अभिषेक कुमार सिंह के बेला
इश्क़, इंक़लाब और इलाहाबाद
पुराने शहर के पुराने इलाहाबादियों के पास थोक के भाव में नेहरू-गांधी ख़ानदान के क़िस्से हैं—जैसे-जैसे गंगा खिसककर यमुना के पास जाती रही, ठीक वैसे ही इलाहाबादियों ने इन गुज़रे क़िस्सों में स्वादानुसार
ओपेनहाइमर से ओडिसियस तक : साम्राज्यवादी महानायकों का खोखलापन
क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ की सनसनीख़ेज़ समीक्षाओं की होड़ में कश्मकश करने से पहले सबसे ज़रूरी है कि इस होड़ के पीछे की सोच की समीक्षा करना। आख़िर क्यों और कैसे लोक-कथाओं और पुराणों की समृद्ध संस्क
फ़ीफ़ा, रोनाल्डो, अश्वेत और हज़ारों साल पुराने सांस्कृतिक टकराव की पुनरावृत्ति
पता नहीं, यह बात कहना कितनी तर्कसंगत होगा और इसमें कितनी ही बौद्धिक या साहित्यिक संभावना होगी कि यूरोप का वर्चस्ववाद बार-बार इस्लामिक एवं अफ़्रीकी संप्रभुता को सीमित करने की कोशिश करता है और हर दफ़ा ख
मार्जान सतरापी : एक स्त्री और पैग़म्बर बनने का ख़्वाब
एक बात हमेशा से खटकती रही है और शायद आने वाले समय में और भी खटकने लगे, आख़िर क्यों किसी लेखक को सर्वविदित होने के लिए अपनी मौत का इंतिज़ार करना पड़ता है? एक उभरते और शायद गुज़रते हुए साहित्यकार बता र
फ़ीफ़ा, मैकडॉनल्ड्स और बीस साल पहले का इलाहाबाद
इस दफ़ा फ़ुटबॉल विश्वकप की मेज़बानी अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको संयुक्त रूप से कर रहे हैं और दबी-दबी-सी चर्चा है कि भारत में कोई भी ब्रॉडकास्टर इसके प्रसारण अधिकार ख़रीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा ह