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अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-2

पहली कड़ी से आगे...

दो 

कभी-कभी एक कहानी, एक उपन्यास और एक कविता भी आपको अमर कर सकती है। अरुण कमल की यह रोमांटिक, उधार वाली कविता इस श्रेणी की कविता है। कभी तुलसीदास ने लिखा था, “नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं”। यह कविता अपनी निरीहता, दरिद्रता के तुलसीदास के मध्य काल का आधुनिक काल है, मार्फ़त अरुण कमल। वैसे भी अरुण कमल ने कविता में तुलसीदास से बहुत कुछ ‘धार’ लिया है। अरुण कमल के प्रिय कवि भी तुलसीदास हैं और उनकी ‘विनय पत्रिका’ तो उन्हें इतनी प्रिय है कि क्या कहने! हर संग्रह में उपस्थित।

इस कविता में ‘धार’ के अलावा बाक़ी सब तो ‘उधार’ का है। तो प्रश्न उठता है—क्या अरुण कमल उधार की संवेदना के कवि हैं?

तो उत्तर तो यह कविता ही देती है और स्पष्ट शब्दों में देती है कि हाँ, सब उधार (कर्ज़े) का—यह रक्त तक। दरअस्ल, जैसे आलोकधन्वा की कविता में अपना अनुभव बोलता है या मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, अष्टभुजा शुक्ल की कविताओं में उनका अनुभव बोलता है। उसी तरह का अनुभव अरुण कमल के यहाँ बोलता है क्या? वैयक्तिक अनुभव और उधार के अनुभव में अंतर होता है। मेरी माँ बचपन में एक कहानी सुनाया करती थी कि एक बार नारायण ने नारद से पूछा—आजकल भक्त क्या खा रहे हैं? तो नारद ने कहा—दूध-रोटी। दूसरे दिन उनकी गाय नारायण ने गुम करवा दी और पूछा—आजकल भक्त क्या खा रहे हैं? तो नारद ने कहा—महाराज, भक्त भूखे मर रहे हैं। भक्तों या आम लोगों का कोई अनुभव नारद के पास नहीं था। वैसे भी नारद आम लोग नहीं थे। वैसे भी लोकतंत्र में ख़ूब अँग्रेज़ी पढ़ा-लिखा ब्राह्मण व्यक्ति ही नारद हो सकता है, नारायण के समीप रह सकता है। नारायण मतलब प्रभु और प्रभु मतलब सत्ता। इतनी बात तो लोकतंत्र में जानता है बच्चा-बच्चा। सामंती काल में जैसे संस्कृत पढ़ा-लिखा विद्वान् राजाओं को ख़ुश करने के लिए कविता लिखता था, आजकल के पढ़े-लिखे विद्वान् सत्ता को ख़ुश रखने के लिए ‘हाथ भी उठी रहे, काँख भी ढकी रहे’ टाइप की कविताएँ लिखते हैं। एक मुखर विरोध ग़ायब हो गया है। जब उधार की संस्कृति रहेगी तो प्रेमचंद के शब्दों में जिन पैरों तले गर्दन दबी रहती है, उन्हें सहलाने में ही भलाई है। सहलाने के काफ़ी तरीक़े आते हैं अरुण कमल को।

आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-3

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