फूलचंद : जो लौटकर कभी नहीं आया
वह हमारी उम्र का था, मगर हट्टा-कट्टा बालक था। मुझे आज भी याद है—उसका बोलना, उसकी चमक से भरी आँखें! जो अनायास अपनी तरफ़ खींच लेती थीं। बिना कहे सुने उसे देखा जा सकता था। न जाने क्या था उसमें! आज सोचती
कहानी : सुरमेदानी
“माँ मरी नहीं थी। वो मेरी उन तमाम प्रेमिकाओं में ज़िंदा हुई, जिनसे मैंने प्रेम किया।” जानते हो बीकानेर में उस रात की आँखें उतनी ही अंधी और आबनूसी थी, जितने कई मनुष्य सब कुछ होते हुए भी ज़िंदगी से