उद्धरण

उद्धरण श्रेष्ठता का संक्षिप्तिकरण हैं। अपने मूल-प्रभाव में वे किसी रचना के सार-तत्त्व सरीखे हैं। आसान भाषा में कहें तो किसी किताब, रचना, वक्तव्य, लेख, शोध आदि के वे वाक्यांश जो तथ्य या स्मरणीय कथ्य के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं, उद्धरण होते हैं। भाषा के इतिहास में उद्धरण प्रेरणा और साहस प्रदान करने का काम करते आए हैं। वे किसी रचना की देह में चमकती आँखों की तरह हैं, जिन्हें सूक्त-वाक्य या सूक्ति भी कहा जाता है। संप्रेषण और अभिव्यक्ति के नए माध्यमों में इधर बीच उद्धरणों की भरमार है, तथा उनकी प्रासंगिकता और उनका महत्त्व स्थापना और बहस के केंद्र में है।

एक

अकेले बैठना, चुप बैठना—इस प्रश्न की चिंता से मुक्त होकर बैठना कि ‘क्या सोच रहे हो?’—यह भी एक सुख है।

अज्ञेय

एक

सारी कलाएँ एक-दूसरे में समोई हुई हैं, हर कला-कृति दूसरी कलाकृति के अंदर से झाँकती है।

शमशेर बहादुर सिंह
  • संबंधित विषय :कला

एक

स्त्री के लिए प्रेम का अर्थ है कि कोई उसे प्रेम करे।

भुवनेश्वर

चार

भाषा के पर्यावरण में कविता की मौजूदगी का तर्क जीवन-सापेक्ष है : उसके प्रेमी और प्रशंसक हमेशा

कुँवर नारायण

एक

दुनिया में नाम कमाने के लिए कभी कोई फूल नहीं खिलता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

चार

साहित्य तुम्हारी तुम्हीं से पहचान और गहरी करता है।

अज्ञेय

तीन

एक निगाह से देखना कलाकार की निगाह से देखना नहीं है।

अज्ञेय

दो

कविता का एक मतलब यह भी है कि आप आज तक और अब तक कितना आदमी हो सके।

धूमिल

तीन

सच्चा लेखक जितनी बड़ी ज़िम्मेदारी अपने सिर पर ले लेता है, स्वयं को उतना अधिक तुच्छ अनुभव करता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

एक

कविता आदमी को मार देती है। और जिसमें आदमी बच गया है, वह अच्छा कवि नहीं है।

धूमिल

39

सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल। सुकवि की मुश्किल। किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए

रघुवीर सहाय
  • संबंधित विषय :कवि

50

दे दिया जाता हूँ।

रघुवीर सहाय

दो

कपड़े पहनने ही के लिए नहीं हैं—उतार कर रखना भी होता है कि धुल सकें।

अज्ञेय

दो

अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।

गजानन माधव मुक्तिबोध

6

हम विचारों के स्तर पर जिससे घृणा करते हैं, भावनाओं के स्तर पर उसी से प्यार करते हैं।

गोरख पांडेय

सात

अगर कविता न होती तो राम और कृष्ण भी यथार्थ न होते।

अशोक वाजपेयी

35

एकमात्र साक्षी जो होगा वह जल्दी ही मार दिया जाएगा।

रघुवीर सहाय

बारह

हर प्रकाशित पंक्ति साहित्य नहीं होती, बल्कि सच्चाई यह है कि हर युग में अधिकांश साहित्य ‘पेरिफ़ेरी’

विष्णु खरे

एक

क्रूरताएँ और उजड्डताएँ किसी भी जन-समाज को बचा नहीं सकते।

दूधनाथ सिंह

चार

भाषा की जान होता है मुहावरा।

शमशेर बहादुर सिंह

चार

कविता की असली शर्त आदमी होना है।

धूमिल

36

हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए।

रघुवीर सहाय

16

अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ और आप कहते है कि कविता की है।

रघुवीर सहाय

नौ

कविता परम सत्य और चरम असत्य के बीच गोधूलि की तरह विचरती है।

अशोक वाजपेयी

4

हमारे आलस्य में भी एक छिपी हुई, जानी-पहचानी योजना रहती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

10

क्या ज़िंदगी प्रेम का लंबा इंतज़ार है?

गोरख पांडेय

4

प्रेम महान है, प्रेम उदार है। प्रेमियों को भी वह उदार और महान बनाता है। प्रेम का मुख्य अर्थ

जयशंकर प्रसाद

दो

दुनिया जैसी है और जैसी उसे होना चाहिए के बीच कहीं वह एक लगातार बेचैनी है।

कुँवर नारायण

13

हिंदी अगर एक छोटी-सी भाषा होती, लोग उसे प्रेम और मनुष्यता के साथ बरतते तो उसका लेखक इतना अकेला नहीं

मंगलेश डबराल

चौदह

शिल्प भाषा का अंतःकरण है।

अशोक वाजपेयी

33

हत्या की संस्कृति में प्रेम नहीं होता है।

रघुवीर सहाय

तीन

जितना कवि समय को, उतना ही समय कवि को गढ़ता है।

अशोक वाजपेयी

19

कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ

केदारनाथ सिंह

दो

पुरुष और स्त्री की आत्माएँ दो विभिन्न पदार्थों की बनी हैं।

भुवनेश्वर

15

हम इनसान हैं, मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सचाई बची रहे।

मंगलेश डबराल

29

पुरुष में थोड़ी-सी पशुता होती है, जिसे वह इरादा करके भी हटा नहीं सकता। वही पशुता उसे पुरुष बनाती है।

प्रेमचंद

जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊँ?

जनकवि हूँ मैं, साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ।

नागार्जुन

23

पेशेवर आलोचकों की त्रासदी शायद यहाँ से शुरू होती है कि वे प्राय: कविता के संवेदनशील पाठक नहीं होते।

मंगलेश डबराल

9

पाप के समय भी मनुष्य का ध्यान इज़्ज़त की तरफ़ रहता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

3

मुक्ति अकेले में अकेले की नहीं हो सकती। मुक्ति अकेले में अकेले को नहीं मिलती।

गजानन माधव मुक्तिबोध

41

एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है।

रघुवीर सहाय

2

इस सभ्यता में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है।

रघुवीर सहाय
  • संबंधित विषय :भीड़

15

लिखना चाहे जितने विशिष्ट ढंग से, लेकिन जीना एक अति सामान्य मनुष्य की तरह।

धर्मवीर भारती

पंद्रह

कविता भाषा का शिल्पित रूप है, कच्चा रूप नहीं।

अशोक वाजपेयी

दो

कविता सरलीकरण और सामान्यीकरण के विरुद्ध अथक सत्याग्रह है।

अशोक वाजपेयी

चार

कविता आत्म और पर के द्वैत को ध्वस्त करती है।

अशोक वाजपेयी

47

मैं ऐसा नहीं मानता कि विश्व-बाज़ार कविता को निगल जाएगा और कविता हमेशा के लिए अपना प्रभाव खो देगी।

केदारनाथ सिंह

46

अज्ञेय से पहले हिंदी का कोई ऐसा कवि नहीं हुआ जो शुद्ध रूप से नागरिक कवि हो।

केदारनाथ सिंह

7

अच्छाई का पेड़ छाया प्रदान नहीं कर सकता, आश्रय प्रदान नहीं कर सकता।

गजानन माधव मुक्तिबोध

15

कितना अच्छा होता कि जिस संख्या में कवियों के संग्रह छपे बताए जाते हैं, लगभग उतनी ही संख्या में

सिद्धेश्वर सिंह