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महावीर की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 9

जो स्वयं प्राणियों की हिंसा करता है, दूसरो से हिंसा कराता है और हिंसा करने वालों का अनुमोदन करता है, वह संसार में अपने लिए बैर ही बढ़ाता है।

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शांति से क्रोष को जीतो, नम्रता से अभिमान को जीतो, सरलता से माया का नाश करो और संतोष से लोभ को वश में करो।

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धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। धर्म का अर्थ है—अहिंसा, संयम और तप। जिसका मन सदा धर्म में लगा रहता है, देवता भी उसे नमस्कार करते हैं।

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किसी भी प्राणी की हिंसा करे, अदत्त (बिना दी हुई) वस्तु ले, विश्वासघात करने वाले वचन बोले—यह आत्म-निग्रही पुरुषों का धर्म है।

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सब जीव जीना चाहते हैं, कोई भी मरना नहीं चाहता। इसीलिए निर्ग्रंथ प्राणि-वध का सर्वथा परित्याग करते तथा कराते हैं।

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