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कर्म पर दोहे

मांस जला हड्डी बची, राख बची शमशान।

भूल गए अपने सभी, कर्म बची पहचान॥

निज़ाम फतेहपुरी

छोड़ बुराई नेक बन, पाप करे शैतान।

स्वर्ग नर्क सब कर्म से, तेरे हैं इंसान॥

निज़ाम फतेहपुरी

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