Font by Mehr Nastaliq Web

रस पर उद्धरण

जब कोई रस से उत्पन्न सौंदर्य के अनुभव का आनंद लेता है, उसी क्षण 'संसार' विलीन हो जाता है।

दुर्गा भागवत

रस-सामग्री से तो अशिक्षित रुचि भी, किसी-न-किसी तरह स्वाद प्राप्त कर लेती है।

रवींद्रनाथ टैगोर

काव्य का उद्देश्य शुद्ध विवेचन द्वारा सिद्धांतनिरूपण नहीं होता, रसोत्पादन या भावसंचार होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

भाव और विभाव, दोनों पक्षों के सामंजस्य के बिना पूरी और सच्ची रसानुभूति हो नहीं सकती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

काव्यशास्त्र में जिसे श्रृंगार रस कहा जाता है, वही भक्तिशास्त्र में मधुर रस या उज्ज्वल रस माना जाता है।

मैनेजर पांडेय

सच्चा कवि वही है; जिसे लोकहृदय की पहचान हो, जो अनेक विशेषताओं और विचित्रताओं के बीच से, मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को अलग करके देख सके। इसी लोकहृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रसदशा है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

कोरी नवीनता केवल मरे हुए आंदोलनों का इतिहास छोड़ जाए तो छोड़ जाए, कविता नहीं खड़ी कर सकती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

साहित्य और कला का रसास्वादन ही एक ऐसी चाह है मनुष्य की, जो कैसी भी विकलांग सामाजिक परिस्थिति में उसके हृदय में रहेगी, और बराबर वह उसको भावी जीवन की प्रेरणा देती रहेगी।

हरिशंकर परसाई

जब तक किसी भाव का कोई विषय इस रूप में नहीं लाया जाता कि वह सामान्यतः सबसे उसी भाव का अवलंबन हो सके, तब तक उसमें रसोद्बोधन की पूर्ण शक्ति नहीं आती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

रूपक अगर अच्छा हो; उसमें प्रतिभा हो, संगति हो, तो रस की निष्पत्ति नहीं कर सकता। यह बात हमारी इच्छा की, हमारे चाहने चाहने की नहीं हैं—कल्पना के लिए स्वतंत्र रूप से समर्थ होने की बात है।

मुकुंद लाठ

भाव के विषय का कैसा ही यथातथ्य चित्रण क्यों हो, यदि उसके वर्णन के अंतर्गत ही उक्त भाव को शब्द और चेष्टा द्वारा प्रकट करनेवाला होगा, तो (शास्त्रीय दृष्टि से) रस कच्चा ही समझा जाएगा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

रस भरे हृदय और रस भरी आँखों के लिए यह सारी सृष्टि रसमयी है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

किसी प्रसंग के अंतर्गत कैसा ही विचित्र मुर्तिविधान हो, पर यदि उसमें उपयुक्त भावसंचार की क्षमता नहीं है, तो वह काव्य के अंतर्गत होगा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

रस की अनुभूति एक प्राकृतिक और स्वाभाविक अनुभूति है, जो किसी प्रकार के उत्कृष्ट काव्य द्वारा भी हो सकती है। उसी प्रकार की अनुभूति भक्त की भी मानी गई है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

सत्य ही जीवनसार है और वही साहित्य-रस है।

विनोबा भावे

घुमक्कड़ी एक रस है, जो काव्य के रस से किसी तरह भी कम नहीं है।

राहुल सांकृत्यायन

जिन्हें तालीम नहीं मिली है; ऐसे अपढ़ मनुष्य को जो अपना रस नहीं पहुँचा सकता, उसका ख़ुद का रस का झरना सूख गया है—ऐसा मैं तो मानता हूँ।

विनोबा भावे

जिसके जीवन में रस है, वह साहित्यिक है।

विनोबा भावे

धर्म जब मनुष्य के भावना-द्वार से हृदय तक पहुँचता है; तब उसके प्रभाव से मनुष्य की विचारधारा वैसे ही विकसित हो उठती है, जैसे मलय-समीर से कली। परंतु वही धर्म जब मनुष्य की बुद्धि पर बलात् डाल दिया जाता है, तब वह अपने भार से मनुष्य की कोमल भावनाओं को कुचल-कुचल कर, निर्जीव और रसहीन बनाए बिना नहीं रहता।

महादेवी वर्मा

रसविधायक कवि का काम श्रोता या पाठक में भावसंचार करना नहीं, उसके समक्ष भाव का रूप प्रदर्शित करना है, जिसके दर्शन से श्रोता के हृदय में भी उक्त भाव की अनुभूति होती है, जो प्रत्येक दशा में आनंदस्वरूप ही रहता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

रस-बोध के स्वीकार में प्रवृत्ति की सार्थकता का, सत् का भी स्वीकार है, और प्रवृत्ति के स्वीकार में व्यवहार-लोक के सत् की स्वीकृति निहित है।

मुकुंद लाठ

जिस प्रकार हमारी आँखों के सामने आए हुए कुछ रूपव्यापार हमें रसाात्मक भावों में मग्न करते हैं, उसी प्रकार भूतकाल में प्रत्यक्ष की हुई कुछ परोक्ष वस्तुओं का वास्तविक स्मरण भी कभी-कभी रसात्मक होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

रस और स्पर्श अकेले घृणा नहीं उत्पन्न कर सकते।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

स्मरण रसकोटि में तभी सकता है, जब कि उसका स्थायी भाव से हो।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

रस लेते हुए भी निर्मलता क़ायम रखना साहित्यिकों की कुशलता है।

विनोबा भावे

रस का सामान्य रस-भेद के परे नहीं है, बल्कि ऐसा है कि हर रस विशेष में ‘रूपं रूप प्रतिरूपो बभूव’ की तरह परम रस की पहचान हो सकती है—ऐसी कि हर रस अपनी अलग पहचान रखते हुए भी, रस के परमार्थ को अपने में पूरी तरह सहेज लेता है। वैसे ही जैसे हर देवता भिन्न होते हुए भी देवत्व में पूर्णमिदम् होता है।

मुकुंद लाठ

भारतीय साहित्य और कलाओं के मूल में जो स्थायी भाव माने गए हैं, वे केवल विक्षिप्तों की विवेक भावनाएँ नहीं हैं—उनके साथ ज्ञान-शक्ति का भी समन्वय है।

श्यामसुंदर दास

छंद ही ऐकांतिक रूप से काव्य हो, ऐसी बात नहीं है। काव्य की मूल वस्तु है रस; छंद आनुषंगिक रूप से इसी रस का परिचय देता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

भारतीय काव्य-विवेचन में कविता और कला का अधिकांश विवेचन—रस का आधार लेकर किया गया है।

श्यामसुंदर दास

साहित्य अपनी चेष्टा को सफल करने के लिए अलंकार, रूपक, छंद, आभास, इंगित का सहारा लेता है। दर्शन विज्ञान के समान निरलंकार होने से उसका काम नहीं चलता।

रवींद्रनाथ टैगोर

साहित्य और आर्ट में कोई वस्तु सत्य है या नहीं, इसका प्रमाण मिलता है रस की भूमिका में।

रवींद्रनाथ टैगोर

ऐतिहासिक दृष्टि से रस सर्वप्रथम अभिनय के संबंध में ही माना गया था और भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में पहले-पहल इसका निरूपण हुआ था।

श्यामसुंदर दास

शांत रस है परिपूर्णता का रस।

रवींद्रनाथ टैगोर

करुणा ही एक ऐसा व्यापक भाव है, जिसकी प्रत्यक्ष या वास्तविक अनुभूति सब रूपों और सब दशाओं में रसात्मक होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

काव्य के गुण और अन्य सुंदर विशेषताएँ, उस रस का उत्कर्ष करती हैं और उसके दोष (स्खलन) उसका अपकर्ष करते हैं।

श्यामसुंदर दास

जो भाषा हृदय के बीच अव्यवहित आवेग से प्रवेश नहीं कर पाती, उस भाषा में साहित्य रस, साहित्य रूप की सृष्टि संभव नहीं।

रवींद्रनाथ टैगोर

रसबोध होने पर आदमी प्रतिकूल घटनाओं से कातर नहीं होता, बल्कि हर अवस्था में उसका आनंद ले सकता है।

सुभाष चंद्र बोस

अनुभूति के बाहर रस का कोई अर्थ ही नहीं।

रवींद्रनाथ टैगोर

भक्ति धर्म की रसात्मक अनुभूति है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

जिस तरह सात रंगों की किरणें मिलकर श्वेत वर्ण बनता है, उसी तरह चित्त का प्रवाह जब विभिन्न भागों में खंडित होकर, विश्व के साथ अपने अविच्छिन्न सामंजस्य से परिपूर्ण हो जाता है—तब शांतरस का जन्म होता है।

रवींद्रनाथ टैगोर