विजयी नस्लें मानती रही हैं कि पराजितों पर राज करना उनका प्रकृति प्रदत्त अधिकार है, या यह कि निर्बल और शांत नस्लों को साहसी और पराक्रमी नस्लों के आगे झुकना ही चाहिए।
आज हम मनुष्यों में स्वार्थ, आत्म-केंद्रिता और अन्यायपूर्ण पक्षपात के जो दोष देखते हैं, उनकी जड़ में असमान स्त्री-पुरुष संबंध ही हैं।
ऐसे किसी क़ानून की कहाँ ज़रूरत है जो एक पक्ष को राजा और दूसरे को प्रजा के कटघरे में खड़ा कर दे, और कहे कि राजा द्वारा दी जा रही सभी स्वतंत्रताएँ एक तरह का उपकार हैं, और कभी भी वापस ली जा सकती हैं।