जगह-जगह 2.0 : हमारा फ़्यूचर शॉक कहाँ है?
निशांत कौशिक
26 जून 2026
When did the future switch from being a promise to being a threat?
— Chuck Palahniuk
इतिहास की पूँछ और भविष्य
गुरंदी बाज़ार की एक दुकान में मुझे एल्विन टॉफ़्लर की ‘फ़्यूचर शॉक’ की एक प्रति मिली। यह 2010 था। मैं टॉफ़्लर को नहीं जानता था। यह ख़ालिस शीर्षक देखकर की हुई ख़रीद थी।
इन दिनों तक फ़्रांसिस फ़ुकुयामा की ‘द एंड ऑफ़ हिस्ट्री’ का ग़लबा या उसके तर्क के दिन लदने की शुरुआत हो चुकी थी। ईश्वर सिंह दोस्त ने कहीं लिखा था कि 1991 में USSR के विघटन के बाद कम्युनिस्टों को लगा कि इतिहास उनके पक्ष में है और उदार पूँजीवाद के पक्षधरों को लगा कि इतिहास उनके पक्ष में है। 2008 में पता चला कि इतिहास पेड़ पर बैठा है और सभी बस उसकी हिलती हुई पूँछ देख रहे हैं।
जॉर्ज ऑरवेल तब भी बिकते थे। हर चुनाव, हर नए क़ानून या हर नए संकट में ‘1984’ के संदर्भों का रेला शुरू हो जाता था। यहाँ बिग ब्रदर, वहाँ विचार पुलिस। किताब कभी चर्चा से बाहर नहीं होती थी। चेतन भगत ने अख़बार में लिखा था कि वह ऑरवेल की तरह लिखना चाहते हैं।
निर्मल वर्मा ने कैरेल चापेक की कहानियों का अनुवाद किया था, जो ‘टिकट संग्रह’ शीर्षक से छपा, लेकिन चापेक कुछ और वजह से रोमांचित कर चुके थे। उनके 1920 के नाटक में पहली बार ‘रोबोट’ शब्द आया। चेक मूल में इसका अर्थ जबरन मज़दूरी के संदर्भ में था। ‘आर.यू.आर.’ के रोबोट मशीनें नहीं हैं। वे मानव-निर्मित प्राणी हैं। चापेक ने दक्षता और कौशल की नैतिक समस्या को इस नाटक का केंद्र बनाया, हालाँकि इसका स्वर कॉमिकल भी था।
यहाँ टॉफ़्लर और चापेक का एक ही क्रम में नाम उद्धृत करने से आशय उनके काम में निहित भविष्य की चाप है। चापेक वह लिख रहे थे जिसे साइंस फ़िक्शन कहा जा सकता है। जैसे जूल्स वर्न ने उन्नीसवीं सदी की इंजीनियरिंग की समझ के आधार पर पनडुब्बियों और चाँद की यात्राओं की कल्पना की थी, वैसे ही एच. जी. वेल्स ने ‘टाइम मशीन’ लिखने के लिए विकासवाद और अन्य जैविक बदलावों के अध्ययन को आधार बनाया। साठ के दशक में, जब टेलीविज़न हर जगह आम हो रहा था, तब मार्शल मैक्लुहान ने कहा था, “The medium is the message.” वह यह बात टेलीविज़न के बारे में कह रहे थे, लेकिन आज इस उक्ति ने व्यापक अर्थ अपना लिया है। आशीष नंदी कुछ ऐसा ही काम कर रहे थे। वह आधुनिकता को मनोवैज्ञानिक क्षय और अलगाव के संदर्भ में देख रहे थे। इन सभी में भविष्य की एक चाप है।
टॉफ़्लर ने फ़्यूचरिस्ट लेखन को आदर्शवाद से मुक्त कर दिया।
भविष्य की खोज
टॉफ़्लर की पुस्तक में आशंकाएँ—युद्ध, ग़रीबी या बीमारी नहीं, रफ़्तार के बारे में थी। बदलाव की रफ़्तार और उसे अपनाने की मानवीय क्षमता के बीच का फ़ासला एक तरह की ‘सभ्यतागत बीमारी’ पैदा करेगा। उन्होंने इसे ‘फ़्यूचर शॉक’ का नाम दिया।
टॉफ़्लर की पुस्तक कोई पैग़ंबरी इल्हाम नहीं है और न ही कोई घोषणापत्र। उनकी किताबें दलबंदियों से बाहर रहीं। वे भरपूर पढ़ी गईं और प्रशंसित भी हुईं। लेकिन चूँकि वे न तो राजनीतिक दस्तावेज़ थीं और न इतिहास के व्यवस्थित पाठ में किसी अकादमिक नूतनता या चुनौती के रूप में उपस्थित होती थीं—इसीलिए उनका गौरव हमेशा एक तरह की सुगबुगाहट लिए रहा।
टॉफ़्लर ने जो लिखा था वह आज अनेक समाजों और राष्ट्रों में किसी न किसी रूप में पसर चुका है। उनके कुछ महत्त्वपूर्ण इशारे नॉस्टैल्जिया या अतीतग्रस्तता की ओर थे। अतीत-पूजा और अतीत की तीव्र आकांक्षा को उन्होंने ‘वेव ऑफ़ नॉस्टैल्जिया’ कहा। समाज और जातीय समूह अपने इतिहास की ओर भागे जा रहे हैं क्योंकि नॉस्टैल्जिया अब एक नैरेटिव है, जिसने उपभोक्ता-समय के लगभग हर अनुभव में अतीत-विलास की छौंक लगा दी है। टॉफ़्लर ने नॉस्टैल्जिया को एक सामाजिक लक्षण के रूप में देखा। यह भावुकता नहीं, संगठित और योजना की शक्ल अख़्तियार करता राजनीतिक आश्रय था। अतीत को सामूहिक या जातीय स्मृति के रूप में संगठित, निर्मित और आरोपित करने की प्रक्रियाएँ तेज़ हो रही थीं।
उत्पादन और बेहिसाब खपत पर भी टॉफ़्लर का विश्लेषण नब्ज़ पर था। उनका अनुमान था कि भविष्य का मनुष्य अभावों से नहीं बल्कि अति-विकल्पों और विकल्पों के आभासी फैलाव से घिर जाएगा। चुनने के लिए इतना अधिक होगा कि चुनना स्वयं एक बोझ बन जाए। औद्योगिक समाज ने अभाव की समस्याएँ पैदा की थीं। अति-औद्योगिक समाज एक नई दुविधा पैदा करेगा जहाँ वस्तुओं, सूचनाओं, जीवन-शैलियों, पेशों और पहचानों की इतनी अधिक संभावनाएँ होंगी कि व्यक्ति की निर्णय क्षमता क्षीण होने लगे।
भविष्यवाणी का इतिहास अक्सर विफलताओं का इतिहास है। यह एक दुर्लभ परिस्थिति है कि टॉफ़्लर की अनेक टिप्पणियाँ सामाजिक यथार्थ का हिस्सा बनती दिखाई दीं। दिलचस्प यह है कि उनकी अनेक बातें उन विषयों और क्षेत्रों से संबद्ध थीं, जिन पर उनके समय की बहसें प्रायः अकादमिक दायरों तक सीमित थीं। एक ही पेशे में जीवन भर बने रहने के औद्योगिक आदर्श का टूटना, लगातार नए कौशल अर्जित करने की आवश्यकता, करिश्माई नेतृत्वों का उभार, व्यक्तित्व-आधारित अनुयायी समूहों का गठन, पहचान-आधारित समुदायों की वृद्धि, कुटुंब और परिवार की पारंपरिक संरचनाओं का विघटन आदि ऐसे संकेत थे—जिन्हें टॉफ़्लर ने बहुत पहले दर्ज कर लिया था।
हमारा ‘फ़्यूचर शॉक’ कहाँ है?
भारत इतिहास का अलाव हाथ पर लेकर चल रहा है। इसमें साधुत्व है और पीड़ा की प्रतिष्ठा भी। यह ऐसी चोट है कि हर खंडहर के गिरने पर भविष्य की किसी नींव में एक पत्थर और जुड़ जाता है। अतीत में इतना अधिक निवेश हमने शायद कभी नहीं किया था, जबकि उसकी संजीदगी भी संदिग्ध है।
दूसरी ओर हमारे दालान और बरामदे विमर्शों से अटे पड़े हैं। उनमें सनक है, खीझ है। उनकी लगभग सभी आवाज़ें एक जैसी हैं। लोग अपनी जीभ दूसरे के मुँह में ढूँढ़ सकते हैं।
फिर भी कुछ जगहों और रुझानों को छुआ जा सकता है।
भारत के पहले वास्तविक इंटरनेट-जनित उद्योगों में से एक ‘रिएक्शन संस्कृति’ है। सैकड़ों चैनल फ़िल्मों, राजनीति, पॉडकास्टों, सामाजिक मुद्दों, विदेशी टिप्पणियों और यहाँ तक कि प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रियाओं के लिए समर्पित हैं। उत्पाद यहाँ सामग्री नहीं बल्कि सहभागिता है। भारत ‘महान’ है या भारत ‘पतनशील’ है—दोनों ही स्थितियाँ दर्शक, टिप्पणियाँ, आक्रोश और रेवेन्यू पैदा करती हैं। ‘अच्छे भारत’ और ‘बुरे भारत’ की बहस अब एक व्यावसायिक मॉडल है। राष्ट्रीय गौरव, राष्ट्रीय शर्म, ट्रोलिंग, आक्रोश, मान्यता और सांस्कृतिक संघर्ष सभी अपने-अपने दर्शक जुटाते हैं। हर दृष्टिकोण अपने साथ निर्माताओं, अनुयायियों और विज्ञापनदाताओं का एक पारिस्थितिकी तंत्र निर्मित करता है।
दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन आबादी वाले देश में ध्यान और एकाग्रता यानि Attention स्वयं एक बाज़ार हैं। हर उद्योग इस भीड़ तक पहुँचना चाहता है। अरुंधति रॉय ने कहीं टिप्पणी की थी कि भारत को अक्सर किसी समाज या राष्ट्र से पहले एक बाज़ार की तरह देखा जाता है। संभव है कि इसी में उसकी प्राचीन संस्कृति की प्रशंसा की एक चाबी भी छिपी हो। इंटरनेट में भारतीय संस्कृति का दिलचस्प लेकिन भोथरे क़िस्म का गौरवगान कीर्तन की तरह चलता है।
मानवीय व्यवहार की डोपामाइन-आधारित व्याख्या, भले ही अपूर्ण हो, आधुनिक मनोविज्ञान की प्रमुख रूपरेखाओं में से एक बन चुकी है। एडीएचडी, ऑटिज़्म, अवसाद और उनसे जुड़ी स्थितियों के लिए मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के बीच सेवाओं की एक नई परत आकार ले रही है। मानसिक स्वास्थ्य का यह शायद सबसे बड़ा आगामी बाज़ार होगा।
सूचना के अभाव को अब प्रामाणिकता का अभाव अपदस्थ कर रहा है। ऐसे नए पेशे उभर सकते हैं जिनका काम कृत्रिम दिखने वाले कार्यों में मानवीय तत्व का सत्यापन और मूल्यांकन करना होगा।
भविष्य सतह पर जितना तकनीकी दिखाई दे रहा है, मूलभूत मानवीय मूल्यों के अनुभव और उनकी पुनर्प्राप्ति का व्यवसाय उतना ही अधिक फैलेगा। उसका काम उन लोगों को राहत देना होगा जो भीषण उपभोक्तावाद और इंटरनेट की निरंतर दबिश से बाहर निकलना चाहते हैं।
अगली पीढ़ी के सफल व्यवसाय उत्तेजना और उकसावे नहीं बेचेंगे। वे इनसे राहत बेचेंगे।
शांति स्वयं एक उत्पाद है।
जिन्होंने शोर पैदा किया है, वही उससे मुक्ति बेचेंगे।
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