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बिहारी

1595 - 1664 | ग्वालियर, मध्य प्रदेश

रीतिसिद्ध कवि। ‘सतसई’ से चर्चित। कल्पना की मधुरता, अलंकार योजना और सुंदर भाव-व्यंजना के लिए स्मरणीय।

रीतिसिद्ध कवि। ‘सतसई’ से चर्चित। कल्पना की मधुरता, अलंकार योजना और सुंदर भाव-व्यंजना के लिए स्मरणीय।

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अर तैं टरत वर-परे, दई मरक मु मैन।

होड़ा-होड़ी बढ़ि चले चित, चतुराई नैन॥

एक सखी दूसरी सखी से कह रही है कि ऐसा प्रतीत होता है कि कामदेव रूपी नायक की प्रेरणा से ‘चित-चातुरी’ और ‘नयन-विस्तार’ रूपी दूती और दूत में इस बात की स्पर्धा जगी हुई है कि नायिका के शरीर को कौन कितनी शीघ्रता से काम के प्रभाव से प्रभावित कर पाता है। वास्तविकता यह है कि नायिका के शरीर में यौवनोन्मेष के साथ-साथ उसके चित्त की चपलता और नेत्रों का विस्तार बढ़ता जा रहा है। इन दोनों अंगों में कौन अधिक बढ़ा है या गतिमय हुआ है, यह निर्णय करना कठिन हो गया है। यही कारण है कि बिहारी ने मनोगत चंचलता की वृद्धि और नेत्रों के विस्तार की गति में होड़ की कल्पना की है।

खरी पातरी कान की, कौन बहाऊ बानि।

आक-कलीन रली करै अली, अली, जिय जानि॥

हे सखी, तू कान की बड़ी पतली अर्थात् कच्ची है। पता नहीं, तुझमें कौन-सी बुरी आदत है कि तू बिना सम्यक् विचार किए सबकी बातों पर यों ही विश्वास कर लेती है। मैं तुझे समझाते हुए यह कहना चाहती हूँ कि तू मेरी बात को निश्चित रूप से सत्य मान ले कि भ्रमर किसी स्थिति में आक की कली से विहार नहीं कर सकता है। अर्थात् तुम्हारा प्रेयस किसी अन्य स्त्री का संसर्ग कभी नहीं करेगा।

मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।

जा तन की झाँई परैं, स्यामु हरित-दुति होइ॥

इस दोहे के तीन अलग-अलग अर्थ बताए गए हैं।

पिय−बिछुरन कौ दुसहु दुखु, हुरषु जात प्यौसार।

दुरजोधन लौं देखयति तजत प्रान इहि बार॥

एक नायिका अपनी ससुराल से अपने पीहर जा रही है। अतः एक ओर तो उसे अपने पिता के घर जाने के सुख है तो दूसरी ओर अपने प्रियतम के बिछोह का दुःख भी है। कवि बिहारी ने नायिका की इस सुख-दुःखमय मनोस्थिति की समानता दुर्योधन के अंतकाल से प्रकट की है। बिहारी कह रहे हैं कि पीहर जाती हुई नायिका को पीहर जाने का तो हर्ष है और अपने प्रियतम से बिछुड़ने का दुःख हो रहा है। इस प्रकार इस बार जाते समय उस नायिका की वही स्थिति है जो दुर्योधन की प्राणांत होते समय की थी।

पाइ महावरु दैंन कौं नाइनि बैठी आइ।

फिरि फिरि, जानि महावरी, एड़ी मीड़ति जाइ॥

नाइन नायिका के महावर लगाने के लिए आई हुई है। वह पैरों में महावर लगाने के लिए आती है और नायिका के समक्ष बैठ जाती है। नाइन महावरी अर्थात् लाल रंग से सराबोर कपड़ा कहीं रखकर भूल जाती है और भ्रम से नायिका की एड़ी को ही महावरी समझ बैठती है, क्योंकि नायिका की एड़ी इतनी कोमल और लाल है कि नाइन को भ्रम हो जाता है और परिणाम स्वरूप वह बार-बार नायिका की एड़ियों को मींड़ती जाती है।

संपति केस, सुदेस नर नवत, दुहुति इक बानि।

विभव सतर कुच, नीच नर, नरम विभव की हानि॥

केश और श्रेष्ठ पद वाले व्यक्ति संपत्ति के कारण नम्र हो जाते हैं या झुकने लगते हैं, किंतु उरोज और नीच नर वैभवहीन होने पर ही झुकते हैं। कवि कह रहा है कि केश-वृद्धि प्राप्त करके झुकने लगते हैं। यही स्थिति अच्छे पद पर स्थित सत्पुरुषों की होती है। सत्पुरुष भी अच्छा पद प्राप्त करके या समृद्धि प्राप्त करके झुकने लगते हैं। नीच लोगों की स्थिति इसके विपरीत होती है। कुच और नीच मनुष्य वैभवहीन होकर ही झुकते हैं। उरोज यौवन का वैभव पाकर कठोर हो जाते हैं, किंतु वैभवहीन होते ही अर्थात् यौवन समाप्त होते होती ही वे शिथिल हो जाते हैं। यही स्थिति नीच मनुष्यों की होती है। वे ऐश्वर्य पाकर तो कठोर होते हैं, किंतु ऐश्वर्यहीन होकर विनम्रता धारण कर लेते हैं।

जुवति जोन्ह मैं मिलि गई, नैंक होति लखाइ।

सौंधे कैं डोरैं लगी अली, चली सँग जाइ॥

अभिसार के लिए एक नायिका अपनी सखी के साथ चाँदनी रात में जा रही है। आसमान से चाँदनी की वर्षा हो रही है और धरती पर नायिका के शरीर का रंग भी चाँदनी की तरह उज्ज्वल और गोरा है। ऐसी स्थिति में नायिका का शरीर चाँदनी में लीन हो गया है। सखी विस्मय में पड़ गई है कि नायिका कहाँ है? ऐसी स्थिति में वह केवल नायिका के शरीर की गंध के सहारे आगे बढ़ती जा रही है। इसी स्थिति का वर्णन करते हुए बिहारी कह रहे हैं कि नायिका अपने गौर और स्वच्छ वर्ण के कारण चाँदनी में विलीन हो गई है। उसका स्वतंत्र और पृथक् अस्तित्व दिखलाई नहीं दे रहा है। यही कारण है कि उसके साथ चलने वाली सखी नायिका के शरीर से आने वाली पद्म गंध का सहारा लेकर साथ-साथ चली जा रही है।

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लतियात।

भरे भौन मैं करत हैं, नैननु ही सब बात॥

सखी कह रही है कि नायक अपनी आँखों के इशारे से कुछ कहता है अर्थात् रति की प्रार्थना करता है, किंतु नायिका उसके रति विषयक निवेदन को अस्वीकार कर देती है। वस्तुतः उसका अस्वीकार स्वीकार का ही वाचक है तभी तो नायक नायिका के निषेध पर भी रीझ जाता है। जब नायिका देखती है कि नायक इतना कामासक्त या प्रेमासक्त है कि उसके निषेध पर भी रीझ रहा है तो उसे खीझ उत्पन्न होती है। ध्यान रहे, नायिका की यह खीझ भी बनावटी है। यदि ऐसी होती तो पुनः दोनों के नेत्र परस्पर कैसे मिलते? दोनों के नेत्रों का मिलना परस्पर रति भाव को बढ़ाता है। फलतः दोनों ही प्रसन्नता से खिल उठते हैं, किंतु लज्जित भी होते हैं। उनके लज्जित होने का कारण यही है कि वे यह सब अर्थात् प्रेम-विषयक विविध चेष्टाएँ भरे भवन में अनेक सामाजिकों की भीड़ में करते हैं।

नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं बिकासु इहिं काल।

अली कली ही सौं बंध्यौ, आगैं कौन हवाल॥

नायिका में आसक्त नायक को शिक्षा देते हुए कवि कहता है कि तो अभी इस कली में पराग ही आया है, मधुर मकरंद ही तथा अभी इसके विकास का क्षण ही आया है। अरे भौरे! अभी तो यह एक कली मात्र है। तुम अभी से इसके मोह में अंधे बन रहे हो। जब यह कली फूल बनकर पराग तथा मकरंद से युक्त होगी, उस समय तुम्हारी क्या दशा होगी? अर्थात् जब नायिका यौवन संपन्न सरसता से प्रफुल्लित हो जाएगी, तब नायक की क्या दशा होगी?

तंत्री नाद, कबित्त रस, सरस राग, रति-रंग।

अनबूड़े बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग॥

वीणा आदि वाद्यों के स्वर, काव्य आदि ललित कलाओं की रसानुभूति तथा प्रेम के रस में जो व्यक्ति सर्वांग डूब गए हैं, वे ही इस संसार-सागर को पार कर सकते हैं। जो इनमें डूब नहीं सके हैं, वे इस भव-सिंधु में ही फँसकर रह जाते हैं अर्थात् संसार-का संतरण नहीं कर पाते हैं। कवि का तात्पर्य यह है कि तंत्री-नाद इत्यादि ऐसे पदार्थ हैं जिनमें बिना पूरण रीति से प्रविष्ट हुए कोई भी आनंद नहीं मिल पाता है। यदि इनमें पड़ना हो तो पूर्णतया पड़ो। यदि पूरी तरह नहीं पड़ सकते हो तो इनसे सर्वथा दूर रहना ही उचित श्रेयस्कर है।

अपने अँग के जानि कै जोबन-नृपति प्रवीन।

स्तन, मन, नैन, नितंब कौ बड़ौ इजाफा कीन॥

यौवन रूपी प्रवीण राजा ने नायिका के चार अंगों पर अपना अधिकार कर लिया है। उन अंगों को अपना मानते हुए अपनी सेना के चार अंग स्वीकार कर उनकी वृद्धि कर दी है। ऐसा उसने इसलिए किया है कि वे सभी अंग उसके वश में रहे। ये चार अंग यौवन रूपी राजा की चतुरंगिणी सेना के प्रतीक हैं। ये अंग हैं−स्तन, मन, नेत्र और नितंब। स्वाभाविक बात यह है कि जब यौवनागम होता है तब स्वाभाविक रूप से शरीर के इन अंगों में वृद्धि होती है। जिस प्रकार कोई राजा अपने सहायकों को अपना मानकर उनकी पदोन्नति कर देता है, उसी प्रकार यौवनरूपी राजा ने स्तन, मन, नेत्र और नितंब को अपना मान लिया है या अपना पक्षधर या अपने ही अंग मानते हुए इनमें स्वाभाविक वृद्धि कर दी है।

अंग-अंग-नग जगमगत दीप-सिखा सी देह।

दिया बढाऐं हूँ रहै बड़ौ उज्यारौ गेह॥

दूती नायक से कह रही है कि देखो, नायिका की देह आभूषणों में जड़े हुए नगों से दीप-शिखा के समान दीपित हो रही है। घर में यदि दीपक बुझा दिया जाता है तब भी उस नायिका के रूप के प्रभाव से चारों ओर प्रकाश बना रहता है। दूती ने यहाँ नायिका के वर्ण-सौंदर्य के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व में उदित होने वाली शोभा, दीप्ति और कांति आदि की अतिशयता को भी व्यक्त कर दिया है।

बेसरि-मोती-हुति-झलक परी ओठ पर आइ।

चूनौ होइ चतुर तिय, क्यों पट-पोछयों जाइ॥

नाक में पहने गए बेसर में गुँथे मोतियों की सफ़ेद झलक ओठों पर पड़ रही है। नायिका उसे चूने का दाग़ समझकर दर्पण में देखकर छुड़ाना चाहती है। सखी कहती है कि हे चतुर सखी, यह चूना नहीं है। यह तो तेरे ओंठ पर मोती की द्युति आकर पड़ी है। अतः यह वस्त्र से पोंछने से क्योंकर जा सकती है? अर्थात् वस्त्र से छुड़ाने पर वह नहीं छूटेगी।

गदराने तन गोरटी, ऐपन-आड़ लिलार।

हूठ्यौ दै, इठलाइ दृग करै गँवारि सुवार॥

ग्रामीण नायिका की अदा पर रीझकर नायक कह रहा है कि यह गदराए हुए शरीर वाली गोरी ग्रामीणा अपने ललाट पर ऐपन का आड़ा तिलक लगाए हुए, कमर पर हाथ रखे हुए इठला-इठला कर अपनी आँखों से घायल किए दे रही है। अभिप्राय यह है कि नायिका यद्यपि ग्रामीण है, फिर भी वह अपने कटाक्षों और हाव-भाव आदि के द्वारा नायक को आकृष्ट कर रही है।

कागद पर लिखत बनत, कहत सँदेसु लजात।

कहि है सबु तेरौ हियौ मेरे हिय की बात॥

नायिका अपने प्रेयस को पत्र लिखने बैठती है तभी या तो उसके हाथ काँपने लगते हैं या वह भावावेश में आकर इतनी भाव-विभोर हो जाती है कि कंपन स्नेह अश्रु जैसे सात्विक भाव काग़ज़ पर अक्षरों का आकार नहीं बनने देते। इसके विपरीत यदि वह किसी व्यक्ति के माध्यम से नायक के पास संदेश भेजे तो यह समस्या उठ खड़ी होती है कि किसी दूसरे व्यक्ति से अपने मन की गुप्त बातें कैसे कहे? स्पष्ट शब्दों में संदेश कहने में उसे लज्जा का अनुभव होता है। विकट परिस्थिति है कि नायिका तो पत्र भेज सकती है और संदेश ही प्रेषित कर सकती है। इस विषमता से ग्रस्त अंततः वह हताश होकर ख़ाली काग़ज़ का टुकड़ा बिना कुछ लिखे ही नायक के पास भेज देती है। इस काग़ज़ के टुकड़े को भेजने के साथ वह यह अनुमान लगा लेती है कि यदि नायक के मन में भी मेरे प्रति मेरे जैसा ही गहन प्रेम होगा तो वह इस ख़ाली काग़ज़ को देखकर भी मेरे मनोगत एवं प्रेमपूरित भावों को स्वयं ही पढ़ लेगा।

पत्रा ही तिथि पाइयै वा घर कैं चहुँ पास।

नितप्रति पून्यौईं रहै आनन-ओप-उजास॥

नायिका के घर के चारों ओर इतना प्रकाश रहता है कि केवल पंचांग की सहायता से ही तिथि का पता लग सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि नायिका का मुख पूर्णिमा के चंद्रमा के समान सुंदर है। इसलिए नायिका के घर के चारों ओर हमेशा पूर्णिमा ही बनी रहती है, परिणाम स्वरूप तिथि की जानकारी ही नहीं हो पाती है। यदि कोई तिथि जानना चाहता है तो उसके लिए उसे पंचांग से ही सहायता लेनी पडती है।

तो पर वारौं उरबसी, सुनि, राधिके सुजान।

तू मोहन कैं उर बसी ह्वै उरबसी-समान॥

कृष्ण कहते हैं कि हे सुजान राधिके, तुम यह समझ लो कि मैं तुम्हारे रूप-सौंदर्य पर उर्वशी जैसी नारी को भी न्यौछावर कर सकता हूँ। कारण यह है कि तुम तो मेरे हृदय में उसी प्रकार निवास करती हो, जिस प्रकार उर्वशी नामक आभूषण हृदय में निवास करता है।

जपमाला, छापैं, तिलक सरै एकौ कामु।

मन-काँचे नाचै वृथा, साँचै राँचै रामु॥

माला लेकर किसी मंत्र-विशेष का जाप करने से तथा मस्तक एवं शरीर के अन्य अंगों पर तिलक-छापा लगाने से तो एक भी काम पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि ये सब तो आडंबर मात्र हैं। कच्चे मन वाला तो व्यर्थ में ही नाचता रहता है, उससे राम प्रसन्न नहीं होते। राम तो सच्चे मन से भक्ति करने वाले व्यक्ति पर ही प्रसन्न होते हैं।

या अनुरागी चित्त की गति समुझै नहिं कोई।

ज्यौं ज्यौं बूड़ै स्याम रँग, त्यौं त्यौं उज्जलु होई॥

मनुष्य के अनुरागी हृदय की वास्तविक गति और स्थिति को कोई भी नहीं समझ सकता है। जैसे-जैसे मन कृष्ण-भक्ति के रंग में डूबता जाता है, वैसे-वैसे वह अधिक उज्ज्वल से उज्ज्वलतर होता जाता है। यानी जैसे-जैसे व्यक्ति भक्ति के रंग में डूबता है वैसे-वैसे वह अपने समस्त दुर्गुणों से दूर होता जाता है।

दीरघ साँस लेहि दु:ख, सु, साईंहिं भूलि।

दई दई क्यौं करतु है दई दई सु कबूलि॥

विपत्तिग्रस्त व्यक्ति को उसका गुरु अथवा मित्र धैर्य प्रदान करते हुए कह रहा है कि इस विपत्ति में हा दैव! हा दैव!! क्यों करता रहता है? जो कुछ तुझे इस विपत्ति के रूप में ईश्वर ने दिया है उसे भगवत्प्रसाद मानकर स्वीकार कर ले। इस प्रकार तू दुःख में कभी लंबी साँस मत ले और सुख में ईश्वर को मत भूल। सुख अथवा दुःख ईश्वर प्रदत्त हैं, ऐसा मानकर तू उसे ग्रहण कर ले तभी तुझे सुख मिल सकता है।

झीनैं पट मैं झुलमुली झलकति ओप अपार।

सुरतरु की मनु सिंधु मैं लसति सपल्लव डार॥

झीने आवरण में लिपटी हुई नायिका के सौंदर्य पर मुग्ध नायक कह रहा है कि महीन वस्त्रों के अंदर से नायिका के शरीर की कांति इस प्रकार झिलमिलाती हुई शोभा दे रही है मानो समुद्र के अंदर कल्पवृक्ष की कोई डाली पत्तों सहित झिलमिलाती हुई दिखाई पड़ रही हो।

नीकी दई अनाकनी, फीकी परि गुहारि।

तज्यौ मनौ तारन-बिरदु बारक बारनु तारि॥

हे नाथ, आपने तो मेरे प्रति पूर्ण उपेक्षा भाव अपना रखा है। इसका प्रमाण यह है कि मैं अपेन उद्धार के लिए आपसे अनेक बार प्रार्थना कर चुका हूँ, किंतु मेरी प्रार्थना आपके कानों तक पहुँचती ही नहीं है। बिहारी की प्रार्थना पर ध्यान देने के कारण वे यह उत्प्रेक्षा करते हैं कि भगवान ने एक बार हाथी का उद्धार किया, उसकी आर्त पुकार पर दौड़े चले गए। उसका उद्धार करने में वे इतना थक गए हैं कि अब उद्धारकर्त्ता कहलाने की प्रकृति को ही उन्होंने त्याग दिया है।

मंगल बिंदु सुरंगु, मुखु ससि केसरि आड़ गुरु।

इक नारी लहि संगु, रसमय किय लोचन-जगत॥

नायिका के मुख पर लाल बिंदु तथा केसर की पीली आड़ देखकर नायक को आँखें प्रेम से परिपूर्ण हो जाती हैं। वह अपनी दशा को नायिका की सखी से स्पष्ट कर रहा है। नायक कहता है कि नायिका का मुख चंद्रमा के समान है। उसके मस्तक पर लगा हुआ रोली का बिंदु मंगल है और केसर का तिरछा तिलक बृहस्पति है। इन तीनों ने एक ही राशि पाकर संपूर्ण जगत के नेत्रों को जलमय अर्थात् रसमय कर डाला है। कहने का तात्पर्य यह है कि नायिका के सौंदर्य को देखने से दर्शकों के नेत्रों में आनंद के आँसू जाते हैं और देखने से दुःख के। जिस प्रकार से तीन ग्रहों−चंद्रमा, मंगल और बृहस्पति के मिलने से जल-वृष्टि होती है और समस्त संसार जलमग्न हो जाता है उसी प्रकार नायक से नायिका के मुख में लाल बिंदी एवं केसर का टीका लगाने से नायक के नेत्र स्नेह-सिक्त हो जाते हैं। भाव यह है कि उसके नेत्रों में बरबस प्रेम उमड़ आता है।

चितई ललचौहैं चखनु डटि घूँघट-पट माँह।

छल सौं चली छुवाइ कै छिनकु छबीली छाँह॥

नायक कह रहा है कि नायिका ने मुझे घूँघट में से ललचाई हुई आँखों से निर्मिमेष दृष्टि से देखा। इसके पश्चात् वह किसी बहाने से अपनी छबीली छांह का स्पर्श कराकर चली गई। ऐसा करके नायिका ने अपने रूप का स्पर्शाभास दिया है। उस स्पर्शाभास से मुझे परम सुख प्राप्त हुआ है। व्यंजना यह है कि जब उस स्पर्शाभास से मुझे सुख प्राप्त हुआ है तो मेरा मन अब पूर्ण स्पर्श-सुख प्राप्त करने के लिए व्याकुल हो उठा है।

सनि-कज्जल चख-झख-लगन उपज्यौ सुदिन सनेहु।

क्यौं नृपति ह्वै भोगवै लहि सुदेसु सबु देहु॥

सखी नायिका से कह रही है कि काजल रूपी शनिग्रह के नेत्र रूपी मीन राशि में स्थित होने से शुभ मुहुर्त में जो स्नेह रूपी शिशु उत्पन्न हुआ है, वह राजा होकर संपूर्ण शरीर रूपी सुदंर प्रदेश को क्यों नहीं भोगेगा? कहने का तात्पर्य यह है कि वह अवश्य भोगेगा। तुम्हारे स्नेह ने उसके सर्वांगों पर अधिकार जमा लिया है। इस दोहे में सखी अपनी चाक्-चातुरी द्वारा नायिका के हृदय में नायक के प्रति प्रेम उत्पन्न करने का प्रयास करती है। यह दोहा बिहारी के ज्योतिष ज्ञान का प्रतीक है। कहा जाता है कि शनि ग्रह जब मीन राशि में हो उस समय जिस शिशु का जन्म होता है वह शिशु ज्योतिष के अनुसार कीर्तिमान राजा होता है। सखी ने यही कहा है कि हे नायिका, तुम्हारे नेत्र मछली को तरह हैं। (मीन राशि) उनमें लगा हुआ काजल शनि ग्रह जैसा है। ऐसे नेत्रों से जब तुमने नायक की ओर देखा तो उसके हृदय में स्नेह रूपी शिशु उत्पन्न हो गया। ऐसे मुहूर्त में उत्पन्न शिशु प्रसिद्ध राजा होता है, अतः तुम्हारा स्नेह भी प्रसिद्ध और स्थाई होगा।

सालति है नटसाल सी, क्यौं हूँ निकसित नाँहि।

मनमथ-नेजा-नोक सी खुभी खुभी जिय माँहि॥

नायक ने जब से नायिका को ‘खुभी’ नामक आभूषण पहने हुए देखा है तब से उसके प्रति उसकी काम भावना बढ़ गई है और यह भावना उसके हृदय को पीड़ित करती रहती है। नायिका के कान में शोभित ‘खुभी’ नायक के हृदय में गड़कर कामदेव के भाले की नोक की तरह उसे पीड़ा दे रही है। संकेत यह है कि कर्णाभूषण नायक के हृदय में चुभ रहा है और यही चुभन नायक की कामजनित वेदना को उत्तरोत्तर बढ़ाती जा रही है।

अजौं तरयौना ही रह्यौ श्रुति सेवत इक-रंग।

नाक-बास बेसरि लह्यौ बसि मुकुतनु कैं संग॥

कवि ने निरंतर वेदपाठ करन के की अपेक्षा निरंतर सत्संग को श्रेष्ठ बतलाया है। इस मत की पुष्टि ‘तर्यौना’ और ‘बैसरि’ जैसे शब्दों में श्लेष का विधान करके की है। 'तर्यौना' अर्थात कर्ण आभूषण कान की संगति करने से आज भी कान के पीछे ही पड़ा रहता है किंतु 'बेसरि' अर्थात नाक का आभूषण जिसमें मोती लटकता रहता है, उसने नाक के साथ रहने से कान की अपेक्षा उच्च पद प्राप्त कर लिया।

मैं समुइयौ निरधार, यह जग काँचो काँच सौ।

एकै रूपु अपार प्रतिबिंबित लखियतु जहाँ॥

मैंने तो इस संसार को काँच के समान कच्चा और नश्वर समझा था लेकिन इस सृष्टि के विविध रूप में एक ही के तत्व के अनेक रूप झलकते हैं। ब्रह्म ज्ञानी और अद्वैतवादी कहता है कि मैंने तो यह समझा था कि वह संसार कच्चे काँच के समान है जिसमें एक ही ईश्वर का रूप अनंत रूपों में प्रतिबिंबित होता है अर्थात् सृष्टि के समस्त पदार्थ एक ही ईश्वर के अनंत रूप हैं।

छुटी सिसुता की झलक, झलक्यौ जोबनु अंग।

दीपति देह दुहून मिलि दिपति ताफता-रंग॥

नायिका के शरीर से अभी बचपन की झलक समाप्त भी नहीं हुई है किंतु उसके शरीर में यौवन झलकने लगा है। एक प्रकार से नायिका की स्थिति शैशव और यौवन के बीच की हो गई है। इन दोनों अवस्थाओं के मेल से नायिका के शरीर की झलक धूप-छाँही रंग के कपड़े जैसी है अर्थात् जिस प्रकार से धूप-छाँह नामक वस्त्र के ताने और बाने के रंग अलग-अलग चमकते हैं, उसी प्रकार नायिका के शरीर में लड़कपन अर्थात् भोलापन और युवावस्था दोनों ही साथ-साथ लक्षित होती है।

कनकु कनक तैं सौगुनौ मादकता अधिकाइ।

उहिं खाऐं बौराइ जग इहिं पाऐं हीं बौराइ॥

स्वर्ण और धतूरे दोनों में मादकता होती है। सोने में धतूरे से सौगुनी अधिक मादकता पाई जाती है। स्पष्ट शब्दों में सोना धातु होकर भी मनुष्य को उन्मत्त और पागल बना देता है तभी तो संसार में यह देखा जाता है कि लोग धतूरे को खाकर पागल होते हैं और सोने को प्राप्त करके ही उन्मत्त हो जाते हैं। जिस वस्तु की प्राप्ति-मात्र से उन्मत्तता बढ़ जाए वह निश्चय ही उस वस्तु की तुलना में अधिक मादक है जो खाने के पश्चात् मनुष्य की बुद्धि और विवेकशीलता को समाप्त कर देती है।