फ़ीफ़ा, रोनाल्डो, अश्वेत और हज़ारों साल पुराने सांस्कृतिक टकराव की पुनरावृत्ति
अभिषेक कुमार सिंह
15 जुलाई 2026
पता नहीं, यह बात कहना कितनी तर्कसंगत होगा और इसमें कितनी ही बौद्धिक या साहित्यिक संभावना होगी कि यूरोप का वर्चस्ववाद बार-बार इस्लामिक एवं अफ़्रीकी संप्रभुता को सीमित करने की कोशिश करता है और हर दफ़ा ख़ुद ही ज़रा ज़्यादा सिकुड़ जाता है। यहाँ बहुत ही दिलचस्प बात यह है कि एशिया की दो महान् सभ्यताएँ इस पूरे उपक्रम को खाद-पानी देते हुए दर्शक दीर्घा में दृढ़ता से बैठी रहती हैं।
शायद यही पिछले हज़ार वर्षों के इतिहास का एक चेहरा है और शायद फ़ीफ़ा विश्वकप की संकल्पना में भी इसकी कोई छाया दिखाई देती है। न जाने क्यों, रोनाल्डो के आँसुओं में मुझे वही अदम्य नेपोलियन दिखता है, म्बापे में श्वेत सम्राट को फ़तेह दिलाने वाला अश्वेत सेनापति दिखता है और एर्लिंग हालैंड की जय-जयकार में नस्लीय श्रेष्ठता का दंभ दिखता है और इन सबमें मुझे बार-बार प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध की उड़ती हुई राख दिखती है...
ख़ैर, यहाँ सबसे ज़रूरी प्रसंग है रोनाल्डो के अश्क़ और उसी के आस-पास कहीं दर्ज है मेसी और नेमार के भी अश्क़। दुनियाभर की मीडिया ने रोनाल्डो के आँसुओं को अँग्रेज़ी में ‘टीयर्स ऑफ़ कॉन्शियंस’ कहा और इससे इंटरनेट पर उन ख़बरों पर बिना कॉन्शियंस वाले रिएक्शंस की बाढ़ आ गई।
आख़िर क्या ख़ास था इन आँसुओं में जो तमाम टीमों की जीत को भी धूमिल कर गया! कहीं न कहीं ये आँसू ख़ालीपन और पश्चाताप के थे और ये ख़ालीपन और पश्चाताप थोपा हुए था। इन्हें थोपा था बाज़ार ने और ख़रीदा था एक आशावादी एवं उपभोक्तावादी समाज ने! हम बार-बार किसी एक खिलाड़ी को अपने नायक का दर्जा देते हैं, उसको रईस बनाते हैं, उसकी सफलता पर जज़्बाती होते हैं और फिर उससे माँग करते हैं कि वह हमें देश के लिए भी कुछ करके दिखाए।
यहाँ सचिन तेंदुलकर का 2003 से 2007 के क्रिकेट विश्वकप तक और फिर 2007 से 2011 के क्रिकेट विश्वकप तक हुआ मीडिया ट्रायल याद आता है। कमोबेश यही विराट कोहली के साथ भी हुआ था। रोनाल्डो बेशक इन दोनों से नेटवर्थ और अंतरराष्ट्रीय शोहरत में काफ़ी आगे हैं। उनके कंधों पर गल्फ़ से लेकर यूरोप तक के एक ख़ास बाज़ार का भार भी है।
पहले हमने रोनाल्डो को अनेक लीग्स और कप्स जीतते हुए देखा, हमने उनकी ब्रांड वैल्यू पर नाज़ किया और फिर उनसे पूछा कि तुम ये सब तो ख़ालिस ख़ुद-ग़रज़ी में करते थे, अब देश के लिए कब कुछ करोगे? अगर तुम वास्तव में नायक हो तो फलाँ विश्वकप जीत कर दिखाओ? ये बोझ रोनाल्डो, नेमार और मेसी को बार-बार संन्यास लेने और वापस आने के द्वंद्व में बाँधकर, उनकी देशभक्ति मापता है और फिर जब फ़ीफ़ा के कैमरों में वे थके-थके दिखते हैं तो उनका निष्कासन अनिवार्य हो जाता है।
रोनाल्डो और नेमार ने उम्र के इस पड़ाव में भी, बाज़ार के तमाम तमाशों का अंग बनते हुए भी जिस स्तर की शारीरिक और मानसिक फ़िटनेस को नियमित रूप से बरक़रार किया हुआ है—वह इंसानी पैमाने पर अद्वितीय है पर इसकी चर्चा सिर्फ़ विशेष बाज़ार में ही होती है, फ़ीफ़ा के मीडिया तंत्र में नहीं!
लोग बता रहे हैं कि मेसी तो पेले और माराडोना की श्रेणी के नायक हैं। वहीं रोनाल्डो और नेमार शायद डेविड बेकहम या जिनेदिन जिदान की तरह श्रेष्ठता से एक पायदान दूर हैं; लेकिन मेसी की टीम और रोनाल्डो की टीम पर और प्रतिद्वंद्वी दल की कुशलता पर कोई ख़ास चर्चा नहीं है। ऐसे में यहाँ सौरव गांगुली और अनिल कुंबले याद आते हैं, भारत के खेल प्रेमी इस चर्चा को उस दौर की सचिन, ब्रायन लारा और रिकी पोंटिंग की तुलना के पैमानों जैसा ही कुछ-कुछ मान सकते हैं।
ख़ैर, सबसे ज़रूरी बात जो हर बार चर्चा में छूट जाती है, वह है फ़ुटबॉल टीमों में नस्लीय प्रतिनिधित्व और श्रेष्ठता का सवाल। इस फ़ीफ़ा आयोजन में अगर नॉर्वे सबको चौंका देता, तो एर्लिंग हालैंड को वाइकिंग पहचान से जोड़कर स्कैंडिनेवियाई युद्ध-संस्कृति का जमकर महिमामंडन किया जाता। यहाँ तक कि भारतीय मीडिया भी हालैंड की शारीरिक बनावट पर सनसनीख़ेज़ रिपोर्टिंग करने लगता है।
लेकिन जब फ़्रांस सब पर हावी होते हुए, अर्जेंटीना तक को डराता हुआ आगे बढ़ता है, तो म्बापे की नस्लीय पहचान पर कोई ख़ास चर्चा नहीं होती। अगर फ़्रांस की टीम—जिसमें दो-तिहाई अश्वेत खिलाड़ी हैं, जीत जाती है, तो क्या यूरोप की सांस्कृतिक पहचान में घुला अश्वेतों का पसीना भी गिना जाएगा? इस पर संदेह होना स्वाभाविक है।
इसी तरह, जब पश्चिम एशिया के मुस्लिम देश क़दम-दर-क़दम यूरोप के घमंड को तोड़ते हुए अपनी जगह बनाते हैं, तब उनकी नस्लीय पहचान या शारीरिक संरचना पर भी कोई ख़ास चर्चा नहीं होती।
कुल मिलाकर फ़ीफ़ा में सबकुछ वैसा ही हो रहा है, जैसा पिछले पाँच सौ सालों में हुआ है। सबसे पहले पश्चिमी यूरोपीय देश आपस में लड़कर मानक, नियम और शैली तय करेंगे—जैसे फ़ीफ़ा में ब्रिटेन, पुर्तगाल, स्पेन, फ़्रांस, इटली इत्यादि ने किया है। फिर आएँगे कुछ नेपोलियन जैसे विलक्षण यूरोपीय नायक जो नए तरीक़ों से पुराने तिलिस्म तोड़ेंगे—जैसे डेविड बेकहम, जिदान, वायने रूनी इत्यादि; तब तक खेल पलटेगा और लहज़ा बदलेगा और ग़ुलाम देश हावी होंगे—जैसे ब्राज़ील, अर्जेंटीना और उरुग्वे। अब इस जिल्लत से निपटने के लिए अंध महाद्वीप से सैनिक लाए जाएँगे, वे फिर से वर्चस्व स्थापित करेंगे लेकिन उनकी पहचान धूमिल ही रहेगी—जैसे फ़्रांस की टीम और म्बापे; इस पूरे टकराव में बड़े ही पोशीदा लहज़े से कुछ हज़ारों साल पुरानी पश्चिम एशियाई सभ्यताएँ खड़ी होगीं, जो बिना किसी छल के अपनी मौजूदगी दर्ज कराएँगी—जैसे मोरक्को, मिस्र और ईरान। इस आपा-धापी में कई नियम बदलेंगे और दबे पाँव एक वर्चस्ववादी यकायक सामने आ जाएगा फ़ीफ़ा में—अमेरिका की टीम की तरह और दूसरी तरफ़ ठीक वैसे ही दूसरा वर्चस्ववादी भी चुपचाप उपस्थित रहेगा फ़ीफ़ा में—जापान की टीम की तरह।
सब यही पूछेंगे कि अधपके सैमुअल हटिंगटन नुमा इस क्लैश ऑफ़ सिविलाइजेशन में भारत और चीन कहाँ है! और हम वहीं रहेंगे जहाँ हम थे—दर्शक दीर्घा में और बाज़ार में; कोई तो यह भी कह देगा कि विश्वयुद्धों में हम कहीं थे नहीं और हमारे सैनिकों को उन दलदली ट्रेंचों से निकले ही नहीं दिया गया तो हम क्या ही क्रिस्मस ट्रस वाला सॉकर खेलते? हम शायद अपनी कुंठा में यही कहेंगे—
“ऐसा नहीं कि मैं तुमसे जीत नहीं सकता,
बस तुम्हारी तहज़ीब से युद्ध मुझसे हो नहीं सकता”
जब 20 जुलाई को फ़ीफ़ा विश्वकप को अपना विजेता मिल ही जाएगा तो बातें कुछ यूँ होंगी—अगर कोई यूरोपीय देश जीता तो ख़ालिस प्रोफ़ेशनल फ़ुटबॉल की जीत मानी जाएगी, अगर अर्जेंटीना जीता तो एक नायक और एक देश की दीवानगी की विजय मानी जाएगी, अगर करिश्माई तौर पर मोरक्को ने सबकुछ बदल दिया तो फिर कुछ अप्रवासियों और ग़ुरबत से जुड़ा प्रचार होगा। इन सब के बीच अकूत दौलत इधर से उधर होगी, भारत में शायद फिर भी फ़ुटबॉल बारिश और समुद्र तटों का शग़्ल ही रहेगा लेकिन विश्वकप विजेता टीम में कितने अश्वेतों का पसीना और उस देश की मिट्टी में कितने अश्वेतों का ख़ून घुला है, इसकी चर्चा फिर नहीं होगी...
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