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संसार पर गीत

‘संसरति इति संसारः’—अर्थात

जो लगातार गतिशील है, वही संसार है। भारतीय चिंतनधारा में जीव, जगत और ब्रहम पर पर्याप्त विचार किया गया है। संसार का सामान्य अर्थ विश्व, इहलोक, जीवन का जंजाल, गृहस्थी, घर-संसार, दृश्य जगत आदि है। इस चयन में संसार और इसकी इहलीलाओं को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।

दुनियाँ चलती फिरती

रामजियावान दास ‘बावला’

कउने नरेसवा क देसवा उजरि गइलै

रामजियावान दास ‘बावला’

बबुआ बोलता ना

रामजियावान दास ‘बावला’

आन्हर ई संसार

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

यदि आओगे फिर धरती पर

रत्नेश अवस्थी

संसार

गोपालशरण सिंह

अव्यवस्थित

जयशंकर प्रसाद