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दयाराम

1833 - 1909

सतसई परंपरा नीति कवि।

सतसई परंपरा नीति कवि।

दयाराम के दोहे

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लाल लली ललि लाल की, लै लागी लखि लोल।

त्याय दे री लय लायकर, दुहु कहि सुनि चित डोल॥

लाल को लली से और लली को लाल से मिलने की इच्छा है। दोनों मुझे कहते हैं, अरी तू उससे मुझे मिलाकर विरहाग्नि को शांत कर। इनकी बातें सुनते-सुनते मेरा भी चित्त विचलित हो गया है।

चकमक सु परस्पर नयन, लगन प्रेम परि आगि।

सुलगि सोगठा रूप पुनि, गुन-दारू दूड जागि॥

चकमक के सदृश नेत्र जब आपस में टकराते हैं तो उनसे प्रेम की चिनगारियाँ निकलती हैं। फिर रूप रूपी सोगठे (रूई) पर इनके गिरने से आग सुलग जाती है, किंतु पूर्णतया प्रज्वलित तभी होती है जब उसका संयोग गुण रूपी शराब से होता है।

ऐसो मीठो नहिं पियुस, नहिं मिसरी नहिं दाख।

तनक प्रेम माधुर्य पें, नोंछावर अस लाख॥

प्रेम जितना मिठास दाख में है, मिसरी में और अमृत में। प्रेम के तनिक माधुर्य पर ऐसी लाखों वस्तुएँ न्योछावर है।

गोकुल ब्रंदावन लिहू, मोपें जुगजीवन्न।

पलटें मोको देहु फिर, गोकुल ब्रंदाबन्न॥

कवि कहता है, मेरी इंद्रियो के समूह (गोकुल) को आप लीजिए, अपने वश में कर लीजिए। तुलसीदल (वृंदा) और जल (वन) अर्थात् वृंदावन से ही आपकी मैं मनुहार कर सकता हूँ, अतः कृपा करके इन्हें स्वीकार कीजिए और इनके बदले में आप मुझे अपने प्रिय धाम गोकुल और वृंदावन में रहने का सौभाग्य प्रदान कीजिए।

कटि सों मद रति बेनि अलि, चखसि बड़ाई धारि।

कुच से बच अखि ओठ भों, मग गति मतिहि बिसारि॥

हे सखी! यदि तू अपने प्रिय से मान करती है तो अपनी कटि के समान क्षीण (मान) कर, यदि प्रीति करती है तो अपनी चोटी के समान दीर्घ (प्रीति) कर, अगर बड़प्पन धारण करती है तो अपने नेत्रों-सा विशाल कर। पर अपने कुचों के समान कठोर (वचन), ओठों के समान नेत्रों की ललाई (क्रोध), भृकुटी के समान कुटिल (मार्ग पर गमन) और अपनी गति के समान (चंचल) मति को सदा के लिए त्याग दे।

बिरहारति तें रति बढ़ै, पै रुचि बढन कोय।

प्यासो ज़ख्मी जिए तहूँ, लह्यो त्यागें तोय॥

विरह की पीड़ा से प्रेम बढ़ता है, पर इस तरह (विरह सहकर) प्रेम को बढ़ाने की रुचि किसी की भी नहीं होती। वैसे ही जैसे प्यासा घायल यह जानते हुए भी कि वह तभी जीवित रहेगा जब वह पानी पिए, पर प्राप्त जल को वह नहीं त्याग पाता।

दीठी दुरिजन की लगें, सब कहि मो पत्याय।

एसी सज्जन की लगे, प्रानसंग निठ जाय॥

लोग कहते हैं कि दुर्जन की नज़र लगती है, पर मुझे इस पर विश्वास नहीं होता। क्योंकि प्रेमी की नज़र तो ऐसी लगती है कि प्राणों के संग ही उससे (नीठ) मुक्ति मिलती है।

रति बिन रस सो रसहिसों, रति बिन जान सुजान।

रति बिन मित्र सु मित्रसो, रति बिन सब शव मान॥

प्रेम के बिना रस ज़हर के समान, ज्ञान अज्ञान के समान, मित्र अग्नि के समान और वस्तुएँ शव के समान दुखदाई एवं निरर्थक हैं।

सहज संवारत सरस छब, अलि सो का सुच होत।

सुनि सुख तो लखि लाल मो, मुद मोहन चित पोत॥

हे सखि! तू अत्यंत सुंदर होने पर भी बारंबार शृंगार करती है। ऐसा करने में तुझे क्या सुख मिलता है? (उत्तर में नायिका कहती है) सुन! सुख तो मुझे लाल को देखकर होता है क्योंकि (शृंगार करने पर) वे मुदित होकर मुझे निहारते हैं।

कटाछ नोक चुभी कियों, गडे उरोज कठोर।

कें कटि छोटी में हितू, रुची नंदकिशोर॥

हे सखी! प्रिय के कहीं मेरे कटाक्षों की नोक तो नहीं चुभ गई है? कहीं मेरे कठोर उरोज तो उनके नहीं गड़ गए हैं? अथवा मेरी कटि ही छोटी है जिसके कारण मैं नंदकिशोर को पसंद नहीं आई, बात क्या है?

असि माया मोपर करो, चलें माया ज़ोर।

माया मायारहित दिहू, निज पद नंदकिशोर॥

हे नंदकिशोर! मुझ पर ऐसी ममता रखिये, जिससे माया का कुछ भी ज़ोर चले। माया-रहित करके आप मुझे अपने चरण-कमलों का प्रेम दीजिए।

दीनबंधु अधमुद्धरन, नाम ग़रीब निवाज़।

यह सब में मैं कोन जो, सुधि लेत ब्रजराज॥

हे ब्रजराज! आप दीनबंधु हैं तो क्या मैं दीन नहीं हूँ, आप अधमों का उद्धार करने वाले हैं तो क्या मैं अधम नहीं हूँ, आप ग़रीबनिवाज़ हैं, तो क्या मैं ग़रीब नहीं हूँ। इन सब में से क्या मैं कुछ भी नहीं हूँ जो आप अब तक मेरी सुध नहीं लेते!

चूक जीव कों धरम है, छमा धरम प्रभु आप।

आयो शरन निवाजि निज, करि हरियें संताप॥

भूल करना जीव का धर्म है और हे प्रभु, क्षमा करना आपका धर्म है। मैं आपकी शरण में गया हूँ। संतापों को हर कर आप मुझे संतुष्ट कीजिए।

कृपन होत क्यों कृपाकर, तनक देत नहिं खोट।

दीनपात्र हों दिहू दया, दान खांन इक कोट॥

हे कृपाकर, आप कृपण क्यों हो गए हैं? मुझे थोड़ा दे देने से आपके भंडार में कमी नहीं होगी। मैं दीन पात्र हूँ, आप मुझे दया का दान दीजिए। आप की एक खान की करोड़ खानें होंगी।

स्यामा स्याम पुकारती, स्यामा रटते स्याम।

अली अचंभो आज बड, जुगल जपत निज नाम॥

हे सखि पहले श्याम श्यामा को और श्यामा श्याम का नाम रटा करते थे, पर आज बड़ा अचंभा देखा, दोनों अपने-अपने नाम रट रहे थे।

मोहि मोह तुम मोह को, मोह मो कहुँ धारि।

मोहन मोह वारियें, मोहनि मोह निवारि॥

मुझे केवल आपके मोह का मोह है, मेरे मोह को आप अपने अतिरिक्त और कहीं केंद्रित कीजिए। हे मोहन! आप इसका निवारण भी कीजिए। यदि करना ही है तो मेरे प्राणों का अंत कीजिए।

राखि साखि गत लाख करि, बही लहि को फीर।

कोटि जतन जिमि ना मिलें, गयो मुक्त को नीर॥

लाख को त्याग कर भी साख बचाइए। एक बार चले जाने पर फिर साख नहीं जमती। करोड़ों यत्न करने पर भी जैसे मोती की आब (चमक) वापस नहीं मिलती।

ढपें दोष गुन फुट करें, पर हरिजन यह चाल।

लखि शिव दुहु दधि तें लहे, गरल गिल्यो शशिभाल॥

हरिजनों की तो यही रीति है, वे दूसरे के दोषों को ढाँपते हैं और गुणों को प्रकट करते हैं। देखिए, शिवजी को समुद्र से विष और शशि दोनों प्राप्त हुए, पर उन्होंने विष को निगल लिया और शशि को भाल पर धारण किया।

मुकर मुकर सब वस्तु भई, नयन अयन किय लाल।

दृग पसारूँ जित-जित अली, तित-तित लखूँ गुपाल॥

जब से लाल नयनों में बसे हैं, सब वस्तुएँ जैसे दर्पण की हो गई हैं। क्योंकि मैं दृष्टि उठाकर जिधर देखती हूँ, उधर गोपाल ही गोपाल दिखाई देते हैं।

मो उर में निज प्रेम अस, परिदृढ़ अचलित देहू।

जैसे लोटन-दीप सों, सरक ढुरक सनेहु॥

हे श्रीकृष्ण! जेसे लौटन दीप से उलटा करने पर भी उसका तेल नहीं गिरता, (उसी तरह विपरीत परिस्थितियों एव प्रलोभनों में भी आपके प्रति मेरा प्रेम सदैव एक-सा बना रहे) ऐसा एकनिष्ठ प्रेम आप मेरे हृदय में दीजिए।

हरि बिसरी मनि-मान तजि, जिन मति कुरु को नीच।

मिलिहें त्यों सुख संपदा, ज्यों अयाच दुखमीच॥

हरि को भूल कर मणिरूपी मान को तज कर कोई भी माँगने की नीच प्रवृत्ति करे। जैसे समय आने पर बिना माँगे ही दुख और मृत्यु मिलती है, वैसे ही सुख और संपदा भी मिलेंगी।

पनघट पनघट जाय पन, घट पनघट कों ध्यान।

पनघट लाल चढ़ाय दें, अलि पनघट सुखखान॥

पनघट पर प्रतिष्ठा के घटने की संभावना है, किंतु मेरे घट में तो सदा पनघट का ही ध्यान बना रहता है; क्योंकि वहाँ प्रतिदिन प्रियतम पानी से भरा घट मुझे

ऊँचाते हैं। इसलिए हे सखी, पनघट मेरे लिए सुख-दाई है।

रसिक नैन नाराचकी अजब अनोंखी रीत।

दुसमन को परसे नहीं, मारे अपनों मीत॥

रसिकों के नयन-बाणों की अनोखी रीत है। दुश्मन का तो स्पर्श तक नहीं करते और अपने मीत को ही मारते हैं।

प्रेमामृत को स्वाद कस, को कबु कह्यों जाइ।

अनभविकों हिय जान ही, मुक मिसरी की नाइ॥

प्रेमामृत का स्वाद कैसा है, यह किसी से बताया नहीं जा सकता। इसको तो अनुभवों का हृदय जानता है जैसे गूँगा मिसरी के स्वाद को भली-भाँति जानता है।

जगजीवन जन तापहर, चपला पियु बपु स्याम।

वैष्णोंवल्लभ नीलग्रिव, हरि माधो जस नाम॥

(१) हे संसार के जीवन (जल) रूपी मेघ, तू लोगों का ताप हरनेवाला है। तू चपला (बिजली) का स्वामी है और काले शरीरवाला है। तू वनस्पतियों और मयूरों का प्रिय है। हरि (इंद्र) और माधव (कृष्ण) आदि नामों से भी तुझे पुकारा जाता है।

सखि पिय सुरत, सुरत, सुरत, सुरत सुर तन पीर।

सुर तन हिन सुर तन नहीं, सुर तनया सरि नीर॥

जमुना के जल में चंद्र प्रतिबिंब के दर्शन से संभोग समय देखी हुई प्रिय की सूरत और सहवास का स्मरण हो आया। वह मधुर स्मृति शूल बन कर तन में चुभने लगी। काम जागृत हो उठा, जिससे गोपिका का शरीर शिथिल हो गया जैसे उसमें प्राण ही हों।

प्यारी तेरों अधर रस, क्यों बिसरें गोपाल।

बेसर निरमल मुक्तहू, जिहिं परसत भों लाल॥

हे प्यारी! तेरे अधर-रस का स्वाद गोपाल कैसे भूल सकते हैं? देख बेसर का निर्मल मोती भी उन्हें स्पर्श करते ही लाल हो गया।

रतिरुझ में सुख समुझ मन, पें कहि सके बाक।

कटुताई में मिष्टता, जैसि करेला साक॥

प्रेम-पीड़ा में सुख है; उस सुख का मन अनुभव करता है पर वाणी उसे कह नहीं सकती। प्रेम-पीड़ा में आनंद उसी प्रकार निहित रहता है जिस प्रकार करेले के शाक की कटुता में उसकी मिठास।

बंधि गुन भूज इत्सन हती, दिहु दुज सनसि लगाय।

के उर सुगड़ चढ़ाय मो, धिज हर सिर कर ल्याय॥

(बांधना चाहो तो) अपनी भुजाओं की डोरी से बांध लो, (मारना चाहो तो) नेत्रों के तीक्ष्ण बाणों से मारो, (जकड़ना चाहो तो) अपनी दाँत-रूपी सानसी (सँडसी) से मेरे होठों को जकड़ लो (क़ैद करना चाहो तो) हृदय रूपी गढ़ में क़ैद कर लो। (सत्य की प्रतीति करना चाहो तो) शिव पिंडो (कुचों) पर हाथ रखने दो।