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मिर्ज़ापुर : कहानीहीन अंतहीन सिनेमा

सर पानी में डूबता है, गोली सिर के पीछे से माथे को चीरती हुई निकलती है, पूरा का पूरा पानी सुर्ख़ लाल हो जाता है और इसी कलात्मकता के साथ फ़िल्म सबसे पहले अपने नाम से आपको रूबरू करवाती है। एक पारंपरिक भारतीय घरेलू स्त्री के चित्रण से बार-बार और बात-बात में कपड़े उतरवाकर चीखें निकलवाई जाती हैं और इसी विकर्षण से फ़िल्म मध्यांतर तक आपको खींचकर लाती है। क्लिष्ट हिंदी में सबसे फूहड़ गालियों का अनुवाद करते हुए और हिंसा को और हिंसक दिखाते हुए चार किरदार आपको फ़िल्म के अंत पर लाकर पटक देते हैं। यह सब आश्चर्यजनक तब कहा जा सकता है, जब ‘वॉइस ऑफ़ हिंद रिज़ाब’ को सेंसर ने लँगड़ी मारकर गिरा दिया हो और आज ‘मिर्ज़ापुर’ के लिए ख़ुद ही गड्ढे में आराम से बैठे हों...

एक बार वहीदा रहमान जी ने कहा था कि उस ज़माने के सेंसर बोर्ड को किसी फ़िल्म के किसी गाने में उनकी आँखें हल्की लाल दिखीं, तो उस दृश्य को मादक की संज्ञा देकर काट दिया गया था। अगर वो लोग आज होते, तो शायद सब कुछ काट देते या सब कुछ रोक देते! ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ को बेशक लोक की भाषा और परिष्कृत होती संस्कृति के दायरे में रखकर किनारे से निकला जा सकता है, लेकिन एक बात अंत तक चुभती है…। समाज में प्रचलित और पोषित गालियाँ, जो मुखर तौर पर जननांगों पर ही केंद्रित होती हैं, क्या उनका क्लिष्ट हिंदी में रूपांतरण करके न सिर्फ़ सेंसर बोर्ड को चकमा दिया जा सकता, बल्कि उनको भाषाई अस्मिता के तौर पर रोमांटिसाइज़ भी किया जा सकता है? क्या साउंड इंजीनियरिंग और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को मिलाकर सेक्स को और उत्तेजक तौर पर परोसा भी जा सकता है और साथ ही साथ सेंसर की कैंची से बचा भी जा सकता है?

ख़ैर, कॉमर्शियल सिनेमा को भी साहित्य ही माना जाना चाहिए और फिर इस कसौटी पर सबसे पहले कहानी को ही कसना चाहिए; ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ की कहानी या फिर कथ्य बस इतना-सा ही है कि अपराध की बुनियाद पर खड़ी हुई व्यापार की ज़मीन अब राजनीतिक वर्चस्व की धुरी बन चुकी है, वर्चस्व जातीय टकराव और क्षेत्रीय पहचान से होते हुए हिंदी पट्टी के तीसरी श्रेणी के शहरों की गलियों में हिंसा और स्त्रियों के वस्तुकरण का औज़ार बनते-बनते और गली-मोहल्लों में नशा बाँटते हुए हिंदी पट्टी के सामंतीय वर्चस्व के विस्तार को पूर्वांचल, बिहार से खींचते हुए राजस्थान तक ला पटकता है। कहानी से इतर, किरदारों के स्तर पर बेशक ये उम्दा कलाकारी का दस्तावेज़ है; कालीन भैया खिलकर निखर चुके हैं, उनकी हिंदी भाषा पर पकड़ किसी प्राचार्य से कम नहीं है, उनका किरदार काफ़ी हद तक सोशल मीडिया पर तैरते हिंदी पट्टी के बाहुबली नेताओं से प्रेरित भी है और उससे कहीं ज़्यादा इन लोगों को प्रेरित करने वाला भी है; मुन्ना भैया अपनी भावनात्मक परिधि से निकलकर सिर्फ़ बेरोज़गार युवाओं को स्टेटस लगाने लायक प्रेरणा दे पाएँगे; गुड्डू भैया हैं भी और नहीं भी; रवि किशन बब्बन यादव के किरदार में कला के स्तर पर सबको दबाते हुए आगे निकल जाते हैं और इन सबसे इतर बिरजू लोहार का किरदार तगड़ी छाप छोड़ता है…। लेकिन असल विरोधाभासी दिलचस्पी पैदा करते हैं स्त्री पात्र।

बीना त्रिपाठी से लेकर स्वीटी और गोलू तक और यहाँ तक कि त्रिपाठी ख़ानदान की मुख्य नौकरानी तक अपनी सेक्शुअलिटी की आज़ादी खोजने की भरसक कोशिश करते हुए पितृसत्ता की गलियों में कहीं गुम-से हो जाते हैं। ये सारे स्त्री पात्र हिंदी पट्टी के पिछड़े इलाकों के उभरते क़स्बाई बाज़ारों में रहते हैं, लेकिन आम लड़कियों की तरह अपनी पहचान की जद्दोजेहद से इतर अपनी यौन स्वतंत्रता की खोज में जूझती नज़र आती हैं। ख़ास तौर पर बीना त्रिपाठी का किरदार एक तरफ़ तो प्रेम करने की स्वच्छंदता का नज़रिया देता है, लेकिन इसके ठीक उलट यही किरदार दूसरी स्त्रियों को परोसने से बिल्कुल भी हिचकिचाता नहीं है। दूसरी तरफ़ मुमताज़ और ज़रीना का किरदार सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में प्रेम और शोषण के द्वंद्व को क़ायदे से दिखाता है। इसी कड़ी में जातीय अस्मिता के संघर्ष को एक संस्थागत आधार देना खटकता है; मिर्ज़ापुर में त्रिपाठी हैं, जौनपुर में शुक्ला हैं, बहराइच में जायसवाल हैं, जैसलमेर में कोई ठाकुर साहब है और सत्ता के केंद्र में यादव जी हैं।

यह फ़िल्म वो सब कुछ परोसती है, जो हिंदी पट्टी के युवाओं को मोहपाश में बाँधता आया है… जाति-आधारित राजनीति, हिंसा-आधारित वर्चस्व, बेशर्मी भरी कामुकता और नशे का मर्दानगी से सीधा राब्ता और कुछ शब्दों का लोक की भाषा का ज़रूरी अंग बना दिया जाना, जैसे बाहुबली, गद्दी, चूतिया, इत्यादि। फ़िल्म किसी हलवाई की उस आख़िरी मिठाई की तरह है, जिसमें वह अपनी दिनभर की बची हुई सारी मिठाइयों को एक साथ मिला देता है और फिर उसको फलाना स्पेशल कहकर बेच देता है, जिसमें जो भी चर्चित है, वो सब है, लेकिन असल में अपना कुछ भी नहीं है!

मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा, अगर अगले एक साल तक पूर्वांचल से लेकर बिहार तक के प्रधान प्रत्याशी से लेकर पूर्व सांसद तक की रील में कालीन भैया के संवाद न हों; इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होगा कि सड़क पर चलती गाड़ियों को मुन्ना भैया बनकर ही चलाया जाए और गिनतियों से मर्दानगी आज़माने का पैमाना शायद कई रूमानी संबंधों को तार-तार न कर दे। पूरे तीन घंटे बीस मिनट, मुझे यही सवाल कचोटता रहा कि आख़िर भारतीय संस्कृति में घुला हुआ सामंतवाद किस-किस रूप में, कब-कब और किस-किस माध्यम से वापस आता रहेगा और रूढ़ियों को हर बार और ज़्यादा तराशता रहेगा।

हाँ, हम एक बात पर ज़रूर सुकून और गर्व महसूस कर सकते हैं कि हिंदी दिवस क़रीब है और भारतीय मुख्यधारा के सिनेमा ने पूर्ण रूप से महाराष्ट्र के गैंगस्टर कल्ट को पूर्वांचल के माफ़िया राज से छोटा मानकर हटा दिया है। अब बॉलीवुड में टपोरी, अपुन जैसे शब्दों को भौकाल, वर्चस्व इत्यादि से बदला जा रहा है, स्मगलिंग वाले सूट-बूट धारण किए डॉन पर कुर्ता-जींस वाले भैया भारी पड़ रहे हैं, लेकिन अब रेप सीन्स की जगह पूर्ण संतुष्टि वाले सेक्स सीन्स ने ले ली है।

ये बिल्कुल सही है कि सिनेमा वास्तविकता से ज़्यादा आश्चर्यजनक नहीं हो सकता, लेकिन ये भी सही है कि एक इरॉस एंटरटेनमेंट जैसी डूबती कंपनी अपनी हाथों-हाथ ली गई शृंखला के किरदारों को सिर्फ़ री-इंट्रोड्यूस करके करोड़ों कमा सकती है। आख़िर में यहाँ ओटीटी अपनी गुपचुप अर्जित फ़तह पर मुस्कुराता है, वो कहता है कि, “देखो! कोविड से पहले जब गालियाँ, रक्तपात और सेक्स सेंसरड, तो मैंने उसको मांसाहार की तरह अलग से परोसा और जब एक बड़ा दर्शक वर्ग इसका सर्वहारा बन गया, तो मैं सेंसर को गुदगुदी करके सब कुछ सबके लिए ले आया……।”

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