भक्तिकाल

लगभग 1318 ई. से 1643 ई. के दरमियान भक्ति-साहित्य की दो धाराएँ विकसित हुईं—एक सगुण धारा, जिसमें रामभक्ति और कृष्णभक्ति की सरस गाथाएँ हैं; दूसरी निर्गुण धारा, जिसमें ज्ञानमार्गी संतों और प्रेममार्गी सूफ़ी-संतों की महान परंपरा है। भारत के सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास में भक्तिकाल को ‘लोकजागरण’ का स्वर्णयुग माना गया है।

दादू संप्रदाय

भक्तिकाल के निर्गुण संत। दादूपंथ के संस्थापक। ग़रीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना के गुरु।

संत कवि और गायक। संत दादूदयाल के प्रधान शिष्यों में से एक। सांप्रदायिक सद्भाव के प्रचारक।

1567 -1690 जयपुर

भक्तिकाल के संत कवि। विवाह के दिन संसार से विरक्त हो दादूदयाल से दीक्षा ली। राम-रहीम और केशव-करीम की एकता के गायक।

1596 -1689

दादूदयाल के प्रमुख शिष्यों में से एक। अद्वैत वेदांती और संत कवियों में सबसे शिक्षित कवि।