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कन्फ्यूशियस

551 BCE - 479 BC

कन्फ्यूशियस के उद्धरण

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यदि तुम मनुष्यों से प्रेम करते हो और वे मैत्री का व्यवहार नहीं करते, तो अपने प्रेम की समीक्षा करो। यदि तमु शाशन करते हो और लोग नियंत्रित नहीं होते, तो अपनी बुद्धि की जाँच करो। यदि तुम दूसरों के प्रति शिष्टता का व्यवहार करते हो और वे तुम्हारे प्रति नहीं करते तो, अपने आत्म-सम्मान की समीक्षा करो। यदि तुम्हारे कार्य निरर्थक होते हैं, तो उसके कारण को अपने अंदर ढूँढ़ो।

अपनी वाणी, व्यवहार और विचारों पर ध्यान दो और यह सदा स्मरण रखो कि ईश्वर सभी जगह मौजूद है।

सज्जनता तथा करूणा-संपन्न होने का अर्थ है—दूसरों के प्रति सहानूभूति रखना, मनुष्य मात्र के प्रति प्रेम रखना, और अपने स्वार्थ का त्याग करना।

यदि कोई एक वस्तु है, जिसका मनुष्य को सदा तथा प्रतिदिन पालन करना चाहिए, तो वह यही है कि अपने प्रति जिस व्यवहार को अच्छा समझे, दूसरों के प्रति कभी करे।

मनुष्य अपने से उच्च पदस्थ व्यक्तियों के व्यवहार में जिन बुराईयों को पाता है, उनका अपने से निम्नपदस्थ व्यक्तियों के प्रति आचरण करे। अपने निम्नपदस्थ व्यक्तियों के व्यवहार में जो दुर्बलताएँ पाता है, उनका अपने से उच्च पदस्थ व्यक्तियों के प्रति आचरण करे।

अपने बल का अभिमान मत करो, क्योंकि तुमसे अधिक बलवान व्यक्ति संसार में अवश्य हैं।

जो छोटी वस्तुओं के पीछे दौड़ता है, वह महान कार्य नहीं कर पाता।

सचाई ईश्वरीय मार्ग है। पूर्ण सचाई से संपन्न ऐसा एक व्यक्ति भी नहीं हुआ, जिसने दूसरों को प्रभावित किया हो। बिना सचाई के ऐसा एक व्यक्ति भी नहीं हुआ, जिसने दूसरों को प्रभावित किया हो।

जो अपने से अधिक आशा करता है और दूसरों से कम, वह किसी की घृणा का शिकार नहीं होता।

किसी पद को प्राप्त करने की चिंता के स्थान पर, अपने को उस पद के योग्य बनाने की चिंता करो। अपनी प्रसिद्धि होने के विषय में चिंता करने के बजाए, अपने को प्रसिद्धि प्राप्त करने के योग्य बनाओ।

मनुष्य का दोष यह है कि वह दूसरों का शिक्षक होना चाहता है। छोटा मनुष्य अपने दोषों को कभी नहीं देखता।

छोटा मनुष्य समझता है कि भलाई के छोटे-छोटे कार्यों से कोई लाभ नहीं होता, और साधारण बुराई के कार्यों से कोई हानि नहीं होती। उसक फल यह होता है कि उसकी बुराई इतनी बढ़ जाती है कि छिप नहीं सकती, और उसका अपराध क्षम्य नही समझा जा सकता।

सज्जन मनुष्य स्वयं कष्ट उठाता है, दूसरों को कष्ट में नहीं डालता।

मनुष्य का सबसे बड़ा रोग है, स्वधर्म का पालन करना तथा परधर्म को अपनाना।

बिना विचार का अध्ययन निरर्थक होता है और बिना अध्ययन का विचार ख़तरनाक होता है।

बात-चीत के योग्य पुरुष से मिलने पर यदि तुम बात नहीं करते, तो तुमने अपने योग्य पुरूष को खो दिया। साथ ही बात करने के अयोग्य पुरूष से मिलने पर यदि तुम बात करते हो, तो तुमने अपने शब्दों को नष्ट किया

जो स्वयं गिरा होता है, वह दूसरों को नहीं उठा सकता।

किसी कार्य को आरंभ करने के पहले, उसके उद्देश्य का विचार कर लेना आवश्यक है। तब उद्देश्य की प्राप्ति बिना कष्ट उठाए ही हो जाती है।

सत्य कभी मनुष्य के स्वभाव से अलग नहीं होता। जो सत्य समझा जाता है, वह यदि मनुष्य से अलग हो जाए तो वह सत्य नहीं है।

बुद्धिमान व्यक्ति योग्य पुरूष को खोता है, अपने शब्दों को।

सेवाएँ अनेक हैं, किंतु अपने माता-पिता की सेवा करना उन सब का मूल है।

सज्जन मनुष्य अपनी क्षुद्रता से दुःखी होता है, दूसरे के कमी पर ध्यान नहीं देता।

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