प्रयाग शुक्ल के उद्धरण
आदमी का मन कभी-कभी 'अकेलेपन' का अनुभव भले करे, लेकिन अपनी शारीरिक उपस्थिति में कोई चीज़ कभी 'अकेली' नहीं होती।
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देखने के साथ सोचना जुड़ा हुआ है। हम जो कुछ भी देखते हैं, उस पर किसी-न-किसी रूप में सोचते ज़रूर हैं।
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पिकासो की ग्राफ़िक-कृतियों में से कई ऐसी हैं, जिनमें चित्रित आकृतियाँ 'काल्पनिक' हैं, लेकिन इनमें मानवीय-स्थितियाँ या अनुभव इस तरह एकत्र हुए हैं कि काल के गर्त में बिला गए हज़ारहा लोगों का 'प्रतिनिधित्व' करने में वे समर्थ हैं।
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पूरा देखना वही होता है, जिसमें हम किसी वस्तु के इर्द-गिर्द की सारी चीज़ें देखते हैं।
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मेज़ पर एक ही गिलास रखा हो, तो क्या वह अकेला होता है? उसके साथ मेज़ होती है; कमरे की दीवारें होती हैं और वह रोशनी होती है, जिसमें हम उसे देखते हैं।
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यह देखने का ही वरदान है कि हम कुछ चुन भी सकते हैं। देखेंगे नहीं, तो अपने लिए सार्थक चीज़ें चुन भी नहीं सकेंगे।
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आज देखने को लेकर समस्या यह है कि हमने देखने को दो खानों में बाँट दिया है—उपयोगी और अनुपयोगी। जबकि देखना बराबर उपयोगी ही होता है।
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आधुनिकता का एक अर्थ निश्चय ही खोज भी है—निरा पुनराविष्कार ही नहीं।
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सभी कलाओं में केवल चित्र और मूर्तिशिल्प के माध्यम ऐसे हैं, जिनको कृतियों को हमें प्रायः खड़े रहकर ही देखना होता है।
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हमारे यहाँ लोकजीवन में वनस्पति-रंगों का ही चलन रहा है, और ये रंग भी अपने स्वभाव में जलरंगों के ही निकट हैं।
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पिकासो के लिए कोई भी रचना-सामग्री और कोई भी विषय, कला के बाहर का विषय नहीं है।
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कला या कलाकृति की महत्ता इस बात में भी है कि एक बार 'अंतिम रूप' पा जाने पर वह बराबर नए अर्थ 'खोलती' रहती है।
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देखना, विस्मय और औत्सुक्य से भी जुड़ा है। न जाने कितनी चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें हम सैकड़ों बार देख चुके होते हैं, लेकिन किसी क्षण-विशेष में उन्हें एक नई उत्सुकता से देखते हैं।
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कार्तिए-ब्रेसों मानते हैं कि एक छायाचित्र पहले से नियोजित नहीं होना चाहिए।
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कला में आकार कहाँ से आते हैं? कुछ ‘देखने’ से ही तो। बचपन में हम बादलों की ओर देखकर बादलों पर क्यों नहीं ‘ठहर’ जाते? क्यों हम उनमें हाथी और ऐसी ही तमाम आकृतियाँ ढूँढ़ने लगते हैं।
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