Font by Mehr Nastaliq Web
Bhimrao Ambedkar's Photo'

भीमराव आंबेडकर

1891 - 1956 | महू, मध्य प्रदेश

समादृत विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाज-सुधारक और संविधान-निर्माता। सामाजिक समानता, न्याय और दलित अधिकारों के संघर्ष के लिए उल्लेखनीय। भारत रत्न से सम्मानित।

समादृत विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाज-सुधारक और संविधान-निर्माता। सामाजिक समानता, न्याय और दलित अधिकारों के संघर्ष के लिए उल्लेखनीय। भारत रत्न से सम्मानित।

भीमराव आंबेडकर के उद्धरण

श्रेणीबद्ध करें

जाति के उन्मूलन की दृष्टि से देखें, तो संतों के संघर्ष से समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। मनुष्य का मूल्य स्वयंसिद्ध है, स्वतः स्पष्ट है—यह मूल्य उसे भक्ति के मार्ग पर चलकर नहीं मिलता।

तुम्हारी समस्याएँ केवल मंदिर में प्रवेश से हल होने वाली नहीं हैं। राजनीति, अर्थशास्त्र, शिक्षा, धर्म—ये सभी इस समस्या के हिस्से हैं।

मुझे इस बात का मुकम्मल तौर पर यक़ीन हो चुका है कि हिंदुओं के बीच रहते हुए; डिप्रेस्ड क्लासेज़ को बराबरी का दर्जा मिल ही नहीं सकता, क्योंकि हिंदू धर्म खड़ा ही असमानता की बुनियादी पर है।

'एक विभाजित' समूह हैं; जो उसी जाति व्यवस्था से संक्रमित हैं, जिसमें वे भी उतनी ही आस्था रखते हैं, जितनी सवर्ण हिंदू रखते हैं। अस्पृश्यों के बीच मौजूद जाति व्यवस्था ने परस्पर प्रतिद्वंद्विता और ईर्ष्या को जन्म दिया है और इसने साझा कार्यवाइयों को असंभव बना दिया है।'

हमारे आंदोलन का लक्ष्य है—अस्पृश्यों के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक मुक्ति प्राप्त करना। जहाँ तक अस्पृश्यों का सवाल है, तो यह मुक्ति धर्मांतरण के अलावा और किसी ढंग से हासिल नहीं की जा सकती।

असल में देखें तो दुनिया में सिर्फ़ दो ही जातियाँ हैं—पहली है अमीरों की और दूसरी है ग़रीबों की।

सकारात्मक दृष्टि से मेरे सामजिक दर्शन को तीन शब्दों में समेटा जा सकता है : मुक्ति, समानता और भाईचारा।

जहाँ समानता का निषेध होता है, वहाँ बाक़ी सारी चीज़ों का भी निषेध स्वाभाविक है।

डिप्रेस्ड क्लासेज़ की समस्या तब तक हल नहीं हो सकती, जब तक कि राजनीतिक सत्ता इस तबक़े के लोगों के हाथों में नहीं आएगी। डिप्रेस्ड क्लासेज़ की समस्या; मेरे ख़याल में सबसे पहले एक राजनीतिक समस्या है, और उसे राजनीतिक समस्या के रूप में ही देखा जाना चाहिए।'

अस्पृश्यता के उन्मूलन और अंतर्जातीय भोज से ही हमारी सारी समस्याएँ ख़त्म नहीं होगी। न्यायालय, सेना, पुलिस और वाणिज्य जैसे तमाम सरकारी महकमों को हमारे लिए खोला जाना चाहिए। हमें हिंदू समाज को जातिवाद के उन्मूलन और समानता को, दो सिद्धांतों पर फिर से खड़ा करना होगा।'

तुम सरकार को उन सारी चीज़ों के लिए विवश कर सकते हो, जो तुम्हें आज तक नहीं मिली हैं—भोजन, कपड़ा, आवास, शिक्षा। माला फेरने या प्रार्थना करने की बजाए, अब तुम्हें राजनीतिक रास्ते पर चलना चाहिए—वही तुम्हें मुक्ति देगा।

कोई स्थायी तरक़्क़ी तब तक संभव नहीं है, जब तक हम ख़ुद शुद्धिकरण की त्रि-स्तरीय प्रक्रिया से नहीं गुज़रेंगे। हमें अपने आचरण का सामान्य स्वर सुधारना होगा, अपने उच्चारण को साधना होगा और अपने विचारों को पुनर्जीवित करना होगा।

जो उच्च है; वह उच्चतर से छुटकारा पाना चाहता है, मगर कम उच्च, निम्न और निम्नतम के साथ हाथ नहीं मिलाना चाहता, क्योंकि उसे भय है कि कहीं वे भी उसके स्तर पर आकर उसके समान हो जाएँ।

भारत में धर्म सत्ता का स्रोत है, यह बात हमारे इतिहास में भी साफ़ दिखाई पड़ती है; जहाँ आम जन पर पंडे-पुरोहितों का वर्चस्व बहुधा न्यायाधीश से भी ज़्यादा मज़बूत होता है और जहाँ हर चीज़, यहाँ तक कि हड़ताल और चुनावों जैसी चीज़ें भी आसानी से धार्मिक रंग अख़्तियार कर लेती हैं—उन्हें बड़ी आसानी से धार्मिक मोड़ दिया जा सकता है।

सत्ता ही सामाजिक प्रगति की कुंजी है।

उधार या भाड़े पर लिया गया कोई भी ऐसा व्यक्ति; जो तुम्हारे वर्ग का नहीं है, वह लेशमात्र भी तुम्हारे हितों को नहीं साध सकता।

हमारा मक़सद है मुक्ति पाना। फ़िलहाल हमारी और कोई दिलचस्पी नहीं है। अगर हम धर्मांतरण से मुक्ति पा सकते हैं, तो हम हिंदू धर्म में सुधार की ज़िम्मेदारी क्यों ढोते रहें। हम अपनी ऊर्जा, समय, श्रम और धन इस पर क्यों नष्ट करे?

इससे पहले कि मैं मर जाऊँ, मुझे अपने लोगों को एक निश्चित राजनीतिक दिशा देनी चाहिए। वे हमेशा ग़रीब, उत्पीड़ित वंचित रहे हैं। इसी कारण आज उनमें एक नई चेतना और नया आक्रोश जन्म ले रहा है।

अगर हम चंद कम्युनिस्टों को छोड़ दें; तो दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं है, जो किसी-न-किसी धर्म को चाहता हो। सच्चा धर्म वही होता है, जो सबको समान अवसरों का आश्वासन दे—बाक़ी सारे धर्म फ़र्ज़ी है।

मेरा विश्वास है कि सभी मनुष्य समान होते हैं।

मैं ये क़तई बर्दाश्त नहीं करूँगा कि मेरे ऊपर हिंदुओं का जो सामाजिक वर्चस्व है; आर्थिक वर्चस्व है और धार्मिक वर्चस्व है, उसमें राजनीतिक वर्चस्व भी शामिल कर दिया जाए।

सबसे मौलिक धारणा समानता ही है। मनुष्य मात्र के प्रति सम्मान उसी का प्रतिबिंब है।

शूद्र को रचयिता के पाँवों के समकक्ष रखा गया है। मानव शरीर में पैर ही सबसे नीचे और सबसे हेय होते हैं; चुनांचे, शूद्र को सामाजिक व्यवस्था में भी सबसे निचली पायदान दी जाती है, उसे सेवक या टहलुआ के रूप में काम करने का सबसे हीन काम मिलता है।

मेरे दर्शन की जड़ें राजनीतिक शास्त्र में नहीं, बल्कि धर्म में हैं। मैंने उन्हें अपने प्रभु, बुद्ध के उपदेशों से लिया है। मेरे दर्शन का एक मिशन है। मुझे (बौद्ध धर्म में) धर्मांतरण का कार्य निभाना है।

मैं इन झूठे राजनीतिक चुनावों से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता। ऐसे झूठे चुनावों के दम पर तो मैं प्रधानमंत्री भी बन सकता था, मगर मेरे लिए उसका कोई मोल नहीं।

परतबद्ध असमानता की व्यवस्था में पीड़ित पक्ष किसी समान स्तर पर नहीं होते। ऐसा केवल तभी हो सकता है, जब व्यवस्था सिर्फ़ ऊँचे और नीचे लोगों से मिलकर बनी है।

अलग-अलग वर्गों को शरीर के अलग-अलग हिस्सों के समतुल्य बताना कोई संयोग की बात नहीं है। यह एक सोची-समझी योजना है। इस योजना के पीछे मक़सद यह है कि एक ऐसा फ़ॉर्मूला ढूँढ़ा जाए, जो दो समस्याओं को एक साथ हल कर दे। एक, चारों वर्गों के काम तय कर दिए जाएँ और दूसरी तरफ़ एक सुनिश्चित योजना के अनुसार चारों वर्गों का क्रम तय कर दिया जाए। अलग-अलग वर्गों को रचयिता की देह के अलग-अलग हिस्सों के बराबर रखने का उद्देश्य यही है।

Recitation