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होली पर गीत

रंग-उमंग का पर्व होली

कविताओं में व्यापक उपस्थिति रखता रहा है। होली में व्याप्त लोक-संस्कृति और सरलता-सरसता का लोक-भाषा की दहलीज़ से आगे बढ़ते हुए एक मानक भाषा में उसी उत्स से दर्ज हो जाना बेहद नैसर्गिक ही है। इस चयन में होली और होली के विविध रंगों और उनसे जुड़े जीवन-प्रसंगों को बुनती कविताओं का संकलन किया गया है।

जनरल डब्बों में भर-भरकर

ज्ञान प्रकाश आकुल

होलिकापंचक

प्रतापनारायण मिश्र

हम ना खेलेंगे फाग

अन्नू रिज़वी

दो दिन होली रही गाँव में

ज्ञान प्रकाश आकुल

गंध मदन के

भोलानाथ गहमरी

फागुन का रथ

देवेंद्र कुमार बंगाली

फूटे हैं आमों में बौर

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

होली

नरेंद्र शर्मा

नयनों के डोरे लाल गुलाल भरे

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'