कुँवर नारायण के उद्धरण
भाषा के पर्यावरण में कविता की मौजूदगी का तर्क जीवन-सापेक्ष है : उसके प्रेमी और प्रशंसक हमेशा रहेंगे—बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन बहुत समर्पित!
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विषम समयों में कविता की चुप्पी भी एक चीत्कार की तरह ध्वनित होती रही है। यह चुप्पी केवल कविता की चुप्पी नहीं, एक सामाजिक चेतना की घुटन भरी चीख़ है।
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जिस दिन साहित्य को मैं अपनी प्राथमिक ज़मीन मानकर नहीं लिखूँगा, मेरे लिए पूरे उत्साह और ईमानदारी से लिखना असंभव हो जाएगा।
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दुनिया जैसी है और जैसी उसे होना चाहिए के बीच कहीं वह एक लगातार बेचैनी है।
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भारतीयता, समकालीनता, स्थानीयता, सामाजिकता आदि के हम कला में क्या अर्थ लगाते हैं, यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि इनका आज हमारे जीवन में क्या अर्थ है।
समीक्षा की संस्कृति मनुष्य के सांस्कृति विकास, बल्कि उसकी संस्कृति और विकास के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई चेष्टा है।
रचनात्मकता का मनोविज्ञान समय के साथ भी एक ख़ास तरह का रिश्ता है—अपने समय के साथ, अपने से पहले समय के साथ और आनेवाले समय के साथ।
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श्रीकांत वर्मा का 'मगध'; राजनीतिक कुचक्र में फँसे एक संवेदनशील मन का इतिहास में संतरण है, जहाँ से वह वर्तमान को एक धुँध की तरह चित्रित करता है।
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अपनी समग्रता और जीवनपरकता में मुक्तिबोध की कविताएँ जिन मानवीय आयामों को छूती हैं, उनमें कविता के बृहत्तर उद्देश्यों की व्यापकता, ईमानदारी और ताक़त है।
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निराला का निजी संसार उनकी कविता का उतना ही आवश्यक हिस्सा है, जितना वह समाज जिसमें वे जी रहे थे।
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मलयज की निगाह से कविता को पढ़ना, एक कवि की परिष्कृत संवेदना और एक समीक्षक के धीर विवेक से कविता को पढ़ना है।
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एक कवि में अगर दूर तक सोच सकने की ताक़त नहीं; तो उसकी कविता या तो यथार्थ की सतह को खरोंचकर रह जाएगी, या किसी भी आदर्श से चिपककर।
आधुनिकता का एक तात्पर्य जहाँ अपनी जड़ों की छानबीन है (अपनी स्थानीयता, इतिहास, परंपरा आदि में), वहीं उसका दूसरा तात्पर्य कलात्मक अभिव्यक्ति की उन श्रेष्ठतम उपलब्धियों की जानकारी भी है, जिनसे कला का इतिहास बना है।
अतीत, परंपरा, वर्तमान, भविष्य : इनकी लगातार उपस्थिति का बोध, या इनमें से किसी एक की अति-उपस्थिति का बोध निर्धारित करता है कि एक कलाकार अपने समय में मनुष्य की स्थिति और उसकी आधुनिकता को, अपनी रचनाओं में किस तरह ग्रहण और परिभाषित करता है।
समय, गति, परिवर्तन, आत्मा, मन, रचनाशीलता आदि की प्रकृति को विज्ञान जब भी समझने चलता है, तो उसकी विचार-पद्धति और भाषा चल को अचल में बदल देती है—जबकि रचना-शक्ति एक निरंतर प्रवाहित ऊर्जा है।
आज भी आदमी जो कुछ अपने बारे में जानता है और अपनी दुनिया के बारे में जानता है, उसके बीच सही और जीवंत रिश्तों की खोज—कलाओं की एक सार्थक कोशिश है।
प्रसाद के साहित्य में मुझे जो कमी महसूस होती है, वह कला की नहीं—कला और जीवन के बीच घनिष्ठता की है।
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शिल्प या भाषा वहीं कठिनाई उत्पन्न करते हैं, जहाँ वे कविता के रचनात्मक तर्क से निकले हुए नहीं लगते—कथ्य पर उपर से आरोपित लगते हैं, या फिर वहाँ; जहाँ कवि के पास भाषा और शिल्प तो हो, पर ज़रूरी कुछ कहने को न हो।
'आधुनिकता' विशुद्ध भौतिक संदर्भ में हमारे जीवन में वह बदलाव है, जो विज्ञान और औद्योगीकरण की वजह से आया है। आधुनिक कला एक माने में उस बदलाव के साथ नए, कलापूर्ण और सार्थक रिश्तों की तलाश है।
कबीर या ग़ालिब की भाषा अक्सर यह भ्रम उपजाती है कि वह आसान है, क्योंकि उसमें पहचाने जा सकनेवाले रोज़ की भाषा के शब्द हैं। लेकिन उनकी कविता वस्तुतः शब्द-कठिन नहीं, अर्थ-कठिन कविता है।
साहित्य जहाँ जीवन की मात्र व्यावसायिक चेष्टा न होकर; सर्वप्रथम उसके कला-पक्ष की अभिव्यक्ति है, वहाँ साहित्य और जीवन का संबंध दूसरा होगा। रचा जाने के बाद साहित्य भी उसी जीवन का यथार्थ एवं घनिष्ठ अंग बन जाता है, जिससे वह उत्पन्न होता है।
साही की प्रगतिशीलता भारतीय जीवन-पद्धति का निषेध नहीं है, नए और ज़रूरी को निष्पक्षता से जाँच कर स्वीकार या अस्वीकार करने की सतर्कता है।
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चरित्रहीन राजनीति, भ्रष्ट समाज, विकृत अप-संस्कृति—सभी अपनी-अपनी तरह भाषा को प्रदूषित करते हैं।
मुक्तिबोध जब 'फंतासी' की विधा में कुछ कहना चाहते हैं; तो इसका यह मतलब नहीं कि वे 'सामाजिकता' से पलायन कर रहे हैं, जिसका एक रूप 'फंतासी' भी है।
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संतुलित बुद्धि और उदार संवेदनशीलता से साहित्य अपने चारों तरफ़ देखता है—केवल राजनीति की ही तरफ़ नहीं, न किसी एक ही जगह खड़े होकर।
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साहित्य की चिंता, वैसे भी सही फ़ैसले की चिंता है, जो हमें एक ज़्यादा बड़े चिंतन-क्षेत्र में ले जाती है। जहाँ हम मनुष्य के कल्याण और समृद्धि के अर्थ को केवल भौतिक नहीं, उससे ज़्यादा बड़े परिप्रेक्ष्य में सोचते हैं।
कविता मनुष्य के दिल और दिमाग़ के जितना ही नज़दीक अपनी जगह बनाएगी, उसके लिए जीवित रहना उतना ही संभव और अर्थपूर्ण होगा।
जितना प्रतिभाशाली लेखक होगा, उतनी ही कुशलता से वह अर्जित ज्ञान का मौलिक अर्थ में उपयोग कर सकेगा।
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भरत मुनि का रस-सिद्धांत कला के सिद्धांतों का ही नहीं, मनुष्य के मनोभावों का भी विस्तृत विश्लेषण और वर्गीकरण है।
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आधुनिकता शब्द का रचनात्मक आशय; वर्तमान को केंद्र में रखते हुए अतीत और भविष्य के प्रति भी संचेत रहता है, इसलिए 'समकालीन' प्रत्यक्ष या 'तत्कालीन' जैसे शब्दों के साथ भी इसके गहरे और सतही दोनों संबंध हैं।
कविता भाषा में बँधती है और भाषा जीवन से बँधती है—जीवित वर्तमान के अनुभव तथा उन स्मृतियों के रूप में, जिन्हें वह झटककर अपने से अलग नहीं कर सकता।
कविता वैसे भी अन्य शाब्दिक कलाओं की अपेक्षा, सबसे ज़्यादा अपनी भाषाई संस्कृति से घनिष्ठ होती है।
एक कवि यथार्थ को अपनी संवेदना में, या अपनी संवेदना से परिवर्द्धित करता है—इस माने में कविता का 'मैं' जितना निर्वैयक्तिक होता है, उसका 'वे' उतना ही व्यक्तिगत।
ऐसी किसी भी व्यवस्था में; समालोचना या समीक्षा का वैज्ञानिक और नैतिक विकास न हो पाना स्वाभाविक है, जहाँ विचार प्रकट करने की पूरी छूट न हो।
यदि चलताऊ क़िस्म के साहित्य की माँग और प्रचार अधिक है, तो उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दूसरे क़िस्म का साहित्य असामाजिक और ऐकांतिक है, बल्कि यह कि जनसाधारण का स्तर प्रौढ़ता का स्तर नहीं। ऐसी दशा में साधारणीकरण या शायद निम्नस्तरीकरण पर अधिक ज़ोर देना, प्रौढ़ एवं गंभीर साहित्य की संभावनाओं को कुंठित करना होगा।
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एक महान् कवि या उपन्यासकार केवल कुछ ही कारणों से महान् नहीं होता, कई कारणों से होता है। उसकी महानता की एक कसौटी यह भी है कि उसका कृतित्व अनेक दृष्टिकोणों से व्याख्या को आमंत्रित करता है और उन पर खरा उतरता है।
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शमशेर उन ख़ास अर्थों में कवि हैं; जिन अर्थों में ज़्यादातार कवि, कवि नहीं हो पाते। क्योंकि उनके अंदर अपनी कला, अपने कवि-धर्म को लेकर पहली चिंता है।
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अच्छी समीक्षा का काम केवल सरलीकरणों और आसान समीकरणों में विचरण करना भर नहीं—एक ऐसे विवेक का परिचय देना भी है, जो विभिन्न रचनाओं या रचनाओं की विभिन्नताओं के बीच बारीक फ़र्क़ कर सके।
एक लेखक के सही मूल्यांकन के लिए ज़रूरी है कि हम युग के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर उसके विचार जान सकें, उस बुनियादी दृष्टिकोण को समझ सकें—जिस पर वास्तव में एक व्यक्ति का मूल्य निर्भर करता है।
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वस्तुजगत का यथावत् चित्रण वस्तुजगत का अनुभव हो सकता है, लेकिन कला का अनुभव भी तभी होगा, जब हम उसमें हम किसी प्रकार की रचनात्मक प्रतिभा और प्रेरणा को असंदिग्ध रूप से पहचान सकें।
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शमशेर की साहित्यिक चेतना में कला के सार्वभौमिक आदर्शों (यूनीवर्सलआइडल्स) की व्याप्ति है।
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एक जागरूक साहित्यकार के लिए जीवन की हर रचनात्मक चेष्टा से लिप्त होना; उतना ही रोचक और आवश्यक है, जितना जीवन से लिप्त होना।
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कविता का उत्स जैविक है, उसके लक्षण हमारे जीवाश्मों में बसे हैं—हमारे हृदय की गति और लय की तरह।
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शमशेर को पढ़ना केवल उनकी कविताओं के अर्थ को ग्रहण करना नहीं है, रचनात्मकता के अर्थ को भी अनुभव करना है।
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जीवन की विसंगतियों (ऐबसर्डिटीज़) का हल कबीर मनुष्य की तर्कबुद्धि में नहीं; उसकी रहस्यभावना, उसके श्रद्धा और विश्वासों में देखते हैं।
राम या कृष्ण की दैवी छवि के 'भाव' का; एक परिचित अभिनेता के व्यक्तित्व में विघटित हो जाना उस आदि मिथक-शक्ति का अवमूल्यन है, जिसे कविता आह्वानात्मक ढंग से इस्तेमाल करती है।
कविता में शब्दों की सत्ता, बोलचाल की भाषा में शब्दों की सत्ता से अलग होती है। क्योंकि वे केवल प्रत्यक्ष अर्थ नहीं; परोक्ष अर्थ की ज़रूरतों से भी निदेशित होते हैं, इसलिए उनकी भाषिक संरचना ऊपर से सामान्य दिखते हुए भी सामान्य नहीं होती।
एक महान् कवि की कला; जीवन और सृष्टि का संपूर्ण विस्तार और विविधता माँगती है, जिसे वह भाषा में टटोलता और रूपायित करता है।