शृंगार पर पद

सामान्यतः वस्त्राभूषण

आदि से रूप को सुशोभित करने की क्रिया या भाव को शृंगार कहा जाता है। शृंगार एक प्रधान रस भी है जिसकी गणना साहित्य के नौ रसों में से एक के रूप में की जाती है। शृंगार भक्ति का एक भाव भी है, जहाँ भक्त स्वयं को पत्नी और इष्टदेव को पति के रूप में देखता है। इस चयन में शृंगार विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।

कहती राधिका अहीर

परमानंद दास

हौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रास

चाचा हितवृंदावनदास

सोभा केहि बिधि बरनि सुनाऊँ

चाचा हितवृंदावनदास

झूलत राधिका रस भरी

गोविंद स्वामी

तव तें रूप ठगौरी परी

गोविंद स्वामी

बिलावल

सूरदास मदनमोहन

रसिक कुँवरि बलि जाऊँ

गोविंद स्वामी

गरजत गगन उठे बदरा

गोविंद स्वामी

देखत रूप ठगोरी लागी

गोविंद स्वामी

कुंडल ललित कपोल जुगल

स्वामी अग्रदास

कनक कुंडल झाईं

गोविंद स्वामी