जगह-जगह 2.0 : कूड़े के पहाड़, ट्रैफ़िक जाम, मेट्रो से आगे की देल्ही
दिल्ली की तारीफ़, पिछली तारीफ़ों की याद है। इसका रोमांस, रोमांस का दोहराव है। आगे चलो तो पीछे पहुँचते हो, पीछे चलो तो कहीं नहीं। दिल्ली को बहुतों ने याद किया है, जो यहाँ रहते हैं वे भी इसे याद करते ह
जगह-जगह 2.0 : हमारा फ़्यूचर शॉक कहाँ है?
When did the future switch from being a promise to being a threat? — Chuck Palahniuk इतिहास की पूँछ और भविष्य गुरंदी बाज़ार की एक दुकान में मुझे एल्विन टॉफ़्लर की ‘फ़्यूचर शॉक’ की एक प्रति म
जगह-जगह 2.0 : क्या कर रही होगी जबलपुर में तुम
शहरज़ादे का शहरआशोब जबलपुर को खोजता हूँ तो पहले उन सूचियों से उलझता हूँ जिनमें 12 सड़कों और 13 जनों की, 5 मोहल्लों और 3 उद्यानों की, 2 पुलों और 52 तालाबों की, एक कल्चुरी काल के तेवर की, एक विलियम स्
जगह-जगह 2.0 : न मैं हिंदी शहर नगौरी
भाषा-विज्ञान में व्युत्पत्ति-भ्रांति का अर्थ है कि किसी शब्द के प्राचीनतम अर्थ को ही उसका ‘सही’ अर्थ मानने पर ज़ोर दिया जाए और उसके वर्तमान इस्तेमाल को रद्द करके उसे उसके मूल प्रयोग, प्राचीन अर्थ और स
जगह-जगह 2.0 : चौरंगी, होटल कैलिफ़ोर्निया और गॉडफ़ादर
जगहें कैसे बनती हैं? तुम्हारे और मेरे बैठने से पहले, समंदर किनारे पड़े उन पत्थरों को क्या ‘जगह’ कहा जाए? फ़िल्म ‘रंगीला’ का समुद्र, ‘सदमा’ का समुद्र और ‘Life of Pi’ का समुद्र एक ही है? जगह एक दशा ह
जगह-जगह 2.0 : पुणे के बहाने
जाऊ नका कोणी तिथे जाऊ नका कोणी जे गेले, नाही आले परतोनी तुका पंढरीसी गेला पुन्हा जन्मा नाही आला पंढरीचे भूत मोठे — संत तुकाराम (1608-1650) संत तुकाराम इस अभंग में पंढरपुर के अलौकिक आकर्ष