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निज़ाम फतेहपुरी

1957 | असनी, उत्तर प्रदेश

समकालीन हिंदी-उर्दू शायर एवं रचनाकार।

समकालीन हिंदी-उर्दू शायर एवं रचनाकार।

निज़ाम फतेहपुरी के दोहे

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फ़ितरत है इंसान की, सबके अलग विचार।

कुछ तो सच को सच कहें, कुछ करते इनकार

सौ में बोले झूठ जो, सवा सौ सुबह शाम।

असली नेता है वही, बाकी का क्या काम॥

चमक-दमक को देखकर, दुनिया में इंसान।

भूल गया है मौत को, कितना है नादान॥

आए सब बिन वस्त्र के, लड़ें कफ़न को आज।

साथ वही जाए कफ़न, जाए तख़्त न ताज़॥

छोड़ बुराई नेक बन, पाप करे शैतान।

स्वर्ग नर्क सब कर्म से, तेरे हैं इंसान॥

सच कहना है अब बुरा, कहे यहाँ सच कौन।

सच के दुश्मन हैं सभी, अच्छा है जो मौन॥

चल मुसाफ़िर समय हुआ, रुकना है बेकार।

हुआ आज़ाद क़ैद से, टूट गई दीवार॥

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सबको जाना एक दिन, भला बुरा क्या संत।

रहा सदा कोई नहीं, सबका होगा अंत॥

धोखा खाकर सीख ली, दुनियादारी यार।

मतलब का है साथ सब, मतलब का है प्यार॥

आज यहाँ तो कल वहाँ, जग में फिरे फ़क़ीर॥

अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर॥

इतना मत अभिमान कर, कौन यहाँ है साथ।

सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ॥

सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ।

उसकी दुकान झूठ की, धंधा है मत रूठ॥

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हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात।

सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात॥

झूठ-झूठ है सच नहीं, सच से जिंदा झूठ।

मिटे झूठ जब सच हटे, जैसे जल कर ठूँठ।

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उतरी उम्र ढलान पर, रहा अधूरा ज्ञान।

अंत नहीं है मौत से, आगे का कर ध्यान॥

राजा अच्छा है वही, कर जो करे मुआफ़।

भेद-भाव भी मत करे, सही करे इंसाफ़॥

फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद।

बुज़दिल इतना मत बनो, सब कुछ हो बर्बाद॥

साक़ी ऐसी मत पीला, चढ़कर उतरे यार।

एक बार ऐसी पिला, भव-सागर हो पार॥

हुआ नहीं है कल कभी, मत ले कल का नाम।

जो कुछ है वो आज है, कल का कल क्या काम॥

ख़त्म सफ़र कब मौत से, आगे भी है और।

सोच जहाँ की छोड़ दे, वहाँ बना ले ठौर॥

समझ-समझ समझा नहीं, समझ नहीं थी यार।

वो तो मेरे पास है, ढूँढ़ रहा बेकार॥

दंड ज़िना-बिल-जब्र का, फाँसी मिले कठोर।

मौत डरे जब मौत से, देख मौत का शोर॥

कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल।

बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल॥

कीड़े खाएँ क़ब्र में, जब तक रहे शरीर।

सोच वहाँ के दृश्य को, कैसी होगी पीर॥

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भूल गया है मौत को, लालच से मजबूर।

तन्हा जाना क़ब्र में, फिर भी करे ग़ुरुर॥

मांस जला हड्डी बची, राख बची शमशान।

भूल गए अपने सभी, कर्म बची पहचान॥

नेता बन मंत्री बनो, डिग्री का क्या काम।

पढ़े-लिखे बेकार सब, घूम रहे गुमनाम

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बढ़ती उम्र कभी नहीं, घटती है हर रोज़।

जग में आया किस लिए, करो मोक्ष की खोज॥

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जिसके दिल में प्यार है, सही वही इंसान।

पत्थर दिल कुछ नफ़रती, घूम रहे शैतान॥

कुछ दिन का बस खेल है, मौत हँसे इक ओर।

बचना मुश्किल मौत से, लाख़ लगा ले जोर॥

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