अर्चना लार्क के बेला
फूलचंद : जो लौटकर कभी नहीं आया
वह हमारी उम्र का था, मगर हट्टा-कट्टा बालक था। मुझे आज भी याद है—उसका बोलना, उसकी चमक से भरी आँखें! जो अनायास अपनी तरफ़ खींच लेती थीं। बिना कहे सुने उसे देखा जा सकता था। न जाने क्या था उसमें! आज सोचती
चिट्ठीरसा : कुछ परंपराओं का होना, जीवन का होना होता है
डाकिया आया है। चिट्ठी लाया है। ये शब्द अम्मा को चुभते थे। कहतीं चिट्ठीरसा आए हैं, बड़ी फुर्ती से उस दिन ओसारे से दुआर तक पहुँचतीं, जैसे कोई किसी अपने का इंतिज़ार करते माला जप रहा हो, और ईश्वर ने उसकी
ज़िंदगी के रंगों को धुँधला करता ख़ालीपन
ज़िंदगी—ख़ालीपन को भरने का दूसरा नाम भी है। हर व्यक्ति को अपनी ज़िंदगी में पूरा सम्मान और प्रेम पाने की आकांक्षा होती है लेकिन ज़िंदगी कुछ भी पूरा नहीं देती। कुछ अधूरा-सा छूट जाता है। इस ‘कुछ अधूरा-स