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ईरान में भारत का ख़्वाब : शाहनामा में पंचतंत्र और शतरंज

فیلش یاد هندوستان کرده
फ़ीलश याद-ए-हिन्दोस्तान करद :

[उसके हाथी को हिंदुस्तान याद आ गया—एक फ़ारसी कहावत, जिसका आशय है किसी प्रिय जगह या अपने अतीत में लौटने की कसक या हूक उठना।]

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ईरान को सारी दुनिया देख रही है। मलबे पर ज़ार-ज़ार होती है। कोन्या (तुर्की) में रूमी आराम-फ़र्मा हैं। तुर्बत के इर्द-गिर्द दरवेशों के रक़्स हैं, और वे गा रहे हैं

?तू दर जहान-ए ग़रीबी ग़ुर्बत चे: मी-कुनी

[?तू इस पराई दुनिया में, इस ग़ुर्बत में क्या कर रहा है, अजनबी]

लेकिन सादी, ख़य्याम और हाफ़िज़ के आस-पास मलबा इकट्ठा हो रहा है। तख़्त-ए-जमशेद और इस्फ़हान में क्या हुआ? अब्बास कियारोस्तमी के घर में बारूद की गंध क्यों है? माजिद मजीदी की फ़िल्मों के बच्चे कहाँ हैं? अभी सुना है कि जफ़र पनाही वापस ईरान लौट रहे हैं।

जानने की बेचैनी और जान लेने का दुख साथ-साथ चल रहे हैं। रहबरों, रहनुमाओं और रहगुज़र को चुनने और छोड़ देने की अंतहीन क़वायद जारी है।

हिन्द के वे तोते उड़ चुके, जो फ़ारसी की क़ंद [खंड-शक्कर का टुकड़ा] तोड़कर कविता का आनंद लेते थे। हाफ़िज़ ने कहा था

शिक्कर-शिकन शवंद हमे तूतीयान-ए-हिन्द
ज़ीन क़ंद-ए-पारसी के  बे-बंगाल  मी-रवद

मेरे सामने फ़िरदौसी का शाहनामा है—ईरान की आँख में भारत का एक ख़्वाब। जैसे बोर्हेस कहते हैं, आईने में जड़ा हुआ बाग़। यह पगडंडी झुलसी हुई नहीं है; यहाँ ज़बान पर नफ़रत और जेब में बारूद नहीं है। यह ईरान को बहुत पीछे लौटकर याद करने का मौक़ा है—जब सरकारें नहीं थीं, ख़िलाफ़तें नहीं थीं, ट्विटर नहीं था… पंचतंत्र था, चतुरंग था। दोनों ही क़िस्से बहुत मधुर विवरण के साथ शाहनामा में दर्ज़ है, आगे उन्हीं का संपादित अनुवाद और प्रस्तुति है।

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पंचतंत्र और शाहनामा

पंचतंत्र से हम परिचित हैं। सासानी काल में ईरान के राजा ख़ुसरो अनूशिरवान [नोशेरवाँ] के आदेश पर उनके वैद्य बुर्जोये [बरज़ोये] भारत गए और वहाँ से इस किताब को लेकर आए। उन्होंने इसका संस्कृत से पहलवी [मध्य-फ़ारसी] में अनुवाद किया। हालाँकि वह पहलवी अनुवाद आज उपलब्ध नहीं है, लेकिन उसी के आधार पर 8वीं शताब्दी में इब्न अल-मुक़फ़्फ़ा ने अरबी में इसका प्रसिद्ध अनुवाद “कलीला व दिमना” तैयार किया। बाद में यही अरबी और फ़ारसी ज्ञान-परंपरा के माध्यम से पूरी इस्लामी दुनिया और फिर यूरोप तक फैल गया और नीति-कथाओं की सबसे प्रभावशाली पुस्तकों में गिना गया। शाहनामा में यह प्रसंग इस तरह दर्ज है।

निगह कुन के शादान बरज़ीन चे : गुफ़्त – 1  
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हमान कस के बुरदश बि अब्र-ए बुलंद – 134

[शाहनामा – बख़्श 8]

क़िस्सा यूँ बयान किया गया है कि सासानी बादशाह नौशेरवान के दरबार में विद्वानों और वैद्यों की बड़ी महफ़िल रहती थी। उन्हीं में एक मशहूर हकीम था—बरज़ोये। वह ज्ञान की तलाश में तरह-तरह की किताबें पढ़ा करता था। एक दिन उसने हिंद के दफ़्तरों [पुस्तकों] को देखते हुए, एक अजीब बात पढ़ी। उसमें लिखा था कि हिंद के पहाड़ों में एक ऐसी जड़ी है, जो मुर्दे को भी ज़िंदा कर सकती है।

बरज़ोये ने यह बात बादशाह से कही और हिंद जाने की इजाज़त माँगी। नौशिरवाँ ने उसे इजाज़त दी, अपने ख़त और नज़राने देकर हिंद के राजा के पास रवाना किया, ताकि वहाँ उसकी मदद की जाए। बरज़ोये हिंद पहुँचा। हिंद के राजा ने उसका स्वागत किया और कुछ विद्वानों और वैद्यों को उसके साथ पहाड़ों में तलाश के लिए भेज दिया।

बरज़ोये बहुत दिनों तक पहाड़ों में भटकता रहा। तरह-तरह की जड़ी-बूटियाँ जमा कीं—सूखी भी, हरी भी—और उन्हें आज़माया, मगर कोई जड़ी मुर्दे को ज़िंदा न कर सकी। तब वह परेशान होकर हिंद के विद्वानों से पूछने लगा कि इस राज़ का मतलब क्या है।

उसे एक बूढ़े और दानिशमंद ब्राह्मण के पास ले जाया गया। उस बूढ़े ने मुस्कुराकर कहा कि इस बात का मतलब ज़ाहिरी नहीं है। वह जड़ी दरअस्ल ज्ञान है, पहाड़ उसकी बुलंदी है, और मुर्दा वह इंसान है जो नादानी में पड़ा हुआ है। जैसे मुर्दा जिस्म को जान चाहिए, वैसे ही नादान आदमी को ज्ञान चाहिए।

फिर उस ब्राह्मण ने उसे बताया कि इस इल्म का ख़ज़ाना एक किताब में है—कलीला व दिमना। यह हिकमत और अक़्ल की कहानियों का संग्रह है, जो इंसान की समझ को ज़िंदा कर देता है।

बरज़ोये ने उस किताब को हासिल किया और उसे लेकर ईरान लौट आया। जब उसने वह किताब नौशिरवाँ के सामने पेश की, तो बादशाह बहुत ख़ुश हुआ और कहा कि यह किताब दिल और दिमाग़ को ज़िंदगी देने वाली है। उसने बरज़ोये को ख़ज़ाने से इनाम देना चाहा, मगर बरज़ोये ने सिर्फ़ इतना कहा कि इस किताब की शुरुआत में उसका नाम यादगार के तौर पर लिख दिया जाए।

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शाहनामा में शतरंज [चतुरंग] का क़िस्सा

फिर भी साहित्यिक परंपरा में एक अलग कहानी ज़िंदा रही। शाहनामा में यह श्रेय बुज़ुर्गमिह्र को दिया गया है कि उन्होंने शतरंज की चुनौती के उत्तर में नर्द की रचना की और उसे हिंद के विद्वानों के लिए एक पहेली की तरह भेजा। फ़ारसी में इसे तख़्त-ए-नर्द कहा जाता है।

इस कहानी का उद्देश्य केवल खेल की उत्पत्ति बताना नहीं है। एक तरफ़ भारत से आए हुए शतरंज का भेद ईरानी दरबार में खोज लिया जाता है, दूसरी ओर ईरान से नर्द भेजा जाता है, जिसे सुलझाने में भारतीय विद्वान उलझे रहते हैं। इस बहाने दोनों सभ्यताओं के बीच ज्ञान, खेल और बुद्धि का एक सांस्कृतिक संवाद रचा जाता है।

चुनीन गुफ़्त मोबद कि यक रोज़ शाह – 1

कनून ता ब-बाज़ी कि आरद नबर्द –183

[शाहनामा – बख़्श 6]

एक कथा इस प्रकार कही जाती है। एक दिन सासानी सम्राट नौशेरवान अपने दरबार में विराजमान थे। रोमी रेशम से सजा दरबार था, हाथी-दाँत के सिंहासन के ऊपर ताज़ लटका हुआ था और महल सरदारों, पुरोहितों और विद्वानों से भरा हुआ था।

उसी समय ख़बर पहुँची कि हिंद के राजा का एक दूत दरबार में आया है। उसके साथ हाथी, छत्र, सवार और उपहारों से लदा हुआ कारवाँ था। जब वह दूत दरबार में पहुँचा तो उसने राजा को प्रणाम किया, ईश्वर की स्तुति की और अपने साथ लाए हुए उपहार पेश किए—सोना-चांदी, कस्तूरी, अंबर, बहुमूल्य रत्न और हिंद की तलवारें।

इन उपहारों के साथ उसने एक अजीब-सा तख़्त भी पेश किया—शतरंज का तख़्त। उसके मोहरे हाथी-दाँत और सागौन से बने थे। साथ ही हिंद के राजा का एक पत्र भी था। उसमें लिखा था कि यदि ईरान के विद्वान इस खेल के भेद को समझ लें—हर मोहरे का नाम और उसकी चाल जान लें—तो हिंद पहले की तरह कर (बाज़ - باژ) देता रहेगा। लेकिन यदि ईरान के ज्ञानी इसका रहस्य न समझ सकें, तो फिर कर देना उचित न होगा।

शतरंज का तख़्त बादशाह के सामने रखा गया। ईरान के विद्वान और पुरोहित उसके चारों ओर इकट्ठा हुए। उन्होंने मोहरों को देखा, तरह-तरह की चालें आज़माईं, बहुत सोच-विचार किया—लेकिन कोई भी उस खेल का नियम समझ न सका।

तब दरबार के महान् मंत्री बुज़ुर्गमिह्र आगे आए। उन्होंने बादशाह से कहा कि उन्हें थोड़ा समय दिया जाए। फिर वे उस तख़्त और मोहरों को लेकर एकांत में बैठ गए और दिन-रात उस पर सोचते रहे।

आख़िर एक दिन और एक रात की मेहनत के बाद उन्हें इस खेल का भेद समझ में आ गया। उन्होंने जाना कि यह खेल दरअस्ल युद्धभूमि का रूपक है, जिसमें शाह [राजा], फ़र्ज़ीन, हाथी, घोड़े, रुख़ [Rook] और पैदल सिपाही अपनी-अपनी चाल चलते हैं, जैसे सेना युद्ध में चलती है।

अगले दिन वे दरबार में पहुँचे और बादशाह के सामने उस खेल के सभी नियम समझा दिए। हिंद का दूत भी वहाँ मौजूद था। जब उसने देखा कि बुज़ुर्गमिह्र ने शतरंज का पूरा रहस्य समझ लिया है, तो वह आश्चर्य में पड़ गया।

नौशिरवाँ बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बुज़ुर्गमिह्र को सम्मान और उपहार दिए, लेकिन बुज़ुर्गमिह्र ने यहीं बात समाप्त नहीं की। उन्होंने विचार करके एक नया खेल बनाया—नर्द [नर्दशीर / बैकगैमोन]। यह खेल संसार के उतार-चढ़ाव और भाग्य के घूमते चक्र का प्रतीक था। यह खेल बाद में बुज़ुर्गमिह्र ने हिंदुस्तान भेजा, जिसको यहाँ के विद्वान और बाज़ीगर सुलझाते रहे।

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