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कुँवर नारायण

1927 - 2017 | फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश

समादृत कवि-आलोचक और अनुवादक। भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित।

समादृत कवि-आलोचक और अनुवादक। भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित।

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कविता में ‘मैं’ की व्याख्या केवल आत्मकेंद्रण या व्यक्तिवाद के अर्थ में करना

उसके बृहतर आशयों और संभावनाओं दोनों को संकुचित करना है।

अगर राजनीति के बाहर भी स्वतंत्रता के कोई मतलब हैं तो हमें उसको एक ऐसी भाषा में भी खोजना, और दृढ़ करना होगा जो राजनीति की भाषा नहीं है।

राजनीति जितनी ‘ठोस’ ऊपर से दिखाई देती है, अंदर से उतनी ही क्षतिग्रस्त और जर्जर हो सकती है।

कोई भी कला सबसे पहले रचनात्मकता का अनुभव है। रचनात्मकता ही एक कला का प्रमुख विषय (content) होता है।

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साहित्य को केवल सामाजिक होना है, बल्कि विवेकशील ढंग से सामाजिक होना है, यह बात आधुनिक नहीं लगती कि साहित्यकार अपने आपको सुशिक्षित रखने की ज़िम्मेदारी से बचे।

भाषा का बहुस्तरीय होना उसकी जागरूकता की निशानी है।

आधुनिकता का अर्थ वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ा है।

आधुनिकता एक मूल्य नहीं है, मूल्य के प्रति एक दृष्टि है।

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लोग हमेशा वही नहीं चाहते जो उनके लिए हितकर हो।

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आज की कविता, बल्कि किसी भी कविता, को सोचने-समझने के लिए पाठकों को अपनी ओर से भी बहुत-कुछ जोड़ना पड़ता है।

रचनात्मक प्रक्रिया के सिलसिले में ‘बौद्धिक’ शब्द से जो ध्वनि निकलती है, वह तनिक भ्रामक है।

काव्य-रचना का एक अर्थ मनुष्य की कल्पनाशील चेतना का उद्दीपन है।

कविता यथार्थ को नज़दीक से देखती, मगर दूर की सोचती है।

भाषा को जीवन और रचनाकार बनाते हैं।

श्रेष्ठ कविता रिवाज़ी क़िस्म की समीक्षा को बिल्कुल सह नहीं पाती है, उसे तत्काल ख़ारिज कर देती है!

दुनिया जैसी है और जैसी उसे होना चाहिए के बीच कहीं वह एक लगातार बेचैनी है।

आधुनिक युग हर चिंतनशील प्राणी से एक नई तरह की ज़िम्मेदारी की माँग करता है जिसका बहुत ही महत्त्वपूर्ण संबंध हमारे सोचने के ढंग से है।

प्रबल कविता उन बंधनों को तोड़ देती है, जो उसे बाँधना चाहते हैं।

विषम समयों में कविता की चुप्पी भी एक चीत्कार की तरह ध्वनित होती रही है। यह चुप्पी केवल कविता की चुप्पी नहीं, एक सामाजिक चेतना की घुटन भरी चीख़ है।

श्रेष्ठ कलाओं में अंतर्विरोध नहीं होता, विभिन्नताओं का समन्वय और सहअस्तित्व होता है।

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साहित्य की प्रमुख चिंता इसमें है कि वह उन स्थायी सचाइयों पर भी हमारी पकड़ ढीली होने दे जिन पर एक उदार और मानवीय संस्कृति की नींव पड़नी चाहिए।

जीवन-बोध, केवल वस्तुगत नहीं, चेतना-सापेक्ष होता है, और साहित्य की निगाह दोनों पर रहती है।

भाषा के पर्यावरण में कविता की मौजूदगी का तर्क जीवन-सापेक्ष है : उसके प्रेमी और प्रशंसक हमेशा रहेंगे—बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन बहुत समर्पित!

किसी भी कला का जीवन अपने में अकेला होते हुए भी संदर्भ-बहुल भी होता है।

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साहित्य मेरी दृष्टि में किसी एक पक्ष की वकालत होकर दो या दो से अधिक पक्षों की अदालत है। इस अदालत का न्यायप्रिय, संतुलित, निष्पक्ष और मानवीय होना मैं बहुत ज़रूरी समझता हूँ।