कुमार केशव के बेला
कचर-कचर : एक सिनेमाई आतंकवाद
थिएटर की बत्ती बुझती है। स्क्रीन पर किसी गंभीर दृश्य की नींव रखी जा रही होती है। नायक का दिल टूटने वाला होता है या सस्पेंस अपनी पराकाष्ठा पर होता है। और ठीक उसी पल आपके दाहिने या बाएँ कान के पास से आ
DJ वाले बाबू आजकल बिहार में जो बजा रहे हैं...
अगर किसी विदेशी शोधार्थी को बिहार का समकालीन समाज समझाना हो, तो मैं उसे एक क़स्बाई शादी में भेजना पसंद करूँगा। वहाँ उसे बिहार के बारे में लगभग सब कुछ मिल जाएगा। शहरों की शादियाँ मशीनी हो गई हैं। वहाँ