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माघ

माघ के उद्धरण

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समय पर किया हुआ सब कुछ उपकारक होता है।

महान पुरुष तो शरणागत शत्रुओं पर भी अनुग्रह करते हैं। बड़ी नदियाँ अपनी सपत्नी पहाड़ी नदियों को भी सागर तक पहुँचा देती हैं।

बुद्धिमान क्रोध के वेग को जीत लेते हैं तथा क्षुद्र लोग क्रोध से तत्काल ही पराजित हो जाते हैं।

कार्य-सिद्धि के उपायों में लगे रहने वाले भी असावधानी से अपने कार्यों को नष्ट कर देते हैं।

अपनी वृद्धि और शत्रु की हानि—यही दो नीति की बात हैं। इन्हीं दोनों बातों को स्वीकार कर कुशल मनुष्य अपनी वाक्पटुता का विस्तार करते हैं।

तीक्ष्ण बुद्धि वाले लोग बाण की भाँति बहुत थोड़ा स्पर्श करते हैं किंतु अंतः प्रविष्ट हो जाते हैं और मंद बुद्धि वाले लोग पत्थर की भाँति बहुत स्पर्श करने पर भी बाहर ही रह जाते हैं।

सूर्य के निकल आने पर दिन की शोभा को कौन क्षति पहुँचा सकता है?

विपक्ष का विनाश किए बिना प्रतिष्ठा दुर्लभ रहती है। धूलि को कीचड़ बनाए बिना पानी नहीं ठहरता।

छोटे लोगों के गुण का वर्णन करने वाला अन्य कोई नहीं मिलता, अतएव वह स्वयं ही उसे कहता है।

निश्चय ही तेजस्वी लोग भी धीरे-धीरे ही वृद्धि प्राप्त करते हैं, सहसा नहीं।

सभी लोग उपस्थित आश्रय को क्षीण होते देखकर अनागत आश्रय को अपनाते हैं।

महापुरुषों का यह नित्य का व्यवहार है कि वे परस्पर उपकार करते हैं।

शत्रुओं के ऊँचे मस्तक पर लीला पूर्वक पैर रखे बिना ही आलंबनरहित कीर्ति स्वर्ग कैसे चढ़ सकती है?

श्रेय के विषय में किसे संतोष होता है?

महापुरुषों का सब कुछ अलौकिक ही होता है।

दूर होने पर भी तेजस्वी की गणना तेजस्वियों में ही होती है।

दुष्ट लोग अपने दोष के संबंध में जन्मांध से होते हैं और दूसरे का दोष देखने में दिव्य नेत्र वाले होते हैं। वे अपने गुण का वर्णन करने में गला फाड़-फाड़कर बोलते हैं और दूसरे की स्तुति के समय मौन व्रत धारण कर लेते हैं।

अतिशय प्रेम अनेक बार परिचित वस्तु को भी नया-नया कर देता है।

दुष्ट बुद्धि वाला व्यक्ति अपने दोष से महापुरुषों का अतिक्रमण करता हुआ नष्ट होता है। अग्नि स्वेच्छा से शलभों को ईंधन नहीं बनाती।

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