महावीर के उद्धरण
आठ बातों से मनुष्य शिक्षित कहलाता है: हर समय हँसने वाला न हो, सतत इंद्रिय-निग्रही हो, मर्मान्तक वचन न कहता हो, सुशील हो, दुराचारी न हो, रसलोलुप न हो, सत्य में रत हो, क्रोधी न हो, शांत हो—वह शिक्षित है।
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पाँच इंद्रियों, क्रोध, मान, माया, लोभ और सबसे अधिक दुर्जय अपनी आत्मा को जीतना चाहिए। एक आत्मा के जीत लेने पर सब कुछ जीत लिया जाता है।
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जो स्वयं प्राणियों की हिंसा करता है, दूसरो से हिंसा कराता है और हिंसा करने वालों का अनुमोदन करता है, वह संसार में अपने लिए बैर ही बढ़ाता है।
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जो वीर दुर्जय संग्राम में लाखों योद्धाओं को जीतता है, यदि वह एक अपनी आत्मा को जीत ले, तो यह उसकी सर्वश्रेष्ठ विजय है।
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धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। धर्म का अर्थ है—अहिंसा, संयम और तप। जिसका मन सदा धर्म में लगा रहता है, देवता भी उसे नमस्कार करते हैं।
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शांति से क्रोष को जीतो, नम्रता से अभिमान को जीतो, सरलता से माया का नाश करो और संतोष से लोभ को वश में करो।
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जो भाषा कठोर हो; दूसरों को दुःखकर हो, भले ही वह सत्य क्यों न हो—नही बोलनी चाहिए, क्योंकि उससे पाप होता है।
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किसी भी प्राणी की हिंसा न करे, अदत्त (बिना दी हुई) वस्तु न ले, विश्वासघात करने वाले वचन न बोले—यह आत्म-निग्रही पुरुषों का धर्म है।
सब जीव जीना चाहते हैं, कोई भी मरना नहीं चाहता। इसीलिए निर्ग्रंथ प्राणि-वध का सर्वथा परित्याग करते तथा कराते हैं।
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चरित्र की बड़े यत्न से रक्षा करनी चाहिए, धन तो सदैव आता-जाता रहता है। धन से हीन; हीन नहीं कहलाता, लेकिन चरित्र से स्खलित का तो सर्वनाश ही हो जाता है।
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यदि ज्ञानी; मन और इंद्रियों से छुटकारा पा जाए, तो उसे किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं। यदि राग का प्रवाह रुक जाए, तो आत्म-दर्शन सहज ही हो जाता है।
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कुशा की नोकपर स्थित; ओस की बूँद की तरह मानव-जीवन भी क्षण-स्थायी है, इसलिए क्षणमात्र भी प्रमाद मत करो।
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क्रोध प्रीति का नाश करता है, मान विनय का नाश करता है, माया मित्रता को समाप्त कर देती है और लोभ सभी सद्गुणों का नाश कर देता है।
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जिस तरह मन विषयों में रमता है, उसी तरह यदि आत्म-साक्षात्कार करने में रमे तो, हे योगीजन! जीव शीघ्र ही निर्वाण पा जाए।
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क्रोध मत करो, मान मत करो, माया मत करो और लोभ मत करो; और क्योंकि ये चारों ही आत्मा का अहित करते हैं—अतः इन्हें सदा के लिए छोड़ दो।
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