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जमाल

1545 - 1605

भक्तिकाल और रीतिकाल के संधि कवि। शब्द-क्रीड़ा में निपुण। भावों में मार्मिक व्यंजना और सहृदयता। दृष्टकूट दोहों के लिए स्मरणीय।

भक्तिकाल और रीतिकाल के संधि कवि। शब्द-क्रीड़ा में निपुण। भावों में मार्मिक व्यंजना और सहृदयता। दृष्टकूट दोहों के लिए स्मरणीय।

जमाल का दोहा

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गज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराज।

चंद लखत बिकसत कमल, कह जमाल किहि काज॥

हाथी के कुंभस्थल को देखकर, सिंह दुबला क्यों हो रहा है? और चंद्रमा को देखकर कमल क्यों विकासत हो रहा है? इन विपरीत कार्यों का क्या कारण है? अभिप्राय यह है कि नायिका के हाथी के कुंभस्थल समान स्तनों को बढ़ते देखकर सिंह अर्थात् कटि प्रदेश दुबला हो गया है। नायिका के चंद्रमुख को देखकर, नायक के कमल रूपी नेत्र विकसित हो जाते हैं।

नैणाँ का लडुवा करूँ, कुच का करूँ अनार।

सीस नाय आगे धरूँ, लेवो चतर जमाल॥

हे नागर, मैं नतमस्तक होकर लड्डू-समान नेत्रों और बंद अनार जैसे दृढ़ कुचों को आपके सम्मुख समर्पण करती हूँ, आप इन्हें स्वीकार करें।

जमला लट्टू काठ का, रंग दिया करतार।

डोरी बाँधी प्रेम की, घूम रह्या संसार॥

विधाता ने काठ के लट्टू को रंगकर प्रेम की डोरी से बांधकर उसे फिरा दिया और वह संसार में चल रहा है।

अभिप्राय यह है कि पंचतत्त्व का यह मनुष्य शरीर विधाता ने रचा और सजाकर उसे जन्म दिया। यह शरीर संसार में अपने अस्तित्व को केवल प्रेम के ही कारण स्थिर रख रहा है।

पूरी माँगति प्रेम सो, तजी कचौरी प्रीत।

बराबरी के नेह में, कह जमाल का रीत॥

वह नायिका कचोड़ी चाहकर पूरी मांगती है। बड़ा बड़ी (एक सूखी तरकारी) के प्रेम के कारण वह इस प्रकार क्यों आचरण कर रही है? अभिप्राय यह है कि नायिका अपने पति से पूरी (पूर्ण) प्रीति माँगती है, वह कचौरी (अधूरापन) नहीं चाहती। बराबरी के प्रेम में पूर्णता ही होती है।

जमला एक परब्ब छवि, चंद मधे विविचंद।

ता मध्ये होय नीकसे, केहर चढ़े गयंद॥

एक अवसर पर यह दिखाई पड़ा कि चाँद के बीच दो चाँद हैं और इसी बीच हाथी पर चढ़ा हुआ एक सिंह निकला। गूढ़ अभिप्राय यह है कि नायिका के चंद्र-मुख पर जो दो नेत्र शोभित हैं, उनमें नायक के चंद्र-मुख का प्रतिबिंब पड़ रहा है इस प्रकार नायिका के चंद्र-मुख में दो चंद्र और दीख पड़े। नायिका वहाँ से हटी तो हाथी के समान उसकी जाँघों पर सिंह की-सी पतली कमर को देखकर कवि ने इस दृश्य को गूढ़ार्थ में अंकित किया।

बाल पनैं धोले भये, तरुन पनैं भये लाल।

बिरध पनैं काले भये, कारन कवन जमाल॥

बचपन में भोले-भाले नेत्र श्वेत होते हैं। युवा होने पर चपल अनियारे नेत्र किसी के प्रेम में फँस कर उसकी प्रीति में अनुरंजित होकर रतनारे हो जाते हैं और वे ही नेत्र वृद्धावस्था में सभी कुटिलताओं का अनुभव करके म्लान होकर काले पड़ जाते

हैं।

स्याम पूतरी, सेत हर, अरुण ब्रह्म चख लाल।

तीनों देवन बस करे, क्यों मन रहै जमाल॥

हे प्रिय, तुम्हारे नयनों ने तीनों देवताओं को जब वश में कर लिया है, तब मेरा मन क्यों तुम्हारे वश हो जायगा? नेत्रों की श्याम पुतली ने विष्णु को, श्वेत कोयों ने शिव को और अरुणाई ने ब्रह्मा को मोह लिया है।

प्रीतम नहिं कछु लखि सक्यो, आलि कही तिय कान।

नथ उतारि धरि नाक तं, कह जमाल का जान॥

सखी ने नायिका के कान में जो कहा, उसको प्रिय जान सका नायिका ने अपने नाक की नथ को क्यों खोल दिया ? अभिप्राय यह है कि नायिका के अधरों पर नथ को झूलते देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो अधर रस की रक्षा के लिए ताला लगा हो। नथ अधर रस के पान में बाधक है, ऐसा भ्रम नायक को होते देखकर सखी ने नायिका से नथ हटा देने को कहा।

नयन रँगीले कुच कठिन, मधुर बयण पिक लाल।

कामण चली गयंद गति, सब बिधि वणी, जमाल॥

हे प्रिय, उस नायिका के प्रेम भरे नेत्र अनुराग के कारण लाल हैं। उन्नत स्तन, कोयल-सी मधुर वाणी वाली सब प्रकार से सजी हुई गजगामिनी कामिनी चली जा रही है।

हरै पीर तापैं हरी बिरद् कहावत लाल।

मो तन में वेदन भरी, सो नहिं हरी जमाल॥

हे परमात्मा ! तू पीर ( वेदना ) हरण कर लेता है इसी से तुम्हें विरद हरि कहा गया है। पर मेरे शरीर में व्याप्त पीड़ा को तूने अभी तक क्यों नहीं हरण किया!

सज्जन हित कंचन-कलश, तोरि निहारिय हाल।

दुर्जन हित कुमार-घट, बिनसिन जुरै जमाल॥

सज्जन पुरुष का प्रेम स्वर्ण-कलश के समान है जो कि टूट जाने पर भी जुड़ जाता है, पर दुर्जन का प्रेम मिट्टी के घड़े-सा है जो कि टूटने पर जुड़ ही नहीं सकता।

या तन की भट्टी करूँ, मन कूँ करूँ कलाल।

नैणाँ का प्याला करूँ, भर भर पियो जमाल॥

इस शरीर को भट्टी (आसव बनाने का चूल्हा) और मन को कलाल (मदिरा-विक्रेता) बनाऊँगी, पर तुम नयनों के प्यालों में प्रेम (भक्ति) की मदिरा भर-भर कब पियोगे?

चंपा हनुमत रूप अलि, ला अक्षर लिखि बाम।

प्रेमी प्रति पतिया दियो, कह जमाल किहि काम॥

उस प्रेमिका ने अपने पति को पत्र में चंपा-पुष्प, हनुमान, भौंरा और ला अक्षर क्यों लिखकर दिया? गूढ़ार्थ यह है कि प्रेमिका अपना संदेश व्यक्त करना चाहती है कि उसकी और प्रेमी की दशा, चंपा और भ्रमर-सी हो रही है। दोनों मिल नहीं रहे हैं। इस हेतु वह स्त्री (चंपा) दूत (हनुमान) से कह रही है कि तू जाकर मेरे प्रेमी (भ्रमर) से कह कि मुझे मिलने की लालसा (ला) है। 'ला' का अर्थ यहाँ लाने का भी हो सकता है, मानो विरहिणी दूत से कहती हो कि तू जाकर प्रेमी को बुला ला।

नैन मिलैं तैं मन मिलैं, होई साट दर हाल।

इह तौ सौदा सहज का, जोर चलत जमाल॥

नयनों के मिलन से मन भी मिल जाता है। अर्थात दोनों एक दूसरे के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं। यह तो प्रेम का स्वाभाविक सौदा है इसमें बल पूर्वक कुछ नहीं प्राप्त किया जा सकता।

अबसि चैन-चित रैण-दिन, भजहीं खगाधिपध्याय।

सीता-पति-पद-पद्म-चह, कह जमाल गुण गाय॥

पक्षी आदि भी जिसकी आराधना कर निर्भय रहते हैं, तू भी उन्हीं के गुण गाकर भगवान राम के चरणों में आश्रय पाने की चाह कर।

कर कंपत लेखनि डुलत, रोम रोम दुख लाल।

प्रीतम कूँ पतिया लिखुं, लिखी जात जमाल॥

हे प्रियतम ! तुम्हें पत्र लिखते समय हाथ काँप रहा है और लेखनी भी हिल रही है। विरह के कारण रोम-रोम में पीड़ा हो रही है, पत्र लिखा ही नहीं जा रहा है।

जग सागर है अति गहर, लहरि विषै अति लाल।

चढ़ि जिहाज अति नामकी, उतरें पार जमाल॥

संसार सागर बहुत गहरा है, विषय वासनाओं की लहरें भयंकर उठ रही हैं। बिना प्रभु के नाम की नौका के पार उतरना कठिन है।

जमला ऐसी प्रीत कर, जैसी हिंदू जोय।

पूत पराये कारणे, जलबल कोयला होय॥

प्रीति तो ऐसी करनी जैसी कि एक हिन्दू स्त्री करती है। वह परजाए पुरुष (अपने पति) के लिये समय पड़ने पर स्वयं को राख बना देती है।

मुख ग्रीषम, पावस नयन, तन भीतर जड़काल।

पिय बिन तिय तीन ऋतु, कबहुँ मिट जमाल॥

साँसों की उष्णता से ग्रीष्म, निरंतर अश्रुपात से पावस और इच्छाओं पर तुषारापात होने के कारण शिशिर; इस प्रकार तीनों ऋतुओं ने उस विरहिणी के तन में अपना घर कर लिया है।

जमला प्रीत कीजिये, काहू सों चित लाय।

अलप मिलण बिछुड़न बहुत, तड़फ तड़फ जिय जाय॥

अपना सर्वस्व गँवाकर किसी से प्रीति करनी चाहिए। क्योंकि, सुख तो क्षणिक होता है पर वियोग अधिक सहन करना पड़ता है और प्राण तड़प-तड़प कर तजने पड़ते हैं।

सोना बया नीपजै, मोती लगै डाल।

रूप उधारा नां मिले, भूलै फिरौ जमाल॥

सोना बोने से उपजता नहीं, मोती किसी डाल में नहीं फलता, रूप (लावण्य) कहीं से उधार नहीं मिल सकता; इनको प्राप्त करने के हेतु भ्रमवश भटकना नहीं चाहिए।

ससि, खंजण, माणक, कँवल, कीर बदन एक डाल।

भवंग पुँछ तें डसत है, निरखत डर्यो जमाल॥

एक ही डाल पर मैंने चन्द्रमा, खंजन, मोती, कमल, कीर, शुक आदि को देखा। उसमें लिपटा एक सर्प पूँछ की ओर से डसता था, यह सब देखकर तो मैं भयभीत हो उठा। कूटार्थ यह है कि वह स्त्री (डाल) अपने हाथ (कमल) पर अपना मुँह रखे थी। उसके नेत्र खंजन के समान थे। दंतावली मोती के समान उज्ज्वल और नासिका शुक की चोंच की तरह नुकीली और उसकी वेणी नागिन सी थी।

कहँ बोई जाँमी कहाँ, कहँ फैली तिहिं बेल।

कहँ लागी फूलन-फलन, कह जमाल का खेल॥

प्रीति रूपी बेल प्रिय के दर्शन होने पर नेत्रों में उपजती है, हृदय में अंकुरित होती है और सम्पूर्ण शरीर पर प्रेम का आधिपत्य हो जाता है। प्रीति का रसास्वादन भी किसी अन्य स्थान पर होता है। इस बेल की बड़ी विचित्र गति है।

जमला जोबन फूल है, फूलत ही कुमलाय।

जाण बटाऊ पंथसरि, वैसे ही उठ जाय॥

यौवन एक फूल है जो कि फूलने के बाद शीघ्र ही कुम्हला जाता है। वह तो पथिक-सा है जो मार्ग में तनिक-सा विश्राम लेकर अपनी राह लेता है।

सकल क्षत्रपति बस किये, अपणे ही बल बाल।

सबल कुँ अबला कहै, मूरख लोग जमाल॥

सुंदर स्त्री अपने लावण्य के बल पर बड़े-बड़े महाराजाओं को वश में कर लेती है। इतने पर भी इस प्रकार की सबला (स्त्री) को अबला कहना, अज्ञानियों का काम है।

अगर चँदण की सिर घड़ी, बिच बींटली गुलाल।

एक दरसण हम कियो, तीरथ जात जमाल॥

अगर और चंदन के दो घड़े, जिन के मध्य में गुलाल (लाल रंग) की बीटली (गाँठ) थी, तीर्थ यात्रा को जाते हुए ऐसे दृश्य के दर्शन हुए। गूढ़ार्थ यह है कि कवि ने किसी स्त्री के अगर तथा चंदन से चर्चित कुचों को देखा, जिनकी घुंडी लाल रंग से रँगी थीं। स्वेत, श्याम, और लाल रंग से सौंदर्य प्रेमी कवि को त्रिवेणी (गंगा, यमुना और सरस्वती) के दर्शन हो गए, तब भला वह तीर्थ जाने की यात्रा का क्यों कष्ट झेलता?

जमला कपड़ा धोइये, सत का साबू लाय।

बूंद लागी प्रेम की, टूक टूक हो जाय॥

सत्य का साबुन लगाकर अपने मन-रूपी मलिन कपड़े को धोना चाहिए। प्रेम की यदि एक बूँद भी लग जाएगी तो (हृदय की) मलिनता टूक-टूक होकर नष्ट हो जाएगी।