‘चम्पवा की कलियाँ’ से जापान तक : प्रवास और सांस्कृतिक अंतर-माध्यमिकता की कथा
आशुतोष कुमार पाण्डेय
19 अक्तूबर 2026
जब किसी भाषा का गीत अपनी भौगोलिक सीमा पार करके किसी दीगर सांस्कृतिक धुन, वाद्य, नृत्य और संवेदना से जुड़ता है, तो वह केवल संगीत का इस्तेमाल नहीं रह जाता। वह इतिहास, स्मृति और मनुष्यों की अंतर-माध्यमिकता का दस्तावेज़ का रूप ले लेता है। ‘चम्पवा की कलियाँ’ इसी अर्थ में शानदार सांस्कृतिक पेशकश है। ‘माटी बानी’ फ़ोक-फ़्यूजन बैंड ने शमीसेन (तीन तारों वाले पारंपरिक जापानी वाद्य) की धुन, एहसास और अंदाज़ से इस भोजपुरी गीत को पेश करके लोकभाषा, लोकधुन और अंतरराष्ट्रीय संगीत-संवाद के बीच एक नया रिश्ता क़ायम करता है।
गीत के शुरू में और मुख्य रूप से गोरी को अपने परदेश गए पियवा से चम्पा के फूल रुपी पिया को पूरब जाने का मलाल है, जिसे धोबिया राग बयाँ किया गया है। पहली नज़र में यह आकर्षण और इंतिज़ार का एक लोकगीत लगता है, लेकिन इसके अंदर दूरी, यात्रा, स्मृति, परदेस और घर लौटने की कई तहे मौजूद हैं। जीवन राम और ग़ाज़ीपुर के धोबिया नृत्य के कलाकारों के साथ जापान की सायो कोमाडा की यह पेशकश इस सांस्कृतिक संवाद को और अर्थपूर्ण बना देती है। एक ओर भोजपुरी का गँवई लोक-संसार है, दूसरी तरफ़ जापानी गीत और प्रदर्शन की परंपरा है। इनके बीच चम्पा का फूल एक सांस्कृतिक रूपक के रूप में दिखता है। गोरी के लिए वह फूल भर नहीं, दूर गए पिया की स्मृति और उसके लौटने का इंतिज़ार है।
लेकिन ‘परदेश गए पिया’ की यह कल्पना भोजपुरी लोकसंगीत में नई नहीं है। इसके पीछे प्रवास की लंबी सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृति है। इस स्मृति फ़लक को देखने के लिए महेंदर मिसिर और भिखारी ठाकुर जैसे लोक रचनाकारों की तरफ़ देखना मुनासिब होगा।
इतिहास के भीतर मौजूद गीत
भोजपुरी संगीत के एक बड़े हिस्से को उसके प्रवासन के इतिहास से अलग नहीं देखा जा सकता हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन और गिरमिटिया प्रथा के समय बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों से अनेक महिला-पुरुष मज़दूर मॉरीशस, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, फ़िजी और कैरेबियन के दूसरे हिस्सों में गए। उनके साथ केवल उनका मजूर नहीं गया। उनके साथ भाषाएँ, धार्मिक विश्वास, लोकगीत, कथाएँ, विवाह-संस्कार और नाच भी गया। यह प्रवास केवल शरीरों का स्थानांतरण नहीं था। यह सांस्कृतिक प्रवास था। गाँव से समुद्र पार किसी वीरान जगह में पहुँचा व्यक्ति अपने साथ बहुत कुछ नहीं ले जा सकता था, लेकिन उसकी स्मृति में बसे गीत उसके साथ थे। खेत, नदी, आँगन, मौसम, प्रेम, विवाह, परिवार और विरह... ये सब गीतों में सुरक्षित थे। नई धरती पर पहुँचकर वही गीत नए अनुभवों से जुड़ने लगे और धीरे-धीरे उनका अर्थ भी बदलता गया। इसीलिए प्रवासी समुदायों में लोकसंगीत अक्सर स्मृति का सबसे मज़बूत माध्यम बनता है। लोकगीत वह चीज़ है जिसे व्यक्ति अपने भीतर लेकर यात्रा कर सकता है। उसे न ज़मीन चाहिए, न उसे किसी संस्था की कोई ख़ास ज़रूरत रहती है। वह आवाज़ और धुन के साथ चलता रहता है। यही वह बिंदु है जहाँ ‘चम्पवा की कलियाँ” को भोजपुरी प्रवासी संगीत की लंबी परंपरा से जोड़कर देखा जा सकता है।
पूरबी में परदेस का दर्द
भोजपुरी लोकसंगीत में महेंदर मिसिर जैसे लोक कलाकारों का स्थान इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उनके ‘पूरबी’ गीतों में प्रेम, विरह और परदेस जाने की वेदना अत्यंत गहराई से व्यक्त हुई है। उन्हें भोजपुरी के प्रमुख पूरबी गीतकारों में गिना जाता है और उनके गीतों में स्त्री की दृष्टि से प्रेम और बिछोह की आवाज़ मुख्य तौर पर सुनी जा सकती है।
उनके प्रसिद्ध गीत ‘होते पराते चलि जइहऽ मोरे राजा...’ में गोरी/पत्नी अपने पियावा के जाने की अंदेशा से बेचैन है, वह उससे कुछ देर और रुकने, बात करने और साथ रहने की निहोरा करती है। गीत की एक पंक्ति ‘हाते पराते चलि जइहऽ मोरे राजा...’ में वही बेचैनी समाई हुई है जो परदेस जाने वाले पुरुष और पीछे छूट जाने वाली स्त्री के नाता की पहचान बन चुकी है। यहाँ ‘परदेस’ केवल कोई दूर की जगह नहीं है, वह घरेलू जीवन के टूटने का दूसरा नाम भी है।
“चम्पवा की कलियाँ” में जब गोरी बिदेस गए पिया से चम्पा की कलियाँ लाने को कहती है, तो यह दरख़्वास्त इसी पुराने भोजपुरी भाव-संसार की एक नई प्रतिध्वनि जैसा लगता है। फूल यहाँ सनेसिया का काम करता है। प्रेमिका स्वयं विदेश नहीं जा सकती, इसलिए उसकी स्मृति फूल के रूप में यात्रा करती है।
‘बिदेसिया’ प्रवास का लोकनाट्य
महेंदर मिसिर के गीतों में जो विरह गीत की संवेदना बनकर आता है, भिखारी ठाकुर के यहाँ वही प्रवास एक विस्तृत सामाजिक कथा में बदल जाता है। इसका केंद्र है, रोज़गार के लिए घर छोड़कर जाने वाला पुरुष और उसके पीछे छूट जाने वाली स्त्री और परिवार। ‘बिदेसिया’ में प्रवास केवल प्रेम-विरह नहीं है। इसके भीतर ग़रीबी, आर्थिक मजबूरी, स्त्री-असुरक्षा, पारिवारिक विघटन और सामाजिक परिवर्तन भी दिखाई देते हैं।
‘बिदेसिया’ की ताक़त इस बात में है कि भिखारी ठाकुर ने किसी बड़े ऐतिहासिक दस्तावेज़ की भाषा में प्रवास की कहानी नहीं लिखी। उन्होंने उसे उस स्त्री की आवाज़ में लिखा जो अपने पिया की प्रतीक्षा में है। इसीलिए उनका लोकनाट्य इतिहास के तथ्यों में नहीं, भावनाओं में दर्ज है।
‘बिदेसिया’ की दुनिया में कलकत्ता उम्मीद का शहर भी है और बिछोह का शहर भी। वहाँ जाने वाला पुरुष रोज़गार और बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर जाता है, लेकिन उसके जाने का अर्थ घर में एक ख़ाली जगह का पैदा होना भी है। इसी प्रवासी भूगोल की झलक लोकगीतों में है। ‘बिदेस’ की कल्पना भोजपुरी लोकसाहित्य में केवल समुद्र पार जाना नहीं है। गाँव की दृष्टि से कलकत्ता भी ‘बिदेस’ था। घर और बाहर के बीच की दूरी ही अस्ल दूरी थी।
यही कारण है कि ‘चम्पवा की कलियाँ’ में बिदेस गया पिया हमें भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ के संसार की याद दिलाता है। फ़र्क़ महज़ इतना है कि आज का ‘बिदेस’ वैश्विक भूगोल है, जबकि भोजपुरी लोकगीत में ‘बिदेस’ कभी कलकत्ता, कभी दूसरे शहर और कभी समुद्र पार का संसार है।
अगर इस पूरी परंपरा को एक रेखा में देखें तो यह एक दिलचस्प सांस्कृतिक यात्रा है। महेंदर मिसिर के गीत में स्त्री कहती है मत जाओ, कुछ देर और ठहरो। भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ में वही स्त्री लंबे प्रवास के बाद लौटने वाले या न लौटने वाले पिया की प्रतीक्षा करती है और ‘चम्पवा की कलियाँ” में विदेश गया पिया चम्पा की कलियाँ लेकर लौटने की कल्पना में दिखाई देता है। तीनों में एक समान भाव है—जाने वाला व्यक्ति और उसके पीछे छूट जाने वाला घर।
लेकिन ‘चम्पवा की कलियाँ’ इस पुराने भाव को एक नए वैश्विक संदर्भ में रखता है। यहाँ भोजपुरी गीत जापानी संगीत एहसास से मिल रहा है... यानी जिस भोजपुरी संस्कृति में कभी ‘बिदेस’ जाने वाले पिया की प्रतीक्षा की जाती है, वही संस्कृति अब स्वयं दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुँचकर संवाद कर रही है। यह एक महत्त्वपूर्ण बदलाव की तरफ़ इशारा है। पहले भोजपुरी लोकगीत में प्रवासी व्यक्ति दूसरे भौगोलिक सीमा की ओर जाता था और घर उसके लौटने की प्रतीक्षा करता था। आज गीत स्वयं यात्रा कर रहा है। वह जापानी कलाकार के साथ नए संगीत संसार में प्रवेश कर रहा है। इस अर्थ में गीत स्वयं एक ‘बिदेसिया’ बन जाता है।
भोजपुरी और जापानी संगीत
‘चम्पवा की कलियाँ” की दिलचस्प बात भोजपुरी और जापानी संगीत संवेदना का जुड़ाव है। यह जुड़ाव किसी एक संस्कृति के दूसरी संस्कृति पर हावी होने का उदाहरण नहीं, बल्कि संवाद का नमूना है। भोजपुरी लोकसंगीत में आवाज, लय और सामुदायिक पेशकश का विशेष महत्त्व है। लोकगीत रोज़मर्रा के जीवन में ही पैदा होते हैं। विवाह, खेती, ऋतु, प्रेम, विरह, जन्म, त्योहार और सामाजिक संबंधों से। जापानी संगीत परंपरा की अपनी ध्वनि-संरचनाएँ, वाद्य और सौंदर्यबोध हैं। शमीसेन की ध्वनि जब भोजपुरी लोकभाषा और लोकधुन के साथ आती है, तो दोनों परंपराओं के बीच एक तीसरी संगीतात्मक संभावना पैदा होती है और फ़्यूजन का मूल अर्थ भी शायद यहीं है। फ़्यूजन केवल दो अलग-अलग वाद्यों को एक ट्रैक में जोड़ देना नहीं है। असली फ़्यूजन तब होता है जब दो परंपराएँ एक दूसरे को सुनती हैं और उस संवाद से कुछ नया पैदा होता है।
इस गीत में भोजपुरी अपनी भाषिक और भावात्मक पहचान बनाए रखती है, जबकि जापानी कलाकार की सहभागिता उसके सांस्कृतिक दायरे को विस्तृत करती है।
प्रवास, प्रेम और घर की तलाश
‘चम्पवा के कलियाँ’ के इंतज़ार को प्रवासी अनुभव के संदर्भ में सुनना और देखना विशेष रोचक है। प्रेमिका जिस पिया की प्रतीक्षा कर रही है, वह ‘बिदेस’ गया है। बिदेस यहाँ केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। वह घर और बाहर, अपने और पराए, स्मृति और वर्तमान के बीच की दूरी का प्रतीक भी है। महेंदर मिसिर के गीतों में इसी दूरी की शुरुआत दिखाई देती है। भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ में यह दूरी सामाजिक त्रासदी का रूप लेती है। ‘चम्पवा की कलियाँ’ में वही दूरी एक कोमल प्रतीक चम्पा के फूल के ज़रिये व्यक्त होती है। इस तरह चम्पा एक प्रकार का सांस्कृतिक संदेशवाहक है। गोरी का पिया दूर है, लेकिन उस फूल रूपी घर से संबंध बनाए रखता है। वह बाहर से भीतर आने वाली वस्तु है। उसमें परदेस की यात्रा और घर की स्मृति दोनों एक साथ मौजूद हैं। यही लोकगीत की शक्ति है। वह बड़े ऐतिहासिक अनुभव को छोटी-सी घरेलू छवि में बदल देता है।
प्रवासी संगीत की परंपरा
भोजपुरी संगीत की यह कहानी भारत तक सीमित नहीं रही। गिरमिटिया प्रवास के साथ भोजपुरी और उत्तर भारतीय लोकपरंपराएँ मॉरीशस, त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम, फ़िजी और कैरेबियन के अन्य हिस्सों में पहुँचीं। वहाँ उन्होंने नई भाषाओं, नई सामाजिक परिस्थितियों और स्थानीय लोकसंगीत की परंपराओं के साथ संवाद किया। इस प्रक्रिया में भाषा बदली, उच्चारण बदला, वाद्य बदले और संगीत ही न बदले तो वह म्यूज़ियम की वस्तु बन सकती है; अगर वह हर बार अपनी पहचान खो दे तो उसकी ऐतिहासिकता समाप्त हो जाएगी। प्रवासी संगीत इन दोनों के बीच रास्ता बनाता है। वह पुराने कैरेबियन समुदायों के सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। भारतीय लोक और धार्मिक संगीत-परंपराएँ जब कैरेबियन समाज की अफ़्रीकी सांस्कृतिक विरासत के संपर्क में आईं तो उनमें बदलाव हुए, लेकिन उनकी मूल स्मृतियाँ बनी रहीं। भोजपुरी प्रवासी संगीत की यही विशेषता आगे चलकर इंडो-कैरेबियन चटनी संगीत में दिखाई देती है। ‘चम्पवा की कलियाँ’ का जापानी-भोजपुरी फ़्यूज़न और धोबिया नृत्य पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े हैं। यह एक सामूहिक सांस्कृतिक पेशकश है जिसमें स्थानीय लोकपरंपरा अपनी देह और लय के साथ उपस्थित होती है, जबकि जापानी कलाकारों और संगीत-संरचनाओं के संपर्क में आकर उसकी अभिव्यक्ति के नए रूप भी विकसित होते हैं। यही प्रवासी संस्कृति का विरोधाभास है। वह एक साथ संरक्षण और परिवर्तन, दोनों की प्रक्रिया है। संस्कृति अगर बिल्कुल न बदले तो वह संग्रहालय की वस्तु बन सकती है। प्रवासी संगीत इन दोनों के बीच रास्ता बनाता है। वह पुराने को बचाते हुए नए को स्वीकार करता है।
चटनी म्यूज़िक : प्रवास
चटनी म्यूज़िक भारतीय मूल के कैरेबियन समुदायों के सांस्कृतिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। भारतीय लोक और धार्मिक संगीत परंपराएँ जब कैरेबियन समाज की अफ़्रीक़ी, क्रियोल और अन्य सांस्कृतिक परंपराओं से मिलीं, तो उनसे एक नई संगीत-संवेदना विकसित हुई। इसे केवल ‘भारतीय या भोजपुरी लोक संगीत का विदेशी संस्करण’ कहना उचित नहीं होगा। यह एक नई सांस्कृतिक रचना है। इसमें भारतीय मूल के समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति भी है और कैरेबियन समाज में विकसित उसका नया जीवन भी। यहीं ‘चम्पवा की कलियाँ’ के जापानी भोजपुरी फ़्यूजन को समझने का एक महत्त्वपूर्ण बिंदु मिलता है। दोनों घटनाएँ ऐतिहासिक रूप से अलग हैं; लेकिन उनका सांस्कृतिक सिद्धांत समान है। संस्कृति यात्रा करती है और यात्रा करते हुए बदलती भी है।
चटनी संगीत में भोजपुरी और उत्तर भारतीय स्मृतियाँ कैरेबियन अनुभव से मिलती हैं। ‘चम्पवा की कलियाँ’ में भोजपुरी लोक-संवेदना जापानी संगीतात्मक सौंदर्यबोध से मिलती हैं। एक में कैरेबियन ज़मीन है दूसरे में जापान। दोनों में भोजपुरी संगीत स्थिर नहीं रहता।
धोबिया नृत्य : लोक-परंपरा की आवाज़
गीत में ग़ाज़ीपुर के धोबिया नृत्य कलाकारों की उपस्थिति इसे स्टूडियो शूट फ़्यूजन से अलग करती है। धोबिया नृत्य पूर्वी उत्तर प्रदेश ख़ासकर पूर्वांचल की लोक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा है और सामुदायिक पेशकश है, जिसका लोकजीवन तथा पारंपरिक लय से गहराई से जुड़ा है। लोकनृत्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक स्मृति के वाहक भी होते हैं। उनके भीतर श्रम, समुदाय, उत्सव, सामाजिक संबंध और स्थानीय जीवन की छवियाँ सुरक्षित रहती हैं। इस दृष्टि से गीत में धोबिया नृत्य और जापानी संगीत का साथ आना महत्त्वपूर्ण है। एक तरफ़ स्थानीय लोक-परंपरा अपनी देह और लय के साथ उपस्थित है, दूसरी तरफ़ जापानी कलाकार और संगीत की ध्वनि एक अलग सांस्कृतिक संसार का प्रतिनिधित्व करती है।
यहाँ वैश्वीकरण का अर्थ लोक को मिटाना नहीं, बल्कि लोक को दूसरे लोकों से बातचीत करने का अवसर देना है। हाँ, इसके साथ सावधानी भी ज़रूरी है। किसी लोक-परंपरा को केवल ‘एक्जॉटिक’ दृश्य या सजावटी पृष्ठभूमि में बदल देने के बजाय उसके सामाजिक इतिहास को समझना आवश्यक है। ‘चम्पवा की कलियाँ’ का महत्त्व इसी संभावना में है कि धोबिया नृत्य दृश्यात्मक सजावट भर न रहकर भोजपुरी सांस्कृतिक स्मृति की उपस्थिति है।
सांस्कृतिक अंतर-माध्यमिकता
डिजिटल युग ने सांस्कृतिक अंतर-माध्यमिकता के रास्ते बदल दिए हैं। यूट्यूब, फ़ेसबुक रील, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और दूसरे डिजिटल मंचों ने ऐसी भाषाओं और लोक-परंपराओं के लिए भी वैश्विक दर्शक उपलब्ध कराए हैं; जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा के सांस्कृतिक उद्योग में सीमित जगह मिली। अब सांस्कृतिक पूँजी केवल बड़े शहर, बड़े संस्थान या बड़ी भाषा से नहीं बनती। स्थानीय पहचान को वैश्विक संदर्भ में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना भी सांस्कृतिक शक्ति बन सकता है। जापानी कलाकार का भोजपुरी गीत में शामिल होना इसी बदलाव का संकेत है। यहाँ भोजपुरी को केवल ‘स्थानीय’ और जापान को केवल ‘वैश्विक’ मानने वाली सरल श्रेणियाँ टूटती हैं। दोनों एक साझा रचनात्मक प्रक्रिया में बराबरी से उपस्थित होते हैं। यहाँ सांस्कृतिक अंतर-माध्यमिकता एकतरफ़ा नहीं है। जापानी संगीत भोजपुरी तक आता है और भोजपुरी संगीत भी जापानी सांस्कृतिक दुनिया में प्रवेश करता है।
लोक-वैश्विक-लोक
महेंदर मिसिर और भिखारी ठाकुर की परंपरा हमें बताती है कि भोजपुरी लोकगीतों में प्रवासन कोई बाहरी विषय नहीं है। वह लोकजीवन के भीतर से पैदा हुआ अनुभव है। महेंदर मिसिर के यहाँ परदेस जाने वाले पिया के प्रति गोरी का भावनात्मक आग्रह है। भिखारी ठाकुर के यहाँ वही प्रवास परिवार, ग़रीबी, स्त्री-विरह और सामाजिक संकट की बड़ी कथा बन जाता है। बाद में यही प्रवासी संवेदना समुद्र पार जाकर नए सांस्कृतिक रूपों में ढलती है। ‘चम्पवा की कलियाँ’ इस लंबी यात्रा का एक नया पड़ाव है।
जापान में भोजपुरी गीत शमीसेन की ध्वनि से मिल रहा है। जापानी कलाकार उसकी प्रस्तुति का हिस्सा बन रहे हैं। ग़ाज़ीपुर का धोबिया नृत्य उसके दृश्य संसार में मौजूद है। यानी एक ही रचना में स्थानीय, राष्ट्रीय, प्रवासी और वैश्विक कई सांस्कृतिक लेयर एक साथ हैं। इसलिए वैश्विक होना अपनी स्थानीय पहचान छोड़ना नहीं है, बल्कि कई बार स्थानीयता ही वैश्विक संवाद को ख़ास बनाती है। संस्कृति की यात्रा इसीलिए सीधी रेखा में नहीं होती। वह वृत्ताकार होती है, लोक से बाहर जाती है, दूसरी संस्कृतियों से मिलती है और फिर नए रूप में लोक के पास लौटती है।
‘चम्पवा की कलियाँ’ को केवल एक मधुर भोजपुरी जापानी फ़्यूजन गीत के रूप में सुनना उसके अर्थ को सीमित कर देना होगा। इसके भीतर भोजपुरी समाज की विरह, महेंदर मिसिर की पूरबी परंपरा, भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ का प्रवासी संसार, लोकनृत्य की जीवित परंपरा, भारतीय प्रवास का इतिहास, इंडो-कैरेबियन चटनी संगीत और वैश्वीकरण जैसे नए सांस्कृतिक रिश्ते एक साथ हैं।
महेंदर मिसिर के गीतों से लेकर भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ तक एक बात लगातार सुनाई देती है, घर से दूर जाने वाले व्यक्ति की कहानी कभी केवल उसकी अपनी कहानी नहीं होती। उसके जाने से घर बदलता है, रिश्ते बदलते हैं, स्त्री का जीवन बदलता है और लोकगीतों की भाषा में एक नया दर्द जन्म लेता है। यही दर्द आगे चलकर प्रवासी समाजों में सांस्कृतिक स्मृति बन जाता है।
भोजपुरी लोकधुन गाँव से शहर और शहर से विदेश तक जाती है। प्रवासी समुदायों में वह नए रूप ग्रहण करती है। कैरेबियन में वह चटनी संगीत की नई पहचान बनाती है और अब जापान के साथ संवाद करते हुए वही लोक-संगीत सांस्कृतिक अंतर-माध्यमिकता बनती है। यह मेल किसी आकस्मिक प्रयोग का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही सांस्कृतिक आवाजाही की एक नई कड़ी है। मनुष्य जहाँ जाता है, संस्कृति भी उसके साथ जाती है। गीत उसके साथ जाते हैं, धुनें उसके साथ जाती हैं, नृत्य और लोक-कथाएँ वेदना एक नए संगीतात्मक रूप में सामने आती है। इस दृष्टि से जापानी और भोजपुरी संगीत का यह जोड़ किसी आकस्मिक प्रयोग का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही सांस्कृतिक अंतर-माध्यमिकता की एक नई कड़ी है और यहीं वह नई ज़मीन पर नई हवाओं, नई भाषाओं और नए लोगों से मिलती हैं और शायद इसी प्रक्रिया में संस्कृति जीवित रहती है।
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‘चम्पवा की कलियाँ’ की यहाँ सुन सकते हैं : ‘चम्पवा की कलियाँ’
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