शनिवारेर चिट्ठी : सिनेमा पर कैसे न लिखें
शायक आलोक
05 सितम्बर 2026
देखना
यह बड़ी फ़िल्म है। यह मेरा विचार नहीं; वह अवगतता है, जिसके साथ मैं इसे देखने बैठा हूँ। यहीं से देखने की एक बाधा शुरू हो गई है। अभी कुछ घटा भी नहीं कि उसके चारों ओर अर्थ जमा हो चुके हैं—आग्रह के और पूर्वग्रह के। फ़िल्म मेरे सामने बाद में आई है। पहले उसकी चर्चा आ गई है। मैं देख रहा हूँ। लेकिन क्या? फ़िल्म को या फ़िल्म के बारे में पहले से ज्ञात ‘वह’? चर्चा केवल यह नहीं बताती कि कोई कृति अच्छी है, वह धीरे-धीरे यह भी बताने लगती है कि उसे कैसे देखना है—कहाँ धैर्य रखना है, कहाँ प्रभावित होना है, कहाँ संदेह करना है... और फिर ऊब आती है। फ़िल्म नहीं बदलती। मैं बदल जाता हूँ। पहले लगता है—फ़िल्म धीमी है। फिर—मैं अधीर हूँ। फिर—मैं थका हूँ। फिर—मैं इस सिनेमा के योग्य दर्शक नहीं। दोष कितनी जल्दी भीतर पहुँच जाता है। हम कला को क्षमा कर देते हैं, स्वयं को नहीं... क्योंकि महानता के सामने असहमति कुछ असभ्य लगती है। कला क्या माँगती है—समर्पण, धैर्य, ज्ञान? या इतना भर कि उसके सामने जो अनुभव हो रहा है, उसके प्रति हम झूठ न बोलें? हो सकता है कोई फ़िल्म बड़ी हो। हो सकता है कि मैं उसे समझता भी हूँ और फिर भी मैं उसे देखना न चाहूँ! कोई विरोधाभास है? प्रिय मंज, इस रात कुछ अवकाश मिला था तो यह फ़िल्म देखने बैठा था। मैंने फिर यह बड़ी फ़िल्म बंद कर दी। यह इस फ़िल्म के विरुद्ध निर्णय नहीं, अपनी सीमा का स्वीकार था। देखने की नैतिकता यहीं से शुरू होती होगी—जहाँ हम अपनी अरुचि को भी अनुभव का तथ्य मान सकें। स्क्रीन बुझ गई। कमरा फिर कमरे में बदल गया। मैं उस दर्शक को दरवाज़े के बाहर छोड़ आया, जो मुझे बता रहा था कि मुझे क्या महसूस करना चाहिए।
पढ़ना
सिनेमा या साहित्य पर लिखे आस-पास के गद्य को पढ़ते हुए मैं ढूँढ़ता हूँ कि यहाँ वह आदमी कहाँ है जिसने फ़िल्म देखी थी, जिसने किताब पढ़ी थी? बाहर का आदमी तो मौजूद है। वह बहुत साफ़ बोलता है। उसे निर्देशक मालूम है, संदर्भ मालूम, कथानक, शिल्प, इतिहास भी मालूम। वह किसी फ़िल्म की ख़ूबियाँ गिनाता है; कविताओं की विशेषताएँ बताता है, निष्कर्ष देता है। लेकिन उसके भीतर का आदमी जैसे मेरे कमरे में आता ही नहीं। मैं उस आदमी की तलाश में रहता हूँ। वह आदमी जो फ़िल्म देखते हुए केवल फ़िल्म नहीं देखता। स्क्रीन पर किसी बूढ़े आदमी का अकेले बैठना और उसके भीतर अपने पिता की पीठ का उग आना। किसी लड़की का दरवाज़े पर ठिठकना और वर्षों पहले किसी स्टेशन पर छूट गई उसकी ही किसी प्रतीक्षा का लौट आना। कोई घर फ़िल्म में हो और उसके भीतर अपने बचपन का घर खुल जाए—वह बरामदा, वैसी दुपहर, वही धूल में तैरती रोशनी... और कभी-कभी कुछ भी याद नहीं आना तो उसका भी बयान—तब जब एक अनाम उदासी देह में उतरती रहती है। फ़िल्म चलती रहती है और हम किसी दूसरी (अपनी) ही फ़िल्म में चले जाते हैं। पढ़ने में तो यह और भी गहरा होता है। कोई वाक्य पढ़ते हम लेखक की दुनिया से दूर अपनी दुनिया में पैठ कर लेते हैं और कुछ देर वहाँ बने रहना चाहते हैं। कोई पात्र हमारे जीवन के ऐसे व्यक्ति का चेहरा पहन लेता है, जिसे हमने वर्षों से याद नहीं किया था। कोई कल्पना हमें उस जीवन की ओर ले जाती है जो हमने जिया नहीं, फिर भी जिसके न जी पाने का दुःख हमारे भीतर है। हम लिखेंगे तो वे आएँगे। एक रोज़ एक नीला जब रघुवीर सहाय के यहाँ ‘उसकी’ देह पर का नीला हो रहा था तो मुझे मेरे मुहल्ले की वह किरायेदार लड़की याद आ रही थी जो रिन साबुन पर हथेली रगड़ती थी और हवा में बुलबुले बनाती थी। वह लड़की आएगी। हिंसा के चिह्न संभवतः इस पाठ-दृश्य में भी रहे आते ही होंगे।
कला शायद इसी तरह हमारे भीतर जगह बनाती है—कृति अपने रूप में आती है और हमारी स्मृतियाँ, इच्छाएँ, भय, वासनाएँ, अनुशोचना उसे अपने ढंग से फिर से लिखने लगती हैं।
सिनेमा पर हिंदी के प्रशंसा-लेखों (मैं इन्हें फ़िल्म-समीक्षा या आलोचना के बजाय प्रशंसा-लेख ही कहने लगा हूँ) में भीतरी आदमी का यह पुनर्लेखन ग़ायब है। वहाँ कृति के बारे में सब कुछ है, कृति से घटित कुछ नहीं। जैसे लेखक ने फ़िल्म को आँखों से देखा, दिमाग़ से समझा और वहीं समाप्त कर दिया। देह चुप रही। स्मृति नहीं जागी। कल्पना ने कोई दरवाज़ा नहीं खोला। मुझे ऐसी प्रशंसा से यह शिकायत नहीं कि वह प्रशंसात्मक है। शिकायत यह कि उसमें उसके निजी मनुष्य की अनुपस्थिति है। मैं जानना चाहता हूँ कि फ़िल्म ने तुम्हारे भीतर किसे जगाया? किस पुराने दुःख को छुआ? किस सुख को लौटाया? किस कल्पना को जन्म दिया? किस ऐसी जगह ले गई जहाँ तुम स्वयं भी पहले नहीं गए थे? किसी कृति का सबसे गहरा जीवन शायद उसके भीतर नहीं, उस आदमी के भीतर घटता है जो उसके सामने बैठा है। और जब वही आदमी लिखते समय ग़ायब हो जाता है तो बस शब्द बचते हैं।
लिखना
सिनेमा के बारे में लिखना आसान है, जब सिनेमा को ही बीच से हटा दिया जाए। कहानी बता दो। फिर उसका अर्थ। फिर निर्देशक की मंशा। फिर सामाजिक सरोकार। दो-चार विशेषण—संवेदनशील, मार्मिक, साहसिक, प्रभावशाली। लेख तैयार। वह अनुभव अनुपस्थित रह जाता है, जहाँ फ़िल्म ले गई होगी। एक चेहरा। उस चेहरे पर पड़ती हुई रोशनी। कैमरा वहाँ क्यों ठहरा, जहाँ कहानी आगे बढ़ सकती थी? आदमी बोलने से पहले इतनी देर तक चुप क्यों रहा? कमरे में खिड़की है, लेकिन फ़्रेम में खिड़की से अधिक दीवार क्यों है? किसी दृश्य के बीच अचानक ध्वनि क्यों कम हो जाती है? अभिनेता की पीठ हमें क्यों दिखाई जाती है, चेहरा क्यों नहीं? ये प्रश्न कहानी के बाहर हैं, लेकिन फ़िल्म के भीतर यहीं से कुछ बनता है। दृश्य बहुत प्रभावशाली है—कैसे? अभिनय शानदार है—कहाँ? सिनेमैटोग्राफ़ी सुंदर है—किस तरह सुंदर? विशेषण अनुभव की जगह बैठ जाते हैं। वे आम लिक्खाड़ को उस श्रम से बचा लेते हैं, जिसमें देखी हुई चीज़ को फिर से देखना पड़ता है। आलोचना के लिए साध्य वाक्य है कि यह फ़िल्म धीमी है, श्रम-साध्य यह वाक्य-विचार कि उस धीमेपन में समय हमारे शरीर के साथ क्या कर रहा है... और फिर एक दूसरी जल्दबाज़ी भी है—पहली प्रतिक्रिया को अंतिम निर्णय बना देना। फ़िल्म ने पहले दस मिनट में नहीं पकड़ा, इसलिए फ़िल्म विफल। दृश्य धीमा लगा, इसलिए गति ख़राब। ऊब हुई, इसलिए कृति निर्जीव। लेकिन कुछ फ़िल्में हमें पकड़ती नहीं, हमें अपने समय में बुलाती हैं। उन्हें समझने से पहले उनके साथ रहना पड़ता है। सिनेमा को केवल उसके कथानक में बदल देना वैसा है जैसे संगीत की समीक्षा में गीत का अर्थ लिख देना। फ़िल्म की कहानी याद रह सकती है। उसका घटित होना नहीं भी। सिनेमा पर लिखते हुए उसे किसी सुविधाजनक विचार में तुरंत अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए। पहले देखें। फिर देखें कि आपने क्या देखा। फिर यह न पूछें कि फ़िल्म ने कहा क्या, यह कि किया क्या! भली बात है कि जिम एमर्सन की झल्लाहट मुझे भली लगी।
समझना
सिनेमा की अपनी भाषा है। फ़्रेम उसका वाक्य है। कैमरा उसका विन्यास। कट उसका विराम। ध्वनि उसकी दूसरी आवाज़। इसलिए कैमरे को देखिए—वह कहाँ है, कितनी दूर, किस ऊँचाई पर; स्थिर है या चलता हुआ, किसे अपने भीतर रखता है और किसे बाहर छोड़ देता है। फ़्रेम में ख़ाली जगह भी अर्थ रखती है। पृष्ठभूमि में पड़ी कोई मामूली चीज़ भी। पात्र अकेला क्यों है? उसके और दूसरे पात्र के बीच इतनी दूरी क्यों है? जो दिखाई दे रहा है, उसके साथ यह भी कि फ़िल्म क्या छिपा रही है। समय—फ़िल्म कहाँ ठहरती है, कहाँ तेज़ होती है, कहाँ किसी चेहरे पर अपेक्षा से अधिक देर टिकती है। फ़िल्म केवल यह नहीं कहती कि क्या दिखाना है, यह भी तय करती है कि उसे कितनी देर दिखाना है। फिर कट। एक दृश्य के बाद दूसरा क्यों? दो छवियाँ साथ आकर क्या नया पैदा करती हैं? कभी अर्थ छवि के भीतर नहीं, दो छवियों के बीच होता है। अभिनय के सामने ठहरना। ‘अच्छा अभिनय’ कहकर आगे न बढ़ जाएँ। चेहरा क्या कर रहा है? देह कहाँ रुकती है? आवाज़ कहाँ बदलती है? चुप्पी कितनी देर रहती है? चेहरे को पढ़ना। पहले वह देखना जो सचमुच वहाँ है। फिर अपने अनुभव तक जाना। आँख के साथ कान भी खुला रहे। संगीत कब आता है, कब नहीं आता। फ़्रेम के बाहर से कौन-सी आवाज़ आती है। चुप्पी क्या करती है। रोशनी और रंग महज सजावट नहीं हैं। अँधेरा क्या छिपाता है। उजाला क्या खोलता है। कोई रंग क्यों लौटता है। कोई वस्तु, गीत, जगह या हरकत फिर क्यों आती है। और लौटकर क्या बदल जाता है। कोई अच्छी फ़िल्म अपने ही बिंबों को दोहराती है, मगर हर बार उनका अर्थ थोड़ा सरका देती है। फ़िल्म की संरचना को भी उसके कथानक से अलग देखना होगा। घटनाएँ किस क्रम में हुईं, यह एक बात है; फ़िल्म उन्हें हमें किस क्रम में दिखाती है, यह दूसरी। स्मृति कहाँ प्रवेश करती है। फ़्लैशबैक क्या बदल देता है। फ़िल्म क्या रोककर रखती है और क्या अचानक खोल देती है। यही उसका रूप है। निर्देशक का नाम जान लेना भी पर्याप्त नहीं। “यह अमुक की शैली है”—इससे आलोचना शुरू नहीं होती। दिखाना होगा कि इस फ़िल्म में अमुक की शैली काम कैसे करती है। कैमरा, गति, फ़्रेम, अभिनेता, स्थान—इनके बीच वह कौन-सा संबंध बनाता है। फ़िल्म को उसके समय, समाज और इतिहास से जोड़ना, मगर इतना नहीं कि फ़िल्म संदर्भ के नीचे दब जाए। संदर्भ खिड़की हो, दीवार नहीं... और आलोचक का अपना ‘मैं’। वह छूट न जाए। देखने वाला वह मनुष्य आलोचना में मौजूद हो। लेकिन इतना भी नहीं कि फ़िल्म उसके आत्मकथ्य का बहाना बन जाए। निजी अनुभव दरवाज़ा है, कमरा नहीं। आलोचना प्रशंसा भी नहीं है। फ़िल्म जहाँ चूकती है, वहाँ उसके सामने बैठना। असहमति प्रकट करना। पूछना—चूक कहाँ हुई, क्यों हुई। फ़िल्म को पहले से किसी विचार में क़ैद नहीं करना। यह मृत्यु की फ़िल्म है। यह प्रेम की। यह अकेलेपन की। यह राजनीति की। ऐसे निष्कर्ष पहले रख दें तो दृश्य केवल उनके उदाहरण रह जाएँगे। पहले दृश्य को बोलने दें। विचार पीछे से आए। कभी-कभी बहुत देर से। और फिर, फ़िल्म का अर्थ घोषित कर उसका अंत नहीं करना। अच्छा आलोचनात्मक लेख दरवाज़ा बंद नहीं करेगा। इसे थोड़ा खुला छोड़ेगा। दर्शक फिर लौटे। यहीं ‘बाहर का आदमी’ और ‘भीतर का आदमी’ एक साथ आते हैं। बाहर का आदमी जानता है—इतिहास, तकनीक, रूप, निर्देशक, परंपरा। भीतर का आदमी जानता है—उसने क्या देखा, क्या महसूस किया, कहाँ उसकी नज़र ठहर गई। केवल बाहर वाला होगा तो आलोचना जानकारी बन जाएगी। केवल भीतर वाला होगा तो आत्मकथा।
सीखना
वह बूढ़ा जानता था कि वह कैंसर से मर रहा है। उसके पास पैसे हैं और वह अच्छा समय बिताना चाहता है, लेकिन उसे समझ नहीं आता कि कैसे। वह अजनबी साथी के साथ घूम रहा है—जुए के अड्डों, डांस-हॉलों और उस इलाक़े में जहाँ देह का कारोबार होता है... आख़िर में वे एक ऐसे बार में पहुँचते हैं जहाँ पियानोवादक लोगों की पसंद के गीत बजाता है। बूढ़े ने अपना गीत बताया है—“छोटी है ज़िंदगी, प्रेम करो लड़की।” पियानो बज रहा है और बूढ़ा गा रहा है। उसकी आवाज़ धीमी है और पूरा बार अचानक शांत हो जाता है। नाचने वाली लड़कियाँ और शराब में डूबे वेतनभोगी सब ही जैसे अपनी छोटी होती हुई ज़िंदगी के बारे में सोचने लगे हैं... यह दृश्य ‘इकिरु’ के लगभग मध्य में आता है। अकीरा कुरोसावा की 1952 में बनी यह फ़िल्म टोक्यो सिटी हॉल के एक ऐसे कर्मचारी मिस्टर वातानाबे की कहानी है, जो तीस वर्षों तक नौकरी करता रहा, लेकिन उन वर्षों में वास्तव में कुछ भी नहीं कर पाया... फ़िल्म का पहला दृश्य वातानाबे के सीने के एक्स-रे से शुरू हुआ है। उसे पेट का कैंसर है, लेकिन अभी वह यह नहीं जानता। वह बस जीवन की धार में बहता चला जा रहा है। एक्स-रे धीरे-धीरे उसके चेहरे में बदल जाता है—अभिनेता ताकाशी शिमुरा का वह उदास, थका हुआ और बिल्कुल साधारण चेहरा। कुरोसावा कहानी को धीमी, संयत गति से आगे बढ़ाते हैं;, लेकिन अंत तक आते-आते मृत्यु के सामने एक तीखा आक्रोश उठ खड़ा होता है। एक दृश्य में वातानाबे घर लौटता है और कंबल के भीतर मुँह छिपाकर रोते-रोते सो जाता है; कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है और वहाँ वह प्रशस्ति-पत्र दिखाई देता है, जो उसे नौकरी के पच्चीस वर्ष पूरे करने पर मिला था... एक युवा लड़की, जो नौकरी छोड़ना चाहती है; उसके घर तक पहुँच जाती है, क्योंकि उसे अपने काग़ज़ों पर वातानाबे की मुहर चाहिए... कुरोसावा घटनाओं को सीधे, कालक्रम के अनुसार नहीं बताते। वातानाबे की मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार में बैठे परिवारवालों और सहकर्मियों की बातचीत से वे पीछे लौटते हैं। लोग बहुत शराब पीते हैं, बहुत बातें करते हैं और वातानाबे की मृत्यु तथा उसके अंतिम दिनों के व्यवहार का रहस्य समझने की कोशिश करते हैं। यहीं फ़िल्म का असली मर्म सामने आता है... एक आदमी का चुपचाप सही काम करने का प्रयत्न उन लोगों को विचलित कर देता है, जो उसे बाहर से देखते हैं। कोई उससे प्रेरित होता है, कोई उलझ जाता है, कोई नाराज़ होता है, कोई निराश—क्योंकि हर कोई दूसरे के जीवन को अपने ही अधूरे और अपरीक्षित जीवन की दृष्टि से देखता है... यहीं कुरोसावा अपनी सबसे बड़ी चाल चलते हैं। वह हमें वातानाबे के निर्णय का केवल दर्शक नहीं रहने देते, वह हमें उसका प्रचारक बना देते हैं। ऐसा लगता है कि हम स्वयं चाहते हैं कि कोई उस निर्णय को समझे, कोई अपनी ज़िंदगी को थोड़ा अलग ढंग से जीना शुरू करे। मुझे लगता है, यह उन विरल फ़िल्मों में से एक है जो सचमुच किसी मनुष्य को उसकी ज़िंदगी थोड़ा बदल देने के लिए प्रेरित कर सकती है। कुरोसावा ने यह फ़िल्म 1952 में बनाई थी। उस समय उनकी उम्र बयालीस वर्ष थी और ताकाशी शिमुरा केवल सैंतालीस के। यह फ़िल्म ‘राशोमोन’ के बाद आई थी और आगे चलकर कुरोसावा ने ‘द सेवन सामुराई’ जैसी अपनी प्रसिद्ध फ़िल्में बनाईं। ‘द हिडन फोर्ट्रेस’ जैसी उनकी फ़िल्मों का प्रभाव बाद के विश्व सिनेमा पर भी पड़ा...
रोजर एबर्ट अपनी समीक्षा में किसी फ़िल्म के हर पहलू को छूने की इच्छा रखते हैं—कोई केंद्रीय थीम, कथानक, चरित्र, तकनीक, निर्देशक की शैली और पूरा काम, आत्मीय अनुभव। उन्होंने ‘इकिरु’ पहली बार 1960 या 1961 में देखी थी। कॉलेज के एक फ़िल्म-समारोह में यह लगी थी और टिकट केवल पच्चीस सेंट का था। ढाई घंटे तक वह वातानाबे की इस कहानी में डूबे रहे। इसके बाद वर्षों तक लगभग हर पाँच साल में फिर यह फ़िल्म देखते रहे। हर बार यह उन्हें भीतर तक छूती रही, हर बार इसने उन्हें अपने जीवन के बारे में सोचने पर मजबूर किया। ...और अब, जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जा रही है, वातानाबे मुझे किसी दयनीय बूढ़े आदमी की तरह कम और हम सबकी तरह अधिक दिखाई देने लगा है। शायद यही इस फ़िल्म का सबसे गहरा दुःख है और उसकी सबसे बड़ी उम्मीद भी।
होणा
‘हिन्दवी’ पर ‘बिज्जी@100’ का हफ़्ता चल रहा है। तुम जदी विजयदान देथा को अधिक नहीं जानती तो याद रखना कि वह शाहरुख़ ख़ान वाली ‘पहेली’ (यद्यपि कहना चाहिए अमोल पालेकर की पहेली) उन्हीं कि कहानी पर आधारित है। इसी कहानी पर मणि कौल की ‘दुविधा’ प्रतिष्ठित रही है। बिज्जी के पास लोक की ऐसी अनगिन कहानियाँ हैं, जो मुझे विस्मय से भर देती हैं। उनकी भाषा से इन्हीं दिनों मैं भी कुछ सीख रहा हूँ। इन दिनों आस-पास के माहौल में बिज्जी घुले हुए हैं। सिनेमा, बिज्जी और तुम्हारे प्रसंग में मैंने तुम्हारे लिए यह संवाद गढ़ा है—म्हारी डाबरनैणी, अठै म्हैं बिज्जी सारू थोड़ी बात करूँ तौ आ, कै आज अठै अेकलौ बैठ'र 'परिणति’ फिलम देखूँला। फिलम जद चालैला तो थारी ओळ्यूं घणी आवैला। थारै साथै फिलम देखणौ, ज्यूं हियै में सांगोपांग ठडळक। पण साची केवूं, थारै साथै होवणौ, थारै खनै बैठणौ—फिलम देखणै सूं भी घणो अंजसजोग है।”
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