। मनुष्य की विजय रूप से है, ज्ञान से, शौर्य से—वह उसके सत्य से है।

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