मारांग दाई महाश्वेता
बेबी शॉ
28 जुलाई 2026
“यक़ीनन आप यही जानना चाहेंगे कि मैंने कितनी बार विवाह किया है? या फिर मैं दिन में कितनी बीड़ियाँ पीती हूँ? क्या मैं व्हिस्की के एक गिलास के बिना रह सकती हूँ?”
जब जीवन के उत्तरार्ध में किसी बड़ी लेखिका की आवाज़ से ऐसे शब्द निकलते हैं, तो यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि समाज ने उन्हें किस नज़र से देखा। सिर्फ़ एक रचनाकार के रूप में तो कभी नहीं! फिर? एक स्वतंत्र और अपनी शर्तों पर जीने वाली स्त्री के रूप में उन्हें बार-बार उनके निजी जीवन के कटघरे में खड़ा किया गया। विडंबना यह है कि संथाल, मुंडा, हो, शबर, बिरहोर और अनेक आदिवासी समुदायों के लिए वह ‘मारांग दाई’ थीं—अर्थात् ‘बड़ी माँ’। उनके लिए वह कोई देवी से कम नहीं थीं... वह संकट की घड़ी में सहारा थीं... बड़ी बहन... अपने परिवार की सबसे आत्मीय सदस्य। दूसरी ओर, तथाकथित शिक्षित समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें उनके साहित्य, उनके संघर्ष और उनकी मानवीय प्रतिबद्धता को छोड़कर उनके निजी जीवन के तराज़ू पर तौलता रहा।
ऐसा होना संयोग नहीं था। उन्होंने समाज द्वारा गढ़ी गई ‘आदर्श स्त्री’ की परंपरागत चौखट में स्वयं को कभी क़ैद नहीं किया। लेखन के लिए, इतिहास की परतों में उतरने के लिए और अपने स्वप्न को साकार करने के लिए उन्होंने गृहस्थ जीवन की सुरक्षित सीमाओं से बाहर निकलने का साहस किया।
रानी लक्ष्मीबाई को समझने, उनके जीवन और संघर्ष के पदचिह्नों की तलाश में वह अपने चार-पाँच वर्ष के छोटे बेटे को उसके पिता के पास छोड़कर, उधार के कुछ पैसों के सहारे हावड़ा से तूफ़ान मेल में सवार होकर निकल पड़ीं। उस समय किसी स्त्री का अकेले इस तरह दूर-दराज़ की यात्रा पर निकलना लगभग असंभव-सा माना जाता था। नतीजा यह हुआ कि उन्हें समाज की आलोचना, ताने और बदनामी की आँधी भी झेलनी पड़ी। लेकिन उस यात्रा की उपलब्धि एक उपन्यास, बांग्ला साहित्य की अमर धरोहर बनकर सामने आई—‘झाँसी की रानी’ [झांसिर रानी]। यह उपन्यास इतिहास, शोध, साहस और एक स्त्री की अदम्य जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज़ है।
दूसरा विवाह भी अधिक समय तक नहीं टिक सका। शायद इसलिए कि एक स्वतंत्र विचारों वाली स्त्री से प्रेम तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन उसे उसकी शर्तों पर स्वीकार करने का साहस बहुत कम लोगों में होता है। समाज अक्सर ऐसी स्त्री को तभी तक स्वीकार करता है, जब तक वह उसकी बनाई हुई सीमाओं में क़ैद रहे। जैसे ही वह अपनी इच्छा से जीवन चुनती है, वही समाज उसे कटघरे में खड़ा कर देता है।
लेकिन जीवन की यही विडंबना है—जिस स्त्री को अपने एकमात्र बेटे से दूर रहने का असह्य दुःख सहना पड़ा, उसी ने आगे चलकर हज़ारों आदिवासियों को उनकी भाषा, उनकी स्मृति, उनकी अस्मिता और उनकी अपनी ‘मारांग दाई’ वापस लौटा दी। एक माँ का निजी वियोग, असंख्य वंचित लोगों के लिए सामूहिक आश्रय बन गया।
झाँसी की खोज में निकली उस यात्रा के दौरान उन्होंने केवल सरकारी अभिलेखों या इतिहास की पुस्तकों पर भरोसा नहीं किया। वह गाँव-गाँव घूमीं, चौपालों पर बैठीं, लोगों की बातें सुनीं, उनके लोकगीतों को आत्मसात् किया। उन्हीं लोकस्वरों में उन्हें इतिहास का वह चेहरा दिखाई दिया, जिसे सत्ता ने कभी दर्ज नहीं किया था—“बाईसाहेब ज़रूर ज़िंदा होउ नी…” अर्थात्—“रानी आज भी जीवित हैं।”
लोक-विश्वास कहता है कि रानी के स्पर्श से लकड़ी तलवार बन जाती है और मुट्ठी भर मिट्टी सैनिकों की फ़ौज में बदल जाती है। अँग्रेज़ 1857 के विद्रोह को इतिहास के पन्नों में दबा सके; लेकिन लोगों की स्मृतियों, गीतों और कथाओं से उसे कभी मिटा नहीं सके।
महाश्वेता देवी ने स्वयं लिखा था—“इस पुस्तक को लिखते समय मैंने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि मैं गणवृत्त के इतिहास में विश्वास करती हूँ। भारतवर्ष के संदर्भ में इतिहास के स्रोत के रूप में लोकगीत और लोकगाथाएँ अमूल्य धरोहर हैं।” यही उनकी इतिहास-दृष्टि थी। वह राजाओं और साम्राज्यों के लिखे इतिहास से अधिक उन लोगों की स्मृतियों पर विश्वास करती थीं, जिनकी आवाज़ इतिहास की किताबों में कभी दर्ज ही नहीं हुई।
पर समाज को इससे क्या लेना-देना था? समाज को अधिक उत्सुकता इस बात में थी कि उन्होंने कितनी बार विवाह किया, उनका तलाक़ क्यों हुआ, उन्होंने अपने बेटे को पिता के पास छोड़कर नया जीवन क्यों चुना! साक्षात्कारों में उनके साहित्य से अधिक उनके निजी जीवन पर प्रश्न किए गए थे। रिश्तेदारों और परिचितों की चर्चाओं का विषय भी उनकी रचनाएँ नहीं, सिर्फ़ उनके व्यक्तिगत निर्णय पर रहे। साठ के दशक में, जब तलाक़ के बाद किसी शिक्षित महिला का पुनर्विवाह लगभग सामाजिक विद्रोह माना जाता था, तब उन्होंने यह साहसिक निर्णय लिया। किंतु जीवन के अंतिम वर्षों तक उन्हें अपने ही जीवन के चुनावों का स्पष्टीकरण देना पड़ा।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हमारे समाज ने कभी किसी प्रसिद्ध पुरुष लेखक से इसी कठोरता के साथ यह पूछा कि उसने अपने परिवार या बच्चों के बारे में कौन-से निर्णय लिए थे? शायद नहीं। यही हमारे समाज का दोहरा मापदंड है—जहाँ पुरुष के निर्णय को उसकी स्वतंत्रता कहा जाता है, जबकि स्त्री के उसी निर्णय को जीवन भर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
महज़ सत्रह वर्ष की आयु में, 1943 के भीषण बंगाल अकाल के दौरान, उन्होंने अपनी माँ के साथ राहत-कार्यों में हिस्सा लेना शुरू किया। भूख से तड़पते लोगों तक भोजन पहुँचाते-पहुँचाते उन्होंने यह समझ लिया था कि मनुष्य के साथ खड़े होना ही जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा है। उसके बाद उनकी यह जीवन-दृष्टि कभी बाधित नहीं हुई।
पलामू, पुरुलिया, झारखंड, मेदिनीपुर—वह पैदल चलकर आदिवासी गाँवों तक पहुँचीं। उन्होंने दूर बैठकर, बंद कमरों में शोध नहीं किया; वे उनके साथ रहीं, उनके साथ खाया, उनके साथ रोईं और उनके साथ संघर्ष किया। शबर, लोधा, मुंडा, हो, संथाल, बिरहोर—जिन्हें हमने लगभग अदृश्य मनुष्य बना दिया था, उनके जीवन को उन्होंने साहित्य के केंद्र में स्थापित किया।
उनकी लेखनी ने बांग्ला साहित्य की दिशा ही बदल दी। उन्होंने लिखा था—“स्वतंत्रता के इकतीस वर्षों में मैंने देश के लोगों को न अन्न, न ज़मीन, न धन और न ही बेगार से मुक्ति पाते देखा। जिस व्यवस्था ने उन्हें यह आज़ादी नहीं दी; उसके विरुद्ध मेरा निर्मल, उज्ज्वल और सूर्य के समान प्रखर क्रोध ही मेरी समस्त रचनाओं की प्रेरणा है।”
इसीलिए ‘ऑपरेशन बसाई टुडू’, ‘हज़ार चौरासी की माँ’, ‘द्रौपदी’, ‘स्तनदायिनी’, ‘अरण्येर अधिकार’ और ‘बिछन’ जैसी रचनाएँ केवल साहित्य नहीं हैं; वे अपने समय के अन्याय के विरुद्ध लिखे गए एक प्रकार के अभियोग-पत्र हैं।
वह किसी राजनीतिक दल की लेखिका नहीं थीं। उनकी राजनीति मनुष्य के पक्ष में खड़ी राजनीति थी। वह कहा करती थीं—“जीवन कोई गणित नहीं है, और राजनीति मनुष्य के लिए होनी चाहिए, मनुष्य राजनीति के लिए नहीं। मनुष्य के स्वाधिकार और उसके सम्मानपूर्ण जीवन के अधिकार को सार्थक करना ही हर राजनीति का लक्ष्य होना चाहिए।”
वह एक लेखक होने के साथ-साथ एक अथक सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। जब बुधन शबर की पुलिस हिरासत में मृत्यु हुई, तो वह तुरंत उसके परिवार के पास पहुँचीं। उन्होंने कहा—“उसके परिवार के साथ कौन खड़ा होगा? उनका तो कोई नहीं है।” जिनके बारे में समाज कहता था—“इनका कोई नहीं है...” उनके साथ खड़े होना ही उनके पूरे जीवन की सबसे बड़ी पहचान बन गया। वह अक्सर कहा करती थीं—“The voiceless section of Indian society—इन लोगों को जाने बिना भारत को जाना ही नहीं जा सकता।”
इसी विश्वास से शबर मेला की शुरुआत हुई। वहाँ वह स्वयं शबर समुदाय के कारीगरों द्वारा बनाए गए सूप, हाथ के पंखे, टोकरी और अन्य हस्तशिल्प बेचती थीं। यह किसी प्रचार या प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का एक ईमानदार प्रयास था। इसी दौरान शबर कल्याण समिति का काम भी शुरू हुआ। वर्षों के शोध, संघर्ष और प्रशासनिक लड़ाई के बाद एक महत्त्वपूर्ण सत्य स्थापित हुआ—शबर मूलतः कृषक समुदाय नहीं हैं; वे जंगल पर निर्भर, वनवासी लोग हैं। जंगल ही उनका जीवन था, उनकी आजीविका थी और उनकी संस्कृति का केंद्र भी। लेकिन जब जंगल समाप्त होने लगे, तो राज्य की नज़र में वे भी एक ‘समस्या’ बन गए। तब सबसे बड़ा प्रश्न था—इन लोगों के जीवनयापन का सम्मानजनक रास्ता क्या हो सकता है? खोजबीन के दौरान पता चला कि वे काश घास के सूखे फूलों और तनों से अत्यंत सुंदर हस्तशिल्प तैयार कर सकते हैं। सूप, ढक्कन, मुलायम टोकरियाँ, टेबल मैट, छोटे बैग—साधारण-सी सामग्री उनकी उँगलियों के स्पर्श से कला में बदल जाती थी। आवश्यकता केवल उचित प्रशिक्षण और उनके उत्पादों के लिए बाज़ार उपलब्ध कराने की थी। इसके बाद वह एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक जातीं। अधिकारियों से मिलतीं, समझातीं, कभी तर्क देतीं, कभी भावनात्मक अपील करतीं :
“इन लोगों को वर्षों तक ‘क्रिमिनल ट्राइब’ कहकर अपमानित किया गया है। लेकिन ज़रा इनके हाथों का हुनर देखिए। आप अपने कार्यालयों में प्लास्टिक की फ़ाइल-ट्रे क्यों इस्तेमाल करते हैं? उनकी जगह काश घास से बने ये सुंदर उत्पाद अपनाइए। इससे आपके दफ़्तर भी सुंदर दिखेंगे और इन लोगों की आजीविका का रास्ता भी खुलेगा।”
शुरुआत में कई अधिकारी आश्चर्यचकित रह जाते थे... देश की एक प्रतिष्ठित साहित्यकार स्वयं अपने हाथों में टोकरियाँ, सूप और टेबल मैट लेकर दफ़्तर-दफ़्तर घूम रही हैं—यह दृश्य उनके लिए अविश्वसनीय था। लेकिन यह आश्चर्य बहुत जल्द सम्मान में बदल जाता।
महाश्वेता देवी की सच्ची प्रतिबद्धता, उनकी संवेदनशीलता और मनुष्य के प्रति उनकी गहरी ज़िम्मेदारी लोगों के मन को छू लेती थी। धीरे-धीरे प्रशासन के अनेक अधिकारी भी इस प्रयास के सहभागी बन गए।
सन् 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने पर मिली पूरी पुरस्कार-राशि उन्होंने बिना एक क्षण सोचे खेड़िया-शबर कल्याण समिति को समर्पित कर दी। उनके लिए पुरस्कार व्यक्तिगत गौरव का प्रतीक नहीं थे; वे उन लोगों का अधिकार थे, जिनके संघर्ष ने उनकी लेखनी को अर्थ दिया था।
सन् 2002 में गुजरात दंगे की विभीषिका के बाद भी वह चुप नहीं बैठीं। उन्होंने युवा लेखकों, प्रकाशकों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को बुलाया और कहा :
“मैं राष्ट्रपति के नाम एक विरोध-पत्र लिखती हूँ। तुम लोग उसे हज़ारों पोस्टकार्डों पर छपवाओ। फिर हर व्यक्ति कम-से-कम एक हज़ार लोगों के हस्ताक्षर जुटाए। यदि हममें से केवल दस लोग भी यह काम कर लें, तो दस हज़ार पोस्टकार्ड राष्ट्रपति तक पहुँच सकते हैं। विरोध की शुरुआत तो कहीं-न-कहीं से करनी ही होगी।”
वह केवल सभाओं में भाषण देकर अपना दायित्व पूरा मानने वालों में नहीं थीं। उन्होंने सचमुच हज़ारों पोस्टकार्ड छपवाए, आम लोगों के हस्ताक्षर जुटाए और उन्हें राष्ट्रपति तक भेजा। उनके लिए प्रतिरोध केवल शब्द नहीं था, वह जनता की सक्रिय भागीदारी का नाम था।
पर्यावरण के प्रश्न पर भी उनका रुख़ उतना ही स्पष्ट और अडिग था। शांतिनिकेतन में स्थित खोवाई नदी की प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए उन्होंने आवाज़ उठाई। भूमि-अधिग्रहण के नाम पर विकास की राजनीति जब लोगों की ज़मीन, जंगल और जीवन पर चोट करने लगी; तब भी वह बिना किसी भय के उसके विरोध में खड़ी रहीं।
इतनी बड़ी लेखिका होने के बावजूद उनके निजी जीवन में विलक्षण सादगी थी। जन्मदिन पर कोई उन्हें फूलों का गुलदस्ता भेंट करता, तो वह मुस्कराकर कहतीं : “शांतिनिकेतन ने हमें पेड़ों से गिरे हुए फूल उठाना सिखाया है, फूल तोड़ना नहीं। बाज़ार से ख़रीदे हुए फूलों के गुलदस्ते मुझे बिल्कुल अच्छे नहीं लगते।”
जब कोई पूछता कि उन्हें क्या उपहार दिया जाए, तो उनका उत्तर भी उतना ही सहज होता : “अगर कुछ लाना ही है, तो गरम मोज़े ले आना। सूती मोज़े भी चलेंगे। ऊनी ब्लाउज़ या दवाइयाँ रखने के छोटे-छोटे थैले भी मेरे बहुत काम आते हैं।”
यही थीं महाश्वेता देवी—जिन्होंने शांतिनिकेतन पाठभवन में शिक्षा पाई और स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर की कक्षाओं में बैठने का सौभाग्य प्राप्त किया। शांतिनिकेतन की शिक्षा उनके लिए उनके व्यक्तित्व का स्थायी संस्कार बन चुकी थी। शायद इसी कारण उनकी छोटी-सी इच्छाओं में भी उनके पूरे जीवन का दर्शन झलकता था। उन्हें वैभव नहीं, उपयोगिता प्रिय थी; प्रदर्शन नहीं, संवेदना; संग्रह नहीं, साझेदारी। उनका विश्वास था कि जीवन की सच्ची गरिमा अनावश्यक आडंबर में नहीं, बल्कि किसी ज़रूरतमंद के जीवन में थोड़ी-सी रोशनी जोड़ देने में है।
आज उनकी जन्मशती भी बीत चुकी है। उनके निधन को भी दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। लेकिन एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या हमने सचमुच महाश्वेता देवी को याद रखा है? क्या उनके साहित्य, उनके संघर्ष, उनकी राजनीतिक दृष्टि और उनकी मानवीय प्रतिबद्धता पर उतना गंभीर अध्ययन, विमर्श, पुनर्पाठ और पुनर्मूल्यांकन हुआ, जिसकी वे अधिकारिणी थीं?
आज जब आदिवासी समुदायों का जीवन पहले से कहीं अधिक असुरक्षित है; जब जंगल, पहाड़ और नदियाँ कॉरपोरेट विस्तार तथा तथाकथित विकास के नाम पर लगातार उजाड़े जा रहे हैं, तब महाश्वेता देवी की रचनाएँ पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठती हैं। उन्होंने केवल कहानियाँ नहीं लिखीं; उन्होंने हमें यह सिखाया कि जिन लोगों की अपनी आवाज़ नहीं सुनी जाती, लेखक की क़लम उनकी आवाज़ बन सकती है।
महाश्वेता देवी का जब निधन हुआ [28 जुलाई 2016], उस दिन तथाकथित अभिजात समाज का एक बड़ा हिस्सा उनके जीवन को लेकर चर्चा, बहस और आलोचना में व्यस्त था। लेकिन जिन लोगों के लिए वह ‘मारांग दाई’, ‘देवी-माँ’ थीं—उन्होंने क्या किया? उस शोक से भरे दिन, पुरुलिया ज़िला के चाका नदी के किनारे शबर, हो, मुंडा और संथाल समुदाय के लोग एकत्र हुए। उनकी आँखों में आँसू थे, हृदय मौन शोक से भरा हुआ था। अपनी ‘मारांग दाई’ की स्मृति में उन्होंने वहाँ सागौन का एक नन्हा पौधा लगाया... और उस पौधे का नाम रखा—‘महाश्वेता!’
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