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रविवासरीय 4.0 : कृष्णबलदेववैदविषयक

• नये काम करना मुश्किल नहीं, मुश्किल है पुराने काम नये ढंग से करना।

• काम करने के लिए, काम न कर सकने वाली परिस्थितियाँ चाहिए।

• रोना अकेले की चीज़ है।

• वे जिनकी रचनाएँ ‘राजनीतिक’ नहीं, ऐसे अराजनीतिक लेखकों का कथित राजनीतिक लेखकों-आलोचकों द्वारा विरोध क्या राजनीतिक है? 

• इस हिंदी-समय के सबसे बड़े ट्रोलर और उनके समीपवर्ती ही जब ट्रोलिंग और उसके दुष्प्रभावों पर टेंशन जताते हैं, तब सचमुच टेंशन/टेशन से गाड़ी छूट जाने जैसा दृश्य नज़र आने लगता है। 

• एक बेईमानी को बल तब मिलता है, जब दूसरी बेईमानी उसका समर्थन करती है। बेईमानी वहीं नष्ट हो जाती, अगर अकेली पड़ जाती।

• सब अगर कृष्ण की तरह ही हो गए, तब कृष्ण की निंदा-प्रशंसा कौन करेगा?

• दिल्ली में ही नहीं अब भारतीय समय में सब तरफ़ बरसात के बीतते-बीतते एक उत्सवधर्मिता आकार लेने लगती है। सब तरफ़ शोक के लिए अवकाश असंभव हो उठता है। सब तरफ़ वाचिक परंपरा का विकृत विस्तार नज़र आता है। संभवतः इससे ऊबकर ही कृष्ण बलदेव वैद ने एक साक्षात्कार में यह बयान किया होगा : 


...एक दशक के लिए सारे सेमिनारों को बंद कर देना चाहिए। उन पर बर्बाद किए जाने वाले करोड़ों रुपयों को प्रतिभावान् युवा लेखकों और आलोचकों की आर्थिक सहायता के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। प्रतिभा की खोज का काम उन लेखकों और आलोचकों को दिया जाना चाहिए जो कभी किसी पुरस्कार-कमेटी या ज्यूरी के सदस्य न रहे हों। एक दशक के लिए उन सब पुरस्कारों को भी बंद कर देना चाहिए जिनकी रक़म दस हज़ार से अधिक हो और इस पैसे का उपयोग भी उपर्युक्त तरीक़ों से करना चाहिए। 


इसी तरह के और सुझाव भी सोचे जा सकते हैं। 

मेरा एक अंतिम सुझाव यह भी है कि एक दशक के लिए वाचिक परंपरा को स्थगित कर देना चाहिए; किसी आलोचक को किसी मंच के पास नहीं फटकने देना चाहिए, ताकि वे बोलने के बजाय अपने कमरे में बैठ कुछ लिखने का जोखिम उठाएँ। वैसे अगर सेमिनार वग़ैरा बंद हो जाएँगे, पुरस्कार-वितरण-समारोह बंद हो जाएँगे, विमोचन-लोकार्पण समारोह बंद हो जाएँगे [इन्हें भी एक दशक के लिए बंद कर देना होगा] तो आलोचकों के प्रवचन भी शायद बंद हो जाएँ—इसलिए यह अंतिम सुझाव मैं वापस लेता हूँ।   


• वर्ष 2020 की फ़रवरी में कृष्ण बलदेव वैद के न रहने पर मैंने सोचा कि मैं अगर फ़रवरी में एक पराये देश के वसंत [विहार या कुंज] में मरा तो... 

• वह 1927 की 27 जुलाई थी, जब कृष्ण बलदेव वैद ने अविभाजित भारत में जन्म लिया—जन्म-स्थान : डिंगा [पंजाब, पाकिस्तान]। 

कृष्ण बलदेव वैद उन लेखकों में हैं, जिन्होंने भारत-पाक-विभाजन की यातना और याद का अपने जीवन और लेखन दोनों में ही सीधा साक्षात्कार किया। 6 फ़रवरी 2020 को न्यूयॉर्क [अमेरिका] में उनका देहांत हुआ। भाषा और कथ्य के इस उस्ताद ने अपनी डायरी में तन्हाई, ख़ामोशी, उदासीनता, अवज्ञा और अवहेलना को अपनी ज़िंदगी का हासिल क़रार दिया है। यहाँ पेश है, उनके मार्फ़त मुझे कभी न लिखा गया एक ख़त...

• प्रिय अविनाश, 


मैंने तुम्हें कभी कोई ख़त नहीं लिखा। दरअस्ल, तुम्हारी उम्र के नौजवानों से मेरा संपर्क और संवाद और संबंध बहुत मुद्दत पहले भारत छोड़ने के साथ ही कुछ छूट-फूट-टूट गया। हाँ, इधर बीच कुछ ‘कलावादी’ कहाने वाले ज़रूर मुझसे संपर्क साधे रहे। हिंदुस्तान में मेरे इंतिक़ाल की ख़बर शायद इनके ज़रिये ही मंज़र-ए-आम होगी। 


लुब्ब-ए-लुबाब यह कि हिंदी की नयी नस्ल या कहें नस्लें मेरे बारे में कम जानती हैं या कहें नहीं जानती हैं या कहें जानना ही नहीं चाहती हैं। यह कोई मायूब बात नहीं है। किसी को जानना या न जानना किसी का भी बुनियादी हक़ है।   

मैं कभी ऐसा लेखक नहीं रहा जिसे तुम सीने से लगाओ। अगर तुम हिंदीवाले हो तो तुम्हें सीने से प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु और मुक्तिबोध को ही लगाना चाहिए, मुझे नहीं। 

मैंने उदयन [वाजपेयी] को दिए एक इंटरव्यू में यह मलाल नुमायाँ किया है कि मैं कुछ हिंदीवालों की नज़र में हिंदी में एक अवैध वैद ही हूँ, ख़ैर!

मेरे तरुण दोस्त, मैं उस कथा-त्रिकोण का आख़िरी कोण था जिसके शेष दो कोण कृष्णा [सोबती] और निर्मल [वर्मा] थे। मैं त्रिकोण कह रहा हूँ; त्रयी नहीं, ध्यान देना : क्योंकि हिंदी में त्रयियाँ तुम्हें आज भी आसानी से दिख जाएँगी, लेकिन त्रिकोण नहीं। 

दरअस्ल, त्रिकोण से मेरी मुराद एक बिल्कुल महीन व्यक्ति को घेरे दो परस्पर तिरछे व्यक्तित्वों से है। त्रयी में ये कहाँ?...! त्रयी बेसिकली कमतर और यारानों की मारी शख़्सियतों की मंडली है, जिसमें फ़ायदे की उम्मीद में एक व्यक्ति दूसरे को और दूसरा तीसरे को फ़ायदा पहुँचाता रहता है; लेकिन चूँकि ये यार कम और मक्कार अधिक होते हैं, इसलिए बहुत जल्द इस तरह की त्रयियाँ मिस्मार हो जाती हैं। तुमने मेरे हमअस्र राजेंद्र [यादव], [मोहन] राकेश और कमलेश्वर की त्रयी के बारे में तो सुना ही होगा; जिन्होंने ठीक से कभी कोई नयी कहानी नहीं लिखी, लेकिन ख़ुद को नयी कहानी का पुरोहित पुकारने लगे। बाद में नामवर [सिंह] जी ने इन्हें ठीक या कहें ग़लत किया, जब उन्होंने निर्मल की ‘परिंदे’ को ‘नयी कहानी की पहली कृति’ लिख मारा। भुवनेश्वर की ‘भेड़िये’ को नामवर भूल गए और मुझे भी। 

ख़ैर, जाने दो मैं कभी ऐसा लेखक नहीं रहा जिसे तुम सीने से लगाओ। अगर तुम हिंदीवाले हो तो तुम्हें सीने से प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु और मुक्तिबोध को ही लगाना चाहिए, मुझे नहीं। 

लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आता कि तुम्हारी नयी पीढ़ी के कुछ बेअक़्ल बुढ़ापे तक निर्मल और कृष्णा को भी सीने से लगाए क्यों घूमते हैं! उन्होंने ऐसा क्या कर दिया, जो मैं न कर सका!...? हाँ, साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ वग़ैरा न हासिल कर सका। कभी हिंदी की चुग़द चालों के नज़दीक नहीं रहा। मंच का मवाली बनने से बचा। किसी मंडली में शामिल नहीं रहा। किसी को कोई फ़ायदा पहुँचा सकूँ, इस सूरत में भी कभी कहीं नहीं रहा। मैं तो बाहर रहा। हिंदुस्तान से ही नहीं, हर उस जगह से जहाँ कुछेक कोशिशों के बाद लोग मुझे भी सीने से लगाने की कोशिश करते। मुझे तो कोई पढ़ भी ले, तब भी उसे उन मायनों में कोई फ़ायदा नहीं मिलता; जिन मायनों में कथित हिंदी साहित्यकार को पढ़कर मिलता है—गहरी वैचारिक और क्रांतिकारी दृष्टि, अप्रतिहत प्रतिबद्धता, जनवादी उजास, त्रासद लोक-जीवन, आंचलिक वैभव, अमर प्रेम-कथासुख... यह सब अपने कथित पाठक को सप्लाई करना कभी मेरा मक़सद नहीं रहा। 

मेरी कथा-कृतियों से गुज़रने के लिए तो बहुत तैयारी और ज़िम्मेदारी और धीरज चाहिए, लेकिन कभी मौक़ा लगे तो मेरी डायरियों से गुज़रना... वहाँ तुम्हें मेरे मक़सद का अस्ल अंदाज़ मालूम होगा। शायद मैं लेखकों का लेखक हूँ! प्रयोगधर्मिता, प्रायश्चित, स्मृति, अकेलापन, यौन-जीवन, अवसाद, असफलता, आयु-बोध और मृत्यु मेरे साहित्य के मूल पक्ष हैं।

काम और उसे अपने मुताबिक़ न कर पाने का अफ़सोस मुझ पर ताउम्र अवहेलना की तरह ही तारी रहा। यह अजीबतर है कि हिंदी में काम भी काम नहीं आता है! सब वक़्त सब तरफ़ इतने विपन्न टकराते रहते हैं; जिन्होंने कोई काम नहीं किया, लेकिन कितनों के काम के बने हुए हैं—मरने के बाद भी। एक मैं हूँ कि जीते जी ही... जाने दो, आगे मुँह मत खुलवाओ...

मैं अपने नज़दीकतर व्यक्तियों की सीमा का एक रूपक हूँ। वे सब जो चाह कर भी कर-कह नहीं पाए, मैंने कर-कह दिखाया। वे इसके लिए मुझसे मुहब्बत भी करते रहे। लेकिन मैं अंततः एक लघु-समूह-प्रेम का शिकार होकर रह गया; क्योंकि इस प्रकार के समूह सबसे पहले उसकी ही बलि देते हैं, जिसे वे सबसे ज़्यादा चाहते हैं। कुल मिलाकर देखो तो मेरी समग्र साहित्यिक तैयारी एक आत्मघातक प्रक्रिया है। हेमिंग्वे ने कहा था कि लिख न पाने के बाद जीना बेकार है। मैं मानता हूँ कि अपनी तमाम आत्मघातक कोशिशों के बावजूद मैं बेकार नहीं जिया हूँ, बेवक़ार भले ही जिया हूँ। 

उदयन ने मुझसे पूछा था कि मेरी बहुत-सी पढ़ाई अँग्रेज़ी साहित्य की है, मैं अपनी कृतियों के ख़ुद ही अँग्रेज़ी में बढ़िया अनुवाद करता हूँ, लंबे समय से अमरीका में हूँ; फिर मुझे अँग्रेज़ी में लिखने से गुरेज़ क्यों है? 

मैं जब इस प्रकार की प्रश्नवाचकता के आधारों पर विचार करता हूँ, तब पाता हूँ कि उर्दूनुमा हिंदी [जिसमें पंजाबी शब्दों का छिड़काव होता रहे] में लिखने का फ़ैसला मैंने शुरू में ही कर लिया था। उस फ़ैसले का आधार मेरे अनुसार नैतिक भी था और साहित्यिक भी। उसी आधार को मैं ठोस मानता हूँ और उसको मैंने डगमगाने नहीं दिया। जिस वक़्त मैंने गंभीर तौर पर लिखना शुरू किया, उस वक़्त देश आज़ाद हो चुका था; भले ही दो टुकड़ों में बँटकर और बेशक मैं मुल्कराज आनंद और जी.वी. देसानी और नीरद सी. चौधरी से बहुत प्रभावित भी रहा, लेकिन अपने माध्यम के चुनाव पर उस प्रभाव का प्रभाव मैंने नहीं होने दिया।

मुझसे यह ग़लती तो नहीं हुई कि मैं उर्दू या हिंदी में प्रोफ़ेसर बनने के लिए उन भाषाओं में किसी एक में पीएच-डी. करता, लेकिन कभी अब तक अपने इस फ़ैसले से कि मैं अँग्रेज़ी में पढ़ूँगा और पढ़ाऊँगा; पर हिंदी में लिखूँगा, विचलित नहीं हुआ। अनुवाद मैंने अपनी कई पुस्तकों के किए हैं और शायद मरते दम तक करता रहूँगा, क्योंकि मेरा अनुभव रहा है कि और कोई मेरी पुस्तकों का अँग्रेज़ी अनुवाद मुझसे बेहतर नहीं कर सकता।  

मेरा लेखन बहुतों को उदासी और ऊब और उबकाई से भरा हुआ लगता है। कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या मैं महज़ एक वमनोत्तेजक लेखक हूँ! मेरी डायरियों में ही, मेरे इस सवाल का जवाब है। वहाँ तुम पाओगे कि मैंने कई ख़्वाब लिखे हुए हैं। दरअस्ल, मैं जब भी सोने को तत्पर हुआ; नींद मेरे क़रीब वैसे ही आई, जैसे वह किसी नाउम्मीदी और नाइंसाफ़ी से घिरे शख़्स के पास आती है। इसलिए मेरे ख़्वाब मुझे अधनींद ही जगा देते थे और मैं उन्हें लिखने लगता था : 


अब कुछ ऐसा लिखना चाहिए जिसके लिए अगर सूली पर भी चढ़ना पड़े तो झिझक न हो—ख़ौफ़नाक, गहरा, नरम।


शिथिल, सतही और सख़्त लेखन मेरे लिए कभी कांक्षणीय नहीं रहा। मैंने काली सूचियों में दर्ज हो जाना क़ुबूल किया, लेकिन कभी वैसी प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष नहीं किया जो आपके काम से ज़्यादा आवाज़ करती है। मेरे बाद अगर तुम मुझे पढ़ना, तब इस तथ्य पर ज़रूर ग़ौर फ़रमाना कि मैं अलोकप्रिय होते हुए भी एक आलोकप्रिय लेखक हूँ—मेरे लेखन में जगह-जगह झलकते-छलकते अंधकार के बावस्फ़। 

यह युगों से नयी नस्ल का एक सनातन और राजनीतिक कार्यभार रहा आया है कि वह अपने पूर्ववर्तियों के साथ हुई नाइंसाफ़ी की जाँच करे। मौजूदा दौर के मुख्य विमर्शों को देखो, वे आख़िर हैं क्या अपने पूर्ववर्तियों के साथ हुई नाइंसाफ़ी की जाँच के सिवा! 

मैं फ़िलहाल बस इतना चाहता हूँ कि बाआसानी और बासहूलत मेरा पाठ संभव हो, यह जानते हुए भी कि मैं कभी ऐसा लेखक नहीं रहा जिसे तुम सीने से लगाओ। अगर तुम हिंदीवाले हो तो तुम्हें सीने से प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु और मुक्तिबोध को ही लगाना चाहिए, मुझे नहीं। लेकिन मैं कोई ऐसा लेखक भी नहीं रहा, जिसे तुम अपनी शेल्फ़ में या सिरहाने भी रखना पसंद न करो। 


तुम्हारा,
के.बी.

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