राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है, उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं।
हम राष्ट्रीयता के अनुयायी हैं; पर वही हमारी सब कुछ नहीं, वह केवल हमारे देश की उन्नति का उपाय-भर है।
जब राष्ट्रवाद सफल होता है, तो कभी-कभी यह आक्रामक तरीक़े से बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़तरा बन जाता है।
भारत कभी भी सही अर्थों में राष्ट्रवादी नहीं रहा।
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राष्ट्रवाद एक बहुत बड़ा संकट है। यह विशेष बात है, जो सालों से भारत की समस्याओं का कारण रही है।
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देशभक्ति दुष्टों की अंतिम शरणस्थली है।
राष्ट्रवाद एक संकीर्ण विचार है, अगर वह ख़ुद में किसी व्यापक अवधारणा से जुड़ा हुआ नहीं है।
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