जगह-जगह 2.0 : चौरंगी, होटल कैलिफ़ोर्निया और गॉडफ़ादर
निशांत कौशिक
15 मई 2026
जगहें कैसे बनती हैं? तुम्हारे और मेरे बैठने से पहले, समंदर किनारे पड़े उन पत्थरों को क्या ‘जगह’ कहा जाए? फ़िल्म ‘रंगीला’ का समुद्र, ‘सदमा’ का समुद्र और ‘Life of Pi’ का समुद्र एक ही है?
जगह एक दशा है, अनुष्ठान है, व्यवस्था है, संरचना है। जगह घटनाओं को आकार देने का तर्क है। ये जगहें वास्तुकला या यथार्थवाद के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। वे स्मृति, व्यवहार, इच्छा और दोहराव को अपने इर्द-गिर्द व्यवस्थित करती हैं।
आगे लिखी बातें ऐसी ही तीन जगहों के बारे में हैं :
चौरंगी
सुबह का साढ़े छह बज रहा है। कलकत्ता की हवा में दुर्लभ ख़ुनक उठती है। आँगन धुले जा रहे हैं। कोई हॉकर गुज़रा है। ट्राम सरकने की आवाज़ है। रेडियो पर बजता है, “ए की सुगंधहिल्लोल बहिल, आजि प्रभाते...”। हम्माल दौड़ते हुए रास्ता पार कर रहे हैं। अमृत बाज़ार और आनंद बाज़ार पत्रिका के पन्नों के बीच छिपे चेहरे और धोतियाँ—कभी हुगली की बात करते हैं, कभी हिलसा की। ट्राम स्टॉप के दफ़्तर में काम करने वाले बाबू, बेंटिंक स्ट्रीट के पास चीनी-मोची, दिन की शुरुआत करते हुए टाना-रिक्शा वाले बतियाते हैं, “कल राते ৩৬২ नंबर-ए अबार पुलिस एशेछिलो”।
यह साल 1962 का चौरंगी है या शायद नहीं है। यह शंकर के किसी भी उपन्यास का चित्र हो सकता है या शायद नहीं। क्या कोई टानावाले से पूछता है, मुझे शंकर के उपन्यास वाले चौरंगी के शाहजहाँ होटल ले चलो?
मणिशंकर मुखर्जी का निधन 20 फ़रवरी को कोलकाता में हुआ। वह अपने पाठकों के बीच ‘शंकर’ नाम से अधिक जाने गए। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘चौरंगी’ और बहुतेरे बांग्ला उपन्यासों के अनुवादक अरुणाभ सिन्हा ने उनके निधन पर लिखा : “Sankar has checked out of Shahjahan Hotel”
‘चौरंगी’ 1962 में प्रकाशित हुआ। इसके केंद्र में शाहजहाँ होटल है, जिसमें एक भद्र रिसेप्शनिस्ट सत्यसुंदर बोस है; एक नया कर्मचारी शंकर है; बायरन है : वह डिटेक्टिव जो यह स्वीकार करता है कि उसका अस्तित्व अब उपन्यासों के भीतर ही है, जिस समाज में जासूसी कहानियाँ बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं, वहाँ उसके जैसे डिटेक्टिव की वास्तविक ज़रूरत नहीं रह जाती, वह अपने ही पेशे को एक ऐसी कथा की तरह देखता है जिसका बाहर की दुनिया में कोई स्थायी उपयोग नहीं बचता; मार्कोपोलो है : त्रासद जीवन और आडंबर के बीच फँसा हुआ होटल प्रबंधक और प्रभातचंद्र गोमेज़ है : जो संगीत के शास्त्रीय और आध्यात्मिक रूप का पूजक है।
सत्यसुंदर बोस, जिन्हें सब स्याटा बोस कहते हैं, रिसेप्शन का वह चेहरा हैं जो दुनियाभर के पासपोर्टों और आदतों को एक ही डेस्क पर देखता है। शंकर, हावड़ा के एक मोहल्ले से आया नया कर्मचारी, इस पूरे तंत्र में धीरे-धीरे शामिल होता है। संपूर्ण उपन्यास शाहजहाँ होटल और इसके कर्मचारियों के अंतर्संबंध की कहानी है।
शहर केंद्रित उपन्यासों में शंकर के इस उपन्यास का ज़िक्र अक्सर होता है, लेकिन ‘चौरंगी’ की विचित्र समकालीनता इस बात में है कि यह किसी ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह 1950-60 के कलकत्ता को सुरक्षित करने वाला उपन्यास नहीं है। यह ‘…खोए हुओं की जुस्तुजू!’ भी नहीं बनता, क्योंकि यहाँ अतीत को स्मृति के रूप में संरक्षित करने की कोई संगठित कोशिश नहीं दिखाई देती।
उपन्यास में शाहजहाँ होटल के बाहर के दृश्य बहुत कम हैं और जिन क्षणों में शहर दिखाई भी देता है, वह एक पूरी तरह विकसित सामाजिक-राजनीतिक कलकत्ता नहीं बनता। यह दृश्य न शहर का संरक्षण है, न उसका विस्तृत चित्रण, बल्कि शहर केवल एक धुँधली पृष्ठभूमि की तरह आता-जाता रहता है।
पूरा उपन्यास शाहजहाँ होटल के भीतर चलने वाली आतिथ्य और सत्कार की एक सतत व्यवस्था पर केंद्रित है। यह होटल एक ऐसी मशीन की तरह काम करता है जो लोगों, इच्छाओं, भूमिकाओं और अनुभवों को लगातार संगठित और पुनर्गठित करती रहती है। इस तरह किरदारों की निजी कहानियाँ महत्त्वपूर्ण नहीं रह जातीं, बल्कि एक सीमित परिवेश में उनका बार-बार दोहराया जाना ही कथाक्रम हो जाता है। वे शास्त्रीय पात्रों की तरह विकसित होने के बजाय प्रतीकों की तरह घूमते रहते हैं।
इस व्यवस्था में जो संस्कृति बनती है, वह हर क्षय और क्षरण के बाहर सदैव सक्रिय रहती है, एक अंतहीन वर्तमान में। उपन्यास का अंत भी शाहजहाँ होटल के महाकाय अस्तित्व से दूर जाते हुए मुख्य किरदार पर होता है।
होटल कैलिफ़ोर्निया
एक अमेरिका-निवासी पंजाबी लेखक से साक्षात्कार में पूछा गया कि उनका पसंदीदा गीत ‘जुगनी’ है या ‘Hotel California’, उन्होंने ‘Hotel California’ चुना। जब उनसे पूछा गया कि ‘जुगनी’ क्यों नहीं, तो उनका उत्तर था, “आप देखिए कि ‘Hotel California’ पर कितनी रिसर्च हुई है।”
1976-77 में आए Eagles (म्यूज़िक बैंड) के इस गीत की अनगिनत व्याख्याएँ की जाती रही हैं। यह गीत रॉक बैंड की सीमाओं से बहुत आगे निकल गया। होटल कैलिफ़ोर्निया की स्थानीयता उसका भूगोल नहीं है। यह गीत पॉप संस्कृति, उपभोक्तावाद, अमेरिकी सफलता की मरीचिका और आधुनिक जीवन की थकान को समझने का यह एक स्थायी रूपक बन गया।
गीत की बुनियाद एक ऐसे होटल पर टिकी है जो किसी अँधेरी, उजाड़ सड़क के किनारे स्थित है। इसका मालिक कौन है? क्या यह कैलिफ़ोर्निया में है? इन सवालों का कोई निश्चित उत्तर नहीं है। होटल का भीतरी संसार आनंद, उपभोग और मादक सुखों से भरा हुआ है। यहाँ प्रश्न है कि क्या यह गीत नैरेटर की आँखों से देखा गया दृश्य है, जो ‘warm smell of colitas’ के प्रभाव में है? या फिर ‘Hotel California’ वास्तव में वैसा ही है, जैसा वह उसका वर्णन करता है?
यहाँ समय स्थिर और अनंत हो जाता है। यहाँ कमरे अनंत हैं, आकर्षण अनंत है। ईगल्स ने इसको ‘मासूमियत का अंत’ की तरह व्याख्यायित किया, लेकिन इसमें शोक का भी लोप है।
We are all just prisoners here
Of our own device.
यहाँ ‘चेक आउट’ करने की Free will तो है, लेकिन मुक्ति नहीं। यही इस होटल की सबसे विचित्र संरचना है। यह होटल और उसके भीतर सबकुछ लगातार चलता रहता है : शराब, दर्पण, संगीत, झूमर, गलियारों में तैरती धीमी आवाज़ें। यह एक ‘एलिगरी’ की तरह पढ़ा और सुना जाता है, क्योंकि यह कहीं नहीं है; और हर जगह है, हर उस जगह जहाँ सुख, विस्मृति और उपभोग का अंतहीन संसार है, जहाँ क्षरण और विघटन है और सुखवादी मरीचिकाएँ हैं, वहाँ होटल कैलिफ़ोर्निया है।
गॉडफ़ादर
‘The Godfather’ में माइकल कोरलियॉन शांत, संयमित, ख़ूबसूरत और बेहद संकोची दिखने वाला किरदार है, हिंसा और क्रूरता के पारंपरिक चित्रण से बिल्कुल अलग। शुरुआत में वह परिवार के कारोबार से दूरी बनाए रखने वाला, अपेक्षाकृत ‘सामान्य’ दिखता युवक है।
लुई’ज़ रेस्तराँ वह जगह है, जहाँ माइकल पहली बार इतालवी-अमेरिकी परिवारों की हिंसा, प्रतिशोध और सत्ता की दुनिया में सचमुच प्रवेश करता है। सोलोज़्ज़ो और पुलिस कप्तान मैक्लस्की की हत्या के बाद वही माइकल, धीरे-धीरे कोरलियॉन परिवार की धुरी बन जाता है। परिवार-युद्ध की शुरुआत इसी छोटे-से रेस्तराँ की मेज़ पर होती है।
लुई’ज़ रेस्तराँ फ़िल्म में किसी भव्य या यादगार सिनेमाई स्पेस की तरह प्रस्तुत नहीं होता। वह न्यूयॉर्क के ब्रॉन्क्स का एक साधारण अमेरिकी-इतालवी रेस्तराँ है। गॉडफ़ादर आने के कुछ समय बाद वह रेस्तराँ वास्तव में बंद भी हो गया था। दृश्य के भीतर धीमी आवाज़ों में बातचीत चलती है, खाना परोसा जाता है, वेटर आते-जाते हैं। पुलिस कप्तान मैक्लस्की, सोलोज़्ज़ो से पूछता है कि इस रेस्तराँ का खाना कैसा है और सोलोज़्ज़ो उसे veal खाने का सुझाव देता है।
लेकिन जब माइकल बाथरूम से छुपाई हुई पिस्तौल निकालकर वापस मेज़ पर आता है, तब रेस्तराँ भोजन और आतिथ्य का स्थान नहीं रह जाता। अब लुई’ज़ रेस्तराँ एक संक्रमण-बिंदु है। रेस्तराँ में बैठा माइकल और वहाँ से बाहर निकलता माइकल—एक ही व्यक्ति नहीं रह जाते।
लुई’ज़ रेस्तराँ अब अपनी जगह पर नहीं है। उस पर कोई शोक या प्रतिक्रियाएँ भी नहीं बचीं। वह एक असल जगह की काल्पनिक मौजूदगी है।
अन्य जगह-जगह 2.0 यहाँ पढ़िए : पुणे के बहाने | ईरान में भारत का ख़्वाब : शाहनामा में पंचतंत्र और शतरंज | माई नेम इज़ रेड : फ़ारसी मिनिएचर, नक़्क़ाशख़ाना और पूर्व-पश्चिम का द्वंद्व | मोबी-डिक : सनक, साहस और समुद्र की कथा | द मैजिक माउंटेन : मनुष्य-चेतना पर महामारी के चिह्न
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट