तारे पर कविताएँ

रात के आकाश में तारों

की टिमटिमाहट स्वयं में एक कला-उत्स का वैभव रचती है और आदिम समय से ही मानव उनके मोहपाश में ऐसा बँधा और बिंधा रहा है कि उसे अपने आग्रहों-दुराग्रहों का साक्षी बनाता रहा है। प्रस्तुत चयन में तारे को निमित्त रखकर अपनी बात कहती कविताओं का संकलन किया गया है।

भोर का तारा

घनश्याम कुमार देवांश

जब कोई तारा

सुशोभित

उस तारे-सी

सविता सिंह

नामुमकिन

आशुतोष दुबे

टूटते तारे

राकेश मिश्र

शिकारी तारे

सिद्धार्थ बाजपेयी

ज़रूर

हरि मृदुल

शुक्रतारा

मदन वात्स्यायन