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हमारे राम कहाँ गए!

ये वे दिन थे जब अँधेरा आकर हमारे आँगन के बीचोबीच बैठ जाता था और हम पाँचों भाई-बहन काँपते हुए संध्या-तारे से धूप की कहानियाँ माँगने लगते थे। लाल बिंदी लगाए हुए दादी एक-एक कर हर कमरे में रोशनी दिखातीं और कहतीं, “जा... जा... अँधेरा जा...”  दादी की धुली साड़ी की गंध महसूस करते हुए हम भी उनके स्वर में अपने स्वर मिला देते। इससे अँधेरा थोड़ा कम हो जाता था और डर भी थोड़ा घट जाता था। धूनी की सुगंध से हमारा शिउली-तला (हरसिंगार) भर उठता... एक पवित्र सांध्य-ध्वनि और शंख की आवाज़ चारों ओर फैल जाती।  

हम पाँचों—चचेरे-ताएरे भाई-बहन और मैं—मिलकर इंतज़ार करते कि देव-देवियों को दीप दिखाने का क्रम कब समाप्त होगा! तब तक हम हाथ-पाँव धोकर चटाई पर बैठ जाते थे। दादी भूमि पर दंडवत होकर प्रणाम करतीं। उनके आलता लगे पाँव दीखते और दीपक की लौ उज्ज्वल होकर जलती रहती। हमारी उत्सुकता बढ़ती जाती! लाल पाड़ की गहरी साड़ी और धूनी की गंध में लिपटी दादी आकर हमारे बीच बैठतीं। 

आज सरयू नदी पार करने का दिन है—छोटे राम का दिन, हमारे राम का! दादी मेरी ओर उँगली उठाकर बोलीं, “ठीक, तेरी ही उम्र का...” मैं गर्व से भर उठती थी। भाई-बहन ईर्ष्या भरी नज़रों से मेरी तरफ़ देखने लगते थे। इसमें मेरा क्या दोष! अगर कोई मेरे जैसा है, तो क्या उसकी ज़िम्मेदारी भी मेरी है! लेकिन दादी के इस एक वाक्य ने मेरे भीतर राम का स्थान स्थायी कर दिया। मैं सचमुच राम बन गई! 

सरयू के जल में जैसे मेरे पैरों की छप-छप सुनाई देने लगी, चूँकि भाई मेरी बात कभी नहीं मानता था—मैंने बहन को लक्ष्मण का रूप दे दिया और हमारे विशुबाबू बन गए क्रोधित विश्वामित्र।  

विशुबाबू सचमुच मूर्तिमान् विश्वामित्र थे। मुझे याद है कि जब मैं पढ़ना नहीं चाहती थी, माँ धमकाकर कहती थीं, “अब तुझे विशुबाबू के पास पढ़ने भेजना होगा।”  

विशुबाबू की फ़ीस थी—तीन सौ रुपये। वह तब के सबसे महँगे ट्यूशन-शिक्षक था। यह सुनने में आता था कि उन्हें मनुष्यों से अधिक प्रेम अंकों से था। अंक न आने पर वह किसी की भी खाल उधेड़ देने में संकोच नहीं करते!  

ख़ैर, विशु बाबू उर्फ़ विश्वामित्र के साथ हम दो बहनें—राम और लक्ष्मण—एक घने वन की ओर गति करने लगे। पूरा झाड़ग्राम जैसे हमारे पीछे-पीछे चल रहा था। सबकी आँखें नम थीं, मन भरा हुआ। माँ की आँखों में भी आँसू, जैसे : कौशल्या बार-बार मूर्च्छित हो रही हों।  

और हम? हम निर्भीक होकर चलते जा रहे थे, रोते भी जा रहे थे। हम मन ही मन सोच रहे थे कि ताड़का राक्षसी कितनी लंबी होगी? संध्या पिसी (बुआ) जितनी? कितनी काली? हमारे ताल पेड़ों के तने जैसी?  

विशुबाबू और भी गंभीर हो उठे। वह समझा रहे थे कि कैसे निशाना साधो कि हत्या सहज हो जाए! कितना भय मिलाओ कि एक चीख़ राजा का आदेश बन जाए! धनुष की डोरी में कितना ‘ए प्लस बी का स्क्वायर’ मिलाना होगा! सीखो... समझ लो... नहीं तो...

हालाँकि, मैंने अपनी सारी वीरता उनसे छिपा रखी थी। वह नहीं जानते थे—मैं लड़की हो सकती हूँ, पर किसी भी तरह राम से कम नहीं! मेरे पाले हुए कबूतर के बच्चे की ओर नज़र उठाने पर मैंने ही जेठिमा (बड़ी माँ) की बिल्ली को बोरे में बंद किया था... और वह भी मैं थी जो भोर-भोर में पेड़ों से पके हुए आम-जामुन फल उठा लाती थी। भाई-बहन पहले ऐसा करके दिखाएँ, तब मानूँ कि उनमें राम बनने की योग्यता है!  

बहरहाल, राम वनवास को निकल पड़े—चौदह वर्ष के लिए! राजा दशरथ विलाप कर रहे हैं। पर विश्वामित्र का शाप कोई साधारण बात नहीं। वह तब का ब्रह्मतेज था—आज का फ़ेसबुक/इन्स्टाग्राम-ब्लॉक नहीं!  

पिता चाहे जितना कहें कि मुझे हॉस्टल भेज देंगे, लेकिन यह हुआ तो निश्चित ही वह भी ऐसे ही विलाप करेंगे। वह सोचेंगे कि बेटी को अपनी गोद से अलग कैसे करें! ...मैं राम बनकर यह सब सोचती हुई चल रही हूँ—धीरे-धीरे। मन बहुत उदास है—माँ के लिए, भाई के लिए और अपने कबूतरों के लिए कि उन्हें अब कौन दाना डालेगा? सरयू नदी पार करते हुए भी मेरी आँखों में घर की दहलीज़ बार-बार तैर जाती... तभी दादी चुप हो जाती हैं। वह लाल रंग की ‘रामायण’ बंद कर देती हैं। हम भाई-बहन अगले दिन का इंतज़ार करते रह जाते हैं। 

मैं अंक करते-करते सोचती हूँ कि विशु बाबू को नाराज़ नहीं करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह मुझे नहीं, भाई को ही राम बनाकर जंगल ले जाएँ! तब तो न फेलूदा होगा, न शरलॉक होम्स जो सारी चालें खोल सके। दादू से पूछकर उनका पता निकालना होगा, भाई की सारी साज़िशें एक बार में उजागर करनी होंगी! हालाँकि, उस एक दिन के बाद दादी ने मुझे फिर कभी नहीं कहा, पर उसी दिन से हर संध्या मैं राम बन जाती थी। कभी चाँदनी रात में एक विशाल राक्षसी की छाया तैरती, तो कभी तपती दोपहर में जब माँ सोतीं, मैं आँगन के पास खड़ी होकर दूर शिवानंदपुर के मैदान में देखती—तेज़ धूप में एक सुनहरा हिरण चल रहा है और उसके पीछे दौड़ रहा है हमारे नरदादा का बेटा—बुल्टा। तब लगता, वही राम है। उसके पास बाँस का तीर है, रस्सी का बना धनुष है और सुर लगाने की अद्भुत क्षमता। उसकी धुन पर कितने ही पक्षी चले आते—कभी बाँसुरी, कभी कोयल, कभी घुग्घू की आवाज़! उसमें राम बनने के सारे गुण थे, पर वह मुझे कभी महत्त्व नहीं देता था। अब क्या किया जाए! उसके भीतर जो संभावना मैंने देखी थी—वह तो मैदान में ही खो गई।  

एक दिन धीरे-धीरे सीता वनवास के लिए चल पड़ीं—खुली पीठ पर घुँघराले-घने-काले बाल बिखरे हुए—सुंदर, बिल्कुल मेरी बहन की तरह। बहन ही सीता थी और सीता ही बहन। उसके चेहरे पर गहरे विषाद के बादल छाए थे—ठीक वैसे ही जैसे कई साल बाद बहन को हॉस्टल भेजते समय उसके चेहरे पर छा गए थे।  

इतना बड़ा-सा ट्रंक कि वह जैसे सचमुच वनवास पर जा रही हो। रास्ते में साँप हैं, बाघ हैं, मरे हुए सियार की ठंडी आँखें हैं—इन सबको पार करके सीता को जाना होगा। और मैं? मैं सहायक—लक्ष्मण। मैं गाड़ी चला रही हूँ।  

राम तब कोई और है... और वह बहुत बुरा है। मम्मी? पापा? कोई कैसे यूँ ही, बिना कारण, सुंदरता को निर्वासित कर सकता है? यह कैसा न्याय! मैं रो रही हूँ। भाई-बहन रो रहे हैं। माँ रोटी बनाते-बनाते सब सुन रही हैं, आँखें पोंछती जा रही हैं। दादी और भी करुण हो उठी हैं। जेठिमा चुपचाप चाय का कप लेकर बैठक में चली जाती हैं। यह दादू के चाय पीने का समय है। 

लेकिन आज दादी सब कुछ भूलकर छोटी-सी सीता बन गई हैं। उस दिन हमारा घर जैसे शोक में डूब गया था। हमारे बाग़ में उस दिन एक भी फूल नहीं खिला था। रात को नींद में मैं राम को बंदी बना रही हूँ, ठीक वैसे ही, जैसे मैंने उस बिल्ली को बोरे में बंद किया था। जैसे लव-कुश ने किया था। उसी दिन छोटी पिसी (बुआ) ने कहा था, “इसलिए कहती हूँ, लड़कियों का आत्मनिर्भर होना बहुत ज़रूरी है। अगर सीता वैसी होती तो राम को इतना साहस ही नहीं होता कि उसे वनवास भेज देते।”  

धीरे-धीरे समय बीतता है। हमारी ‘श्रीराम पंचाली’ समाप्त होती है। हम बड़े होने लगते हैं। दादी अब ‘महाभारत’ पढ़ने लगी हैं—श्रीकृष्ण, अर्जुन, कर्ण। बेचारा कर्ण! उससे भी पहले, जब हम राम-राम खेल छोड़ चुके थे, बड़े पापा नक्सल आंदोलन में शामिल हो जाते हैं। तब हम जैसे कहीं नहीं हैं... बिखरे हुए हैं सब। दादू ग़ुस्से में घर से बाहर रहते हैं। दादी असहाय हो जाती हैं। कुछ भी करके, उन्हें अपने बेटे को वापस लाना है।  

एक दिन दोपहर के समय हिमालय से एक साधु उतरकर हमारे घर आते हैं। दादी का हाथ देखकर कहते हैं, “तुम्हारे घर में क्रांति आएगी!”  

घबराई हुई दादी उस संन्यासी को चूड़ा, मुरमुरा और घर का जमाया हुआ दही खिलाती हैं। वह रामकृष्ण कथामृत की बातों पर विश्वास करने की कोशिश करती हैं। जब बड़े पापा सोते हैं, दादी चुपचाप उनके सिर पर सूखा जवा-फूल छुआ देती हैं—काली का आशीर्वाद समझकर! लेकिन... 

फिर भी कुछ नहीं बदलता। पिता और काका हॉस्टल में हैं। बड़ी पिसी की शादी हो चुकी है। छोटी पिसी मैट्रिक की परीक्षा में है। इसके बाद से दादी का पूजा-घर जैसे एक अलग संसार बन गया है। भय से जन्म लेते हैं—राम, श्रीकृष्ण, काली, दुर्गा। बड़े पापा इन सबको मिटा देना चाहते हैं और दादी उन्हें और कसकर अपने भीतर समेट लेती हैं। इस संघर्ष के बीच असहाय राम जैसे कहीं फँस गए हैं और पुकार रहे हैं : 

“आत्मानं मानुषं मन्ये, रामं दशरथात्मजम्…”  
(मैं स्वयं को मनुष्य ही मानता हूँ—दशरथ का पुत्र राम।)  

यह मानवीय राम ही धीरे-धीरे हमारे लिए अधिक सच्चे होते गए। बचपन में राम हमारे लिए बिल्कुल निजी थे—डर को दूर करने का मंत्र, खेल के साथी, कल्पना के मित्र। “राम-लक्ष्मण हमारे साथ हैं...” इस विश्वास से ही हम अंधकार पर विजय पा लेते थे। लेकिन समय के साथ देखा कि वही राम धीरे-धीरे राजनीति का औज़ार बनते जा रहे हैं। उनके नाम का जयघोष अब केवल भक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह एक तरह की सत्ता-भाषा में बदल गया है। इस बदलाव के बीच खड़े होकर बार-बार मन में प्रश्न उठता है, हमारे उस निजी राम का क्या हुआ?  

दरअस्ल, हमारे अंतर में राम कभी पूरी तरह अनुपस्थित नहीं रहे, लेकिन उन्होंने कभी एकछत्र प्रभुत्व भी स्थापित नहीं किया। कृतिबास ओझा के अनुवाद के माध्यम से रामायण बंगाल के घर-घर तक पहुँची। कथक-ठाकुरों के मुख से सुनाई जाने वाली पंचाली, मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई टेराकोटा कला और ग्रामीण संस्कृति की विविध परतों में राम की उपस्थिति बनी रही बहुत अधिक रूप से... लेकिन वह राम हर जगह एक जैसे नहीं थे—वह कहीं योद्धा हैं, कहीं प्रजापालक राजा, कहीं स्नेहमय गृहस्थ...  

चैतन्य महाप्रभु के भक्ति-आंदोलन के प्रभाव से जैसे बंगाल में कृष्ण-भक्ति लोकप्रिय हुई, वैसे ही राम भी उसी भक्ति-धारा में घुल-मिल गए। कई जगहों पर राम और कृष्ण एक ही सांस्कृतिक प्रवाह के हिस्से बन गए... यानी बंगाली समाज ने राम को दूर से नहीं पूजा, बल्कि अपने ढंग से गढ़ लिया। शायद इसी कारण हमारे लिए राम कभी केवल देवता नहीं रहे। वह हमारे बेहद अपने हैं—घर के किसी आत्मीय की तरह। एक ओर वह दादी की कहानियों के पात्र हैं, दूसरी ओर हमारे बचपन के खेल के साथी और कभी-कभी हमारे प्रश्नों के सामने खड़ा एक मनुष्य। उनके भीतर जहाँ वीरता है, वहीं संकोच, त्रुटियाँ और कभी-कभी कठोरता भी है... जो उन्हें और अधिक मानवीय बना देती है।  

आज जब चारों ओर राम के नाम की इतनी ऊँची गूँज सुनाई देती है, तब मन करता है कि लौट जाएँ उस संध्या के आँगन में—दादी की आवाज़ में, धूनी की सुगंध में बसे उस निजी राम के पास। वह राम न कोई नारा है, न कोई राजनीतिक प्रतीक, वह तो हमारे भीतर का, हमारे ही द्वारा बनाए हुए एक परिचित का चेहरा है, हमारे अंतर का आत्मीय। यही राम हमारे राम हैं—निजी, अंतरंग और गहरे मानवीय—एकदम अपने सुजन।

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