पार्टनर, तुम्हारी प्राथमिकता क्या है?
पंकज विश्वजीत
16 जुलाई 2026
प्राथमिकताएँ न तय कर पाने का संकट जीवन में निरंतर बना रहा है। इससे जूझना मानव की नियति ही रही है। यूँ कहें कि मनुष्य की विवशता ही उसकी नियति है। इधर बीच का जीवन, जो आधा पक चुका है—उसे किस शीतगृह में रख दूँ, किस जुगत में लगा दूँ, किस खेत में बो दूँ कि अगले कुछ साल तक यह और जीवित रह जाए। जीवन आलू भी नहीं कि यों रख भर ही देने से अँखुआ आए या शायद जीवन आलू ही हो गया है जो अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर पा रहा है। ना यह सरल ही बन पाया और न ही जटिल—यह जो बन चुका है उसका नाम भी नहीं सूझता। विचार करने का अभ्यस्त यह जीवन अब बैठकर सोचने लगा है। सोचना तो सोचना भर ही होता है, उससे हल कहाँ निकलता। तो यह जीवन अब बस सोच रहा है, क्या सोच रहा है—कुछ तो। कुछ क्या? कुछ सोच रहा है। सोचते ही जा रहा है—ये भी, वो भी, जो भी, सबकुछ, पर प्राथमिकता? संकट, संकट, संकट...
इसी संकट में जीते हुए, इस संकट से उबरने का क्रम अनवरत लेकिन बार-बार वही गच्चा और वही सवाल कि क्या यह संकट सिर्फ़ मेरा ही व्यक्तिगत है या इसमें कहीं सर्वभौमिकता की बू है। अपने निकट बैठे बैचमेट से मैं कितना अलग सोच सकता हूँ या मेरा विचार, अन्य के विचार से कितना परिमार्जित हो सकता है? मुझे केवल चार पर्यायवाची शब्द और दो घिसी-पिटी थियोरीज़ ज़्यादा पता हैं। क्या यही अतिरिक्त कूड़ा (अब लगभग यही) अधिक जान लेने से मेरी प्राथमिकताएँ दूसरों से अलग-थलग या आकाशचारी हो सकती हैं?
दौड़ती वंदे भारत, उड़ते हवाई जहाज़ को देखकर, वीआईपी कल्चर से उत्पन्न जाम में घंटे भर साँस भरने के बाद भी मेरी प्राथमिकता नहीं बदली, ना ही चार चक्रवाहिनी में नेतई करने वाले सहपाठियों या हर तीन महीने में छपते हमउम्र कवियों को देखकर। तब भी नहीं, जब एक दोस्त ने कहा कि वह विधायकी लड़ना चाहता है, जिसके लिए आए दिन वह पार्टी कार्यालय के आस-पास ख़ाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदता रहता है।
रिसर्च के दौरान ‘लिवर फ़िब्रोसिस’ लिया हुआ स्कॉलर भी बी-प्लान के दम पर ही लिवर को सामान्य करने की क्षमता रखता है। उसी बी-प्लान के दम पर सब खुखिया फ़ायर कर के हवा में छेद कर ले जाने का दम दिखाते हैं। इसी दम पर एक और दूरदर्शी स्कॉलर ने कहा कि वह जुगाड़ से एक ‘मेडिकल स्टोर’ खोलेगा और मुझे आजीवन फ़्री में कॉन्डम देता रहेगा।
एक अन्य मित्र ने थोड़ी गंभीरता से कहा कि वह बाराबंकी वाली ज़मीन में ‛मुर्गी फ़ार्म’ खोलेगा—‛ह...ह...ह...’ की बहुत इंटेलेक्चुअल हँसी हँसते हुए मैंने उसे रिसर्च पेपर लिखने की सलाह दे डाली, ख़ैर। मेरी प्राथमिकताएँ—अकेलेपन, ऊब या खीझ में भी नहीं बदली। लेकिन इस अकादमिक जीवन से निकलते हुए जब पूँछ अटक गई, तब समझ आया कि प्राथमिकताओं के बदलने का कारण भविष्यगत भय और आशंका से ज़्यादा और कुछ नहीं है। जब एक जूनियर ने सचिवालय RO के लिए अप्लाई करने को कहा और उसके साथ लटका लगाया कि, “सब हिन्दीये तो होता है”। और बस “सब हिन्दीये तो होता है” में पूरी की पूरी सतत चली आ रही वर्तमान धारा मुड़ गई। ‛अगम बहै दरियाव’ तीस पेज़ पर बंद हुई कि बस दरियाव या कि दरियाई घोड़ा—कोई हिसाब नहीं।
इस आभासी दुनिया के मायावी प्रपंच में एक बार को लगा कि अरे—मैं ‛यह’ क्यों कर रहा हूँ! मुझे तो ‛यह’ छोड़कर तुरंत ही ‛वह’ करना चाहिए। बहुत कुछ जानने की चाह में और ख़ूब सरपट भागने की भद्दी क्रिया के दौरान ऐसा मुँह के बल गिरना होता रहा कि बिनास ही फूटती रही। कालिदास के ‘मेघदूतम्’ से लेकर ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ तक। डेकार्ट और शंकर से कर उत्तर आधुनिकतावाद के उबड़-खाबड़ गंतव्य को छान लेने की ऐसी आतुरता कि प्रतिभा का नहसुर ही उचरता रहा। तभी इस आभासी दुनिया के रील्स डिपार्टमेंट ने बताया कि अगर प्रतिभा का नहसुर उचर गया है तो भ्रामरी करिए—अँगूठे से कान बंद, तर्जनी और मध्यमा से आँख, अनामिका और कनिष्ठा को ओष्ठ के आस-पास कहीं भी लरका दीजिए और हम्म्म्म या गुं-गुं जैसी कंपित ध्वनि निकालिए और देखेंगे कि नहसुर ग़ायब, बिनास ख़तम और मेरी प्राथमिकताओं में कुछ दिन यही शामिल रहा। ह्म्म्म-गुंऽऽऽ।
जीवन को विविधताओं में देखने वाला मन ही इतना विविध हो गया कि अब इसका ठहराव भी पकड़ से जाता रहा। बोलते-बोलते स्वरभंग, कविता लिखते यतिभंग, जीते-जीते मोहभंग—कहीं रचिको संतुलन नहीं। पीएचडी के लगभग अंतिम वर्ष में जाना कि वे सारे मीम और रील्स—जिसमें की अंततः एक रिसर्च पेपर तक नहीं लिख पता है शोधार्थी, वे सारे मीम सच हो रहे हैं। सोशल मीडिया ही सत्य है, बाक़ी सब मिथ्या। रील ही तुम्हारा ब्रह्मा है मूर्ख। लाख सत्कर्म कर लो, एक मीम तुम्हारी सच्चाई गड़बड़ा देगा। ‛हे धरती तू फाटा, हम समा जाईं’, इस मंत्र का जाप नित्य ही करता रहा, जिस दिन सफल हो जाए।
किसी समय में, मैं अपनी प्रेयसी को यह कहकर कविताएँ सुनाता रहा कि ये कविताएँ केवल तुम्हारे लिए लिखी हैं जिस पर किसी और का अधिकार नहीं है। जिसे मैं तुम्हारे सिवा किसी और को नहीं सुनाऊँगा। उससे संबंध-विच्छेद के बाद जो दूसरी प्रेयसी आई उसे भी मैंने यही बात कहकर वही कविताएँ सुनाईं और मैं यहीं नहीं रुका, आगे भी मैंने उन तमाम लड़कियों को वही कविताएँ सुनाता रहा जिनके भी साथ मैं तथाकथित प्रेम में पड़ा। किसी समय में मेरे कवि-कर्म की यही प्राथमिकता थी, यहाँ तक भी ठीक था।
यह संकट तब और गहरा गया जब फिसलती उम्र में नौकरी को धर लेने की होड़ में शामिल हो जाना पड़ा। सरकारी नौकरी की रफ़्तार से लोग वाकिफ नहीं होते हैं, सरकारी नौकरी जैसे गिरई मछरी, जो हाथ से फिसलती ही रहती है, कभी 2 नंबर से तो 5 नंबर से। इसी गिरई मछरी के लिए मटियहा पानी में हाथ मारते-मारते—सारी कविताई, आलोचना-कर्म, आलोचक-धर्म, वैचारिक-विलाप और स्त्रीवाद, सब इसी गिरई मछरी के साथ फिसल गए। हाथ मारो तो कुछ हाथ नहीं, ना मछरी, ना कविता, ना पत्रिका, ना शोधपत्र, ना प्रेम, ना पहाड़, ना घर, ना गाँव। यहाँ से प्राथमिकता तय करना इतना दूभर हो चुका था कि आगे कुआँ था तो पीछे खाई थी और मैं जहाँ खड़ा था—धीरे-धीरे पता चला कि वह दलदल है। मेरी प्राथमिकता मिट्टी का तेल पिए साँप की तरह अचानक से ऐंठ कर पलट गई और मुझे वो दोस्त याद आएँ जो ‛मेडिकल स्टोर’ या फिर ‛मुर्गी फ़ॉर्म’ खोलने की बातें किया करते थे और जिसे मैंने सलाह दी थी कि पतंजलि कृत ‘महाभाष्य’ पर रिसर्च पेपर लिखो जहाँ ‛योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ को लेते हुए मनोविश्लेषणात्मक व्याख्या रखो।
लेकिन कबीर और जायसी के रहस्यवाद, तुलसी का लोकनायकत्व, छायावादयुगीन वाद-विवाद, मुक्तिबोध की फ़ैंटेसी और इक्कीसवीं सदी की कविता और कवि-कवयित्री-संबंध-विवादों से दूर जाते हुए एक झटके में प्राथमिकता ने पटरी बदली और उसमें पर्वत, पहाड़, पठार, दर्रे, नदी, घाटी, झरना—जहाँ जीवन दिशाहीन गति से लुढ़कता हुआ राज्यपाल, राष्ट्रपति और उनके महाभियोग से टकराकर अचानक से बिना कोई धन विधेयक लाए ही, बिना किसी लोकसभा स्पीकर द्वारा, आप ही आप हर ओर से बहिष्कृत हो गया। ऐसी माया कि न माया मिली न राम।
भूपेंद्र भाई बहुत भावुक होते तो राग अलापते कि किसी नौकरी में धँसा हुआ और सालों से कमरे में फँसा हुआ आदमी ख़ुद को दिन में कितनी बार अकेला और ख़ाली महसूस करता होगा? स्वयं को ही कभी-कभी कितनी ज़लालत भरी ज़िंदगी का महसूस होना। कहीं कोई दो बित्ते के कमरे अढ़ाई-पढ़ाई करता अपने भविष्य को लेकर क्या सोचता होगा—यही कि वह जीवन में कुछ-न-कुछ तो कर लेगा? बस यह सोचते हुए हमारे भीतर उपजी हताशा और निराशा हमें किसी पतंग की तरह किसी ठूँठ पेड़ पर अझुरा देती है। कितने दिनों फँसे ही रहते हैं, इस उम्मीद में कि जाने कौन-सी हवा आए कि हम सलीक़े से उतर जाए झूमते हुए। इस कठिन समय में और छछन्न दुनिया में तो अब इतनी भी उम्मीद नहीं बची। यह राग-रोवान सुनते ही तुरत मुझे मुर्गी फ़ॉर्म वाला दोस्त याद आया। हाल ही में सुनने में आया था कि अब वह अपने जेआरएफ़ के बचाए पैसों से बुलेट नहीं लेगा, बल्कि मुर्गी फ़ॉर्म ही खोलेगा।
भूपेंद्र भाई की सरकार और तंत्र दोनों से नाराज़गी चरम पर थी और लगभग सभी लोग भूपेंद्र भाई थे। इक्कीस की वैकन्सी पच्चीस में, बाईस की छब्बीस में और फिर घपला, फिर हो-हल्ला, प्रयागराज में आयोग की घेराबंदी, नारा-धरना, लाल-सलाम, हम अपना अधिकार माँगते-नहीं किसी से भीख माँगते। आयोग और मंत्री का क्या है, अधिकार तो बड़ी चीज़, वे तो भीख देने को भी राज़ी नहीं। तंत्र कोई भी हो सब अपने बेलज्जई की पराकाष्ठा पर हैं, एक ही साथ देश भर में नारे ही नारे लग रहे हैं, दिल्ली, इलाहाबाद, लखनऊ, जहाँ देखो तहाँ।
भूपेन्द्र भाई ने कहा कि यह देश सड़क और चौराहे पर नारों का और सिस्टम में बैठे होशियारों या ... का रह गया है बस। भूपेंद्र भाई ने फिर कहा, आदमी कहाँ-कहाँ जाए एक ही बार में दो पैरों से, अपनी पीएचडी बचाए या खोई हुई नौकरी वापस माँगे या फ़ीस वृद्धि वापस कराए—अरी साला, मतलब हम पढ़ने आए हैं या मराने? दूसरा ऑप्शन सही था। यहाँ भी वही संकट लहरा रहा था कि आदमी करे तो करे क्या, जाए तो जाए कहाँ—आगे का आप जानते हैं!!!
क्षण-क्षण प्राथमिकताओं के बदलते इस क्रम में एक बिंदु पर दर्शन का सहारा लिया गया, जहाँ अद्वैतवाद से आगे बढ़ते हुए Friedrich Nietzche के Eternal Recurrence पर कुछ हिसाब लगाने की कोशिश की गई, जिसके अनुसार अगर आपको अपना जीवन बिल्कुल इसी रूप में यानि लगभग सेम टाइमलाइन पर दोबारा जीना पड़े तो क्या आप इसे स्वीकार करेंगे या नहीं। अगर आपका जवाब हाँ है तो इसका मतलब आप अपने जीवन से संतुष्ट हैं; अगर जवाब नहीं है यानि आप संतुष्ट नहीं हैं। यदि कोई मुझसे अब यह सवाल पूछे तो उसे भक् *** के कहकर भगा देता। प्राथमिकताओं के बदलने के क्रम फिर यही समझ आया कि जीवन, दर्शन से नहीं चलता, सारे दर्शन महज़ ख़ुदबयानी हैं। जीवन नून-रोटी से चलता है और नून रोटी आता है पैसों से, पैसा आता है मुर्गी फ़ॉर्म से।
जब दुनिया अधैर्य की धुरी पर नाच रही है और चिंतन की सारी मुद्राएँ भंग हो गई हैं, जीवन अवसादमय है कि दुःखमय है, इसका अंतर बिला चुका है। किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, गुण, भाव या विचार, आदि का नाम संज्ञा नहीं है, अब वह कुछ और है जो अपने अंतिम बिंदु पर है, और वह निरर्थक जान पड़ रहा है। अपने अंतिम बिंदु पर हर चीज़ निरर्थक जान पड़ती है। जीवन के इसी घाल-मेल में सुख-प्राप्ति और दर्शन-टिप्पण का अतिरेक समाप्त हो चुका है। हम सुखी रहना चाहते थे, जिसके सुख से हमारा सुख जुड़ा था, उसका सुख आवश्यक था। जिसके बाइक में पेट्रोल की कमी नहीं थी, उसकी ज़रूरत अधिक रही।
जिसके पास शब्द-भंडार और विन्यास था, वे आचार्य हुए। जिसके पास विचारों को भेदने के दृष्टिकोण थे, वे दार्शनिक हुए। वर्तमान में, भूसी से तेल निकालने की जद्दोजहद में लगे—कम्युनिस्ट हुए। तेल को भूसी में बदल देने का दावा करने वाले समाजवादी कहलाए। मायामी बीच के कल्चर को गंगा पर ला पटकने वाले फ़ेमिनिस्ट कहलाए। एक कला थी, मैनिपुलेशन की कला, जो जितना अच्छा किया, उसकी उतनी ही स्वीकार्यता हुई और वह महामानव या नेता कहलाया। सब कुछ जानने का दंभ भरने वालों ने स्वयं को कवि कहा।
प्राथमिकताओं को तय करने का संकट कुछ ऐसा रहा कि इनमें से सब कुछ थोड़ा-थोड़ा मैं हुआ और अब कुछ नहीं हूँ, ना होना चाहता हूँ। जीवन की मद्धिम होती गति और ठंडी पड़ती ऊष्मा के बीच क्या जीवित रहने की प्राथमिकता भी बदल जाएगी। क्या आत्महत्या के पहले का बयान दिए बग़ैर ही जीवन समाप्त हो जाएगा? ऐसे समय में जबकि अस्तित्व के लिए स्वयं से दुर्धर्ष युद्ध चल रहा है और जीने की प्राथमिकता तय करने की भी समस्या खड़ी हो चुकी है—मुझे फिर वह दोस्त याद आया जिसकी योजना में मुर्गी फ़ॉर्म खोलना था और जैसा कि हाल ही में सुनने में आया था कि अब वह अपने जेआरएफ़ के बचाए पैसों से बुलेट नहीं लेगा बल्कि मुर्गी फ़ॉर्म ही खोलेगा, यही उसकी प्राथमिकता है, जो तय है और सशक्त है। एक दिन उस मित्र से मैंने उसकी योजना की गंभीरता जाननी चाही और चिर-परिचित अंदाज़ में पूछा, “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?”
पार्टनर ने जवाब दिया, “कोई काम बुरा नहीं, बशर्ते कि आदमी खरा हो।”
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