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राम कृष्ण परमहंस

राम कृष्ण परमहंस के उद्धरण

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पहले ईश्वर-प्राप्ति करो, उसके उपरांत गृहस्थाश्रम में भी रहा जा सकता है। गार्हस्थ्य जीवन की गंध लग जाने पर ईश्वर प्राप्ति कठिन हो जाती है।

प्रत्येक धर्म ईश्वर की प्राप्ति ही सिखाता है। ईश्वर-प्राप्ति से ही मानव की समस्याओं का अंत हो सकता है।

संसार में रहते हुए मनुष्य को सदैव ईश्वर का चिंतन करना चाहिए, जैसे दासी दूसरे के घर का काम करते हुए भी, बराबर अपने बच्चों का ध्यान रखती है।

जैसे-जैसे मनुष्य ईश्वर की ओर बढ़ता है, वैसे-वैसे उसे विषयों से विराग होने लगता है और यह अनुभव होता है कि जो कुछ करता है, ईश्वर ही करता है।

जिस प्रकार हमें जगत् का अनुभव हो रहा हैं, उसी प्रकार ईश्वर का अनुभव हो सकता है।

जीवों के प्रति दया नहीं, सेवा की भावना रखो।

ईश्वर-भक्त अपने को दीन और तुच्छ समझता है, वह किसी से अभिमान नहीं करता।

ईश्वर प्राप्ति के लिए एक ही उपाय है—पूर्ण श्रद्धा के साथ उसके लिए रोना। ईश्वर को अपना सगा समझ उससे कृपा की माँग करो।

सच्ची निष्ठा होने पर ईश्वर सद्गुरु भेज देता है, तथा अन्य सुविधाएँ भी कर देता है।

अज्ञानावस्था में ईश्वर का अस्तित्त्व नहीं मालूम पड़ता, किंतु इससे यह कहो कि ईश्वर नहीं है।

ईश्वर सत्य है। अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए पहले जीवन में सत्य की प्रतिष्ठा करनी होती है।

मनुष्य जब तक ईश्वर प्राप्ति नहीं कर लेता, तब तक उसके दुःखों का अंत नहीं।

अपने मत के लिए आग्रह करो। ज्ञान की प्राप्ति केवल तर्क से नहीं होती।

जब तक पूर्ण भक्ति का उदय हो जाए, तब तक शास्त्र कथित नियमों के अनुसार जीवन यापन करना चाहिए।

ईश्वर सगुण साकार और निर्गुण निराकार दोनों हैं। जब तक घंटी की आवाज़ सुनाई पड़ती है; तब तक वह साकार है, जब सुनाई नहीं पड़ती तब निराकार—ठीक इसी प्रकार ईश्वर का भी है।

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