C/O बंगाल : शरतचंद्र के दिन
बेबी शॉ
15 सितम्बर 2026
“मेरी विद्या-बुद्धि कुछ भी नहीं थी। बहुत दरिद्रता में दिन कटे हैं। बीस रुपये के अभाव में मैं परीक्षा में बैठने तक से वंचित रह गया था। ऐसे दिन भी आए, जब भगवान् से प्रार्थना करता था—‘हे भगवान्, कुछ दिनों के लिए मुझे बुख़ार ही दे दो; तो दो वक़्त के भोजन की चिंता से मुक्ति मिलेगी, उपवास में ही दिन कट जाएँगे।’ हालाँकि यह स्थिति बहुत लंबे समय तक नहीं रही। माँ की मृत्यु के बाद पिता एक प्रकार से विक्षिप्त हो गए थे। जो कुछ उनके पास था, सब बाँटते और नष्ट करते हुए अंततः वह भी इस संसार से विदा हो गए। उसके बाद मैंने पढ़ना शुरू किया। चौदह वर्ष की उम्र में चौदह-चौदह घंटे तक पढ़ता था। जिस परीक्षा में बैठ नहीं सका था, उसी की चोट और क्षोभ ने शायद मुझे इतना पढ़ने के लिए प्रेरित किया।”
‘मिलन’ उपन्यास के लिए प्रसिद्ध कानपुर-प्रवासी लीलारानी बंद्योपाध्याय को शरतचंद्र चट्टोपाध्याय छोटी बहन की तरह स्नेह करते थे। 24 अगस्त 1919 को उन्हें लिखे एक पत्र में शरतचंद्र ने अपने जीवन के इस कठिन दौर और उसके बाद आरंभ हुए कठोर अध्ययन का उल्लेख किया था। इसका ही एक अंश ऊपर उद्धृत है।
चौदह वर्ष की उम्र में प्रतिदिन चौदह घंटे अध्ययन करने की उनकी बात का कुछ प्रमाण उनके प्रसिद्ध निबंध ‘नारीर मूल्य’ में भी मिलता है। जिस शरतचंद्र को हम मुख्यतः उनकी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से जानते हैं, उनके निबंधकार रूप से शायद उतने परिचित नहीं हैं। किंतु ‘नारीर मूल्य’ उनके व्यापक अध्ययन, चिंतन और सामाजिक दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इस रचना में जिस प्रकार के तथ्य, तर्क और संदर्भ मिलते हैं; वे उनके गंभीर अध्ययन की स्पष्ट गवाही देते हैं। उनके निजी पत्रों में भी जगह-जगह उनके अध्ययनशील मन और निरंतर पढ़ने की प्रवृत्ति के संकेत मिलते हैं।
फिर भी यह एक दिलचस्प विरोधाभास है कि जिस शरतचंद्र ने आगे चलकर अध्ययन को अपने जीवन का अनिवार्य अनुशासन बना लिया था, बचपन में वही शरत पढ़ाई से लगभग विरक्त रहते थे। बचपन की एक घटना इस बात को बड़ी रोचकता से सामने लाती है।
गाँव के प्यारी पंडित की पाठशाला में पिता मोतीलाल ने शरतचंद्र का दाख़िला करा दिया था। शरत पाठशाला तो जाने लगा, लेकिन वहाँ पहुँचते ही एक नई मुसीबत खड़ी हो गई। पढ़ाई में मन लगाने के बजाय उसकी शरारतों ने प्यारी पंडित को परेशान कर रखा था। एक दिन पाठशाला में एक नया लड़का दाख़िल हुआ। शरत ने उससे पूछा, “तुम लिखना जानते हो?” लड़के ने जवाब दिया, “नहीं।” शरत ने तुरत कहा, “तो दे, तुम्हारी ओर से मैं लिख देता हूँ।” उसने लड़के की स्लेट अपने हाथ में ली और बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया—“तू एक गधा है।”
इसके बाद उसने ऊँघते हुए प्यारी पंडित को अचानक जगा दिया। पंडित की नज़र नए लड़के पर पड़ी। उन्होंने उसकी स्लेट हाथ में लेते हुए कहा, “क्या लिख रहा है, ज़रा दिखा तो!” लेकिन स्लेट पर लिखी पंक्ति देखते ही उनका धैर्य जवाब दे गया। वह गरज उठे, “अरे, छुछुंदर-मुँह वाले! ‘तू एक गधा है’—इसका क्या मतलब है रे उल्लू? क्यों लिखा है? जवाब दे!”
बेचारा नया लड़का भय से काँपने लगा। उसकी नज़र अनायास शरत की ओर उठी। लेकिन शरत तो अपनी शरारत का परिणाम भाँपते ही वहाँ से खिसक चुका था। उस समय उस बालक के लिए आम के बग़ीचे की ओर भाग जाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा था। 1887 में छात्रवृत्ति परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद शरतचंद्र ने स्थानीय अँग्रेज़ी स्कूल की सातवीं कक्षा में प्रवेश लिया। पहले ही वर्ष की वार्षिक परीक्षा में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया और उन्हें ‘डबल प्रमोशन’ भी मिला। उनकी प्रतिभा की यह पहली स्पष्ट झलक थी।
प्रवेशिका परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने एफ़.ए. की पढ़ाई आरंभ की। इसी दौरान राजेंद्रनाथ मजूमदार से उनकी घनिष्ठ मित्रता हुई। यही राजेंद्रनाथ आगे चलकर शरतचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास ‘श्रीकांत’ के इंद्रनाथ के रूप में साहित्य में अमर हुए। एकांत दुर्ग के पास बैठकर अपने मन की धुन में बाँसुरी बजाने वाला राजू शरतचंद्र को विशेष रूप से आकर्षित करता था। पतंग उड़ाना, तंबाकू पीना, गाना-बजाना, राजू के साथ अचानक कहीं निकल जाना और फिर लौट आना—इन दोनों की मित्रता का अपना ही संसार था। कभी रात के अँधेरे में जेली-नाव से मछली चुराने का रोमांचक अभियान, तो कभी जात्रा और थिएटर की रिहर्सल ऐसे ही साहस, शरारत और कल्पना से भरे दिनों में उनकी मित्रता और गहरी होती गई।
1895 में शरतचंद्र की माँ भुवनमोहिनी का निधन हो गया। इस आघात से व्याकुल मोतीलाल अपनी ससुराल छोड़कर खंजरपुर गाँव में आ बसे। यहीं शरतचंद्र ने अपने हमउम्र मित्रों को लेकर फिर एक ‘साहित्य-चक्र’ बनाया। पढ़ने-लिखने और साहित्य पर चर्चा का सिलसिला चल पड़ा। इसी मंडली में एक दिन उनकी कहानी ‘अभिमान’ पढ़ी गई। धीरे-धीरे मित्रों के बीच उनकी पहचान एक लेखक के रूप में बनने लगी।
साहित्य का आकर्षण अब उनके मन पर इस क़दर छा चुका था कि एफ़.ए. की परीक्षा में उनका परिणाम अच्छा नहीं रहा। परिवार की परिस्थितियों और भविष्य की चिंता के बावजूद उन्होंने अंततः कॉलेज की पढ़ाई को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया और साहित्य की दुनिया को ही अपना आश्रय बना लिया। आगे चलकर यही निर्णय भारतीय साहित्य को शरतचंद्र जैसा अद्वितीय कथाकार देने वाला सिद्ध हुआ।
शरतचंद्र की बहुभाषिकता भी उनके व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष थी। एक भवघूरे [यायावर] यात्री की तरह जीवन के विभिन्न प्रदेशों में घूमते रहने के कारण उन्हें भारत की अनेक भाषाओं और संस्कृतियों से परिचित होने का अवसर मिला। रंगून में लंबे समय तक रहने के कारण उन्होंने बर्मी भाषा सीखी और वहाँ की संस्कृति को भी निकट से जाना। बर्मी भाषा और संस्कृति की गहरी समझ के बिना ‘छवि’ जैसी कहानी की रचना संभवतः उस आत्मीयता और प्रामाणिकता के साथ नहीं हो सकती थी।
पाश्चात्य साहित्य और संस्कृति को समझने के लिए अँग्रेज़ी पर उनका अच्छा अधिकार था। इतना ही नहीं, उन्होंने फ़्रांसीसी भाषा का भी अध्ययन किया। इस प्रकार उनका साहित्यिक संसार केवल बंगाल की सीमाओं में आबद्ध नहीं रहा। जीवनानुभव, देश-विदेश की भाषाएँ, विविध संस्कृतियाँ और व्यापक अध्ययन इन सबने मिलकर उनकी सृजनशील चेतना को निरंतर समृद्ध किया और आगे चलकर उनके साहित्य को एक व्यापक मानवीय दृष्टि प्रदान की।
बाहरी व्यवहार में चाहे जितनी सामाजिकता, शिष्टता और परस्पर सम्मान रहा हो; रवींद्रनाथ ठाकुर और शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के संबंधों में एक प्रकार की आंतरिक दूरी सदैव बनी रही। इस दूरी के पीछे केवल साहित्यिक दृष्टिकोण का अंतर ही नहीं था, राजनीतिक विचारधारा और कुछ व्यक्तिगत कारणों ने भी इसे प्रभावित किया था। शरतचंद्र के निबंधों और निजी पत्रों में इस दूरी के अनेक संकेत मिलते हैं।
इसी संदर्भ में ‘पथेर दाबी’ [पथ के दावेदार] का प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ब्रिटिश सरकार द्वारा उपन्यास को ज़ब्त कर लिए जाने के बाद पूरे बंगाल में इसे लेकर अभूतपूर्व उत्सुकता और हलचल पैदा हो गई थी। प्रकाशन के महज़ बीस दिनों के भीतर इसकी तीन हज़ार प्रतियाँ बिक चुकी थीं। पुस्तक इतनी दुर्लभ हो गई थी कि उसके लिए पाठक बड़ी क़ीमत चुकाने को भी तैयार थे।
सरकार के इस निर्णय से शरतचंद्र गहरे आहत हुए। उन्होंने उपन्यास की एक प्रति रवींद्रनाथ के पास भेजी, संभवतः यह आशा करते हुए कि कविगुरु इसके पक्ष में अपनी स्पष्ट प्रतिक्रिया देंगे। पर पुस्तक पढ़ने के बाद रवींद्रनाथ ने जो विचार व्यक्त किए, उनमें शरतचंद्र की प्रतिभा और रचना के प्रति प्रशंसा तो थी, पर साथ ही उपन्यास की राजनीतिक और साहित्यिक दृष्टि को लेकर उनकी अपनी असहमति भी स्पष्ट रूप से सामने आई। इस प्रकार ‘पथेर दाबी’ को लेकर दोनों महान् साहित्यकारों के बीच का वैचारिक अंतर भी एक बार फिर उजागर हो गया।
रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा :
कल्याणीयेषु,
तुम्हारा ‘पथेर दाबी’ पढ़कर समाप्त किया। पुस्तक उत्तेजक है। अर्थात् अँग्रेज़ों के शासन के विरुद्ध पाठक के मन में असंतोष उत्पन्न करती है। लेखक के कर्त्तव्य की दृष्टि से यह दोष की बात नहीं भी हो सकती है—क्योंकि लेखक अगर अँग्रेज़ी राज को निंदनीय समझते हैं, तो चुप रह नहीं सकते। लेकिन चुप न रहने में जो ख़तरा है, उसे स्वीकार करना ही होगा। अँग्रेज़ी राज क्षमा करेगा; इस भरोसे पर ही हम अँग्रेज़ी राज की निंदा करेंगे, इसमें पौरुष नहीं है। मैं अनेक देशों की यात्रा करके आया हूँ। अपने अनुभव में मैंने देखा है कि अँग्रेज़ सरकार के अतिरिक्त स्वदेशी या विदेशी प्रजा के वचन या व्यवहार में प्रकट विरोध को और कोई सरकार इतनी धैर्य के साथ सहन नहीं करेगी।
अपनी शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि दूसरे की इस सहिष्णुता के बल पर अगर हम विदेशी शासन के संबंध में मनमाना व्यवहार करने का साहस दिखाना चाहें, तो वह पौरुष की विडंबना मात्र है। उसमें अँग्रेज़ी राज के प्रति श्रद्धा ही प्रकट होती है, अपने प्रति नहीं। राजशक्ति के पास बाहुबल है। उसके विरुद्ध यदि कर्त्तव्य के लिए खड़ा होना ही पड़े, तो दूसरे पक्ष के पास चरित्रबल होना चाहिए। अर्थात् आघात के विरुद्ध सहनशीलता का बल। लेकिन हम उस चरित्रबल की माँग अँग्रेज़ी राज से करते हैं, अपने आपसे नहीं। इससे प्रमाणित होता है कि मुँह से हम चाहे जो कहें, अपने ही अज्ञान में हम अँग्रेज़ों की पूजा करते हैं। अँग्रेज़ों को गाली देकर भी किसी दंड की आशा न करना ही उस पूजा का अनुष्ठान है।
शक्तिशाली पक्ष की दृष्टि से देखें तो तुम्हें कुछ न कहकर तुम्हारी पुस्तक को दबा देना लगभग क्षमा ही है। किसी अन्य प्राच्य अथवा पाश्चात्य विदेशी राजा द्वारा ऐसा किया जाता, इसकी आशा नहीं की जा सकती। हम स्वयं राजा होते तो ऐसा न करते—यह बात हमारे ज़मींदारों और देशी राजाओं के नाना प्रकार के व्यवहार में हम प्रतिदिन देखते हैं। लेकिन इससे क्या क़लम बंद कर देनी होगी? मैं ऐसा नहीं कहता। शक्ति को स्वीकार करके ही क़लम चलती रहेगी। जिस किसी देश में राजशक्ति और प्रजाशक्ति के बीच सच्चा विरोध हुआ है, वहाँ ऐसा ही हुआ है—राजविरोधिता आराम से और सुरक्षित रूप से रह सकती नहीं, यह बात निस्संदेह जानते हुए ही वह विरोध किया गया है।
तुम अगर किसी समाचार-पत्र में राजविरोधी बातें लिखते, तो उनका प्रभाव अल्प और क्षणस्थायी होता। लेकिन तुम्हारे जैसे लेखक कहानी के बहाने जो बात लिखेंगे, उसका प्रभाव निरंतर चलता रहेगा। देश और काल में उसके विस्तार की कोई सीमा नहीं होगी। अपरिपक्व आयु के बालक-बालिकाओं से लेकर वृद्धों तक, सभी उसके प्रभाव के अधीन आ सकते हैं। ऐसी स्थिति में अँग्रेज़ी राज यदि तुम्हारी पुस्तक का प्रचार बंद न कर देता, तो इससे यही समझ में आता कि साहित्य में तुम्हारी शक्ति और देश में तुम्हारी प्रतिष्ठा के विषय में उसे अत्यंत अवज्ञा और अज्ञान है।
शक्ति पर आघात करोगे तो उसके प्रतिघात को सहने के लिए भी तैयार रहना होगा। इसी कारण उस आघात का एक मूल्य है। आघात की गंभीरता को लेकर विलाप करने से उस आघात का मूल्य ही बिल्कुल मिट्टी में मिला दिया जाता है।
इति—
२७ माघ, १३३३
तुम्हारा
रवींद्रनाथ ठाकुर
~
रवींद्रनाथ ठाकुर का यह पत्र पाकर शरतचंद्र चट्टोपाध्याय काफ़ी आहत हुए थे। उसके प्रत्युत्तर में उन्होंने कठोर भाषा में एक पत्र लिखा था। लेकिन मित्रों की सलाह पर अंततः उन्होंने वह पत्र रवींद्रनाथ को नहीं भेजा।
रवींद्रनाथ ठाकुर को शरतचंद्र का उत्तर :
श्रीचरणेषु,
आपका पत्र मिला। अच्छा! ऐसा ही हो। पुस्तक मेरी अपनी रचना है; इसलिए थोड़ा-सा दुःख होना स्वाभाविक है, लेकिन वह कुछ भी नहीं। आपने जिसे कर्त्तव्य और उचित समझा है; उसके विरुद्ध मेरे मन में न कोई अभिमान है, न कोई शिकायत। लेकिन आपके पत्र में जो बातें हैं, उनके संबंध में मेरे दो-एक प्रश्न भी हैं और कुछ कहने को भी है। यदि वह किसी कैफ़ियत की तरह सुनाई दे, तो वह केवल आपको ही दे सकता हूँ।
आपने लिखा है कि अँग्रेज़ी राज के प्रति पाठक का मन अप्रसन्न हो उठता है। उठना ही स्वाभाविक है। लेकिन यदि मैं असत्य के प्रचार के माध्यम से ऐसा करने का प्रयत्न करता, तो एक लेखक के रूप में उसमें मेरी लज्जा भी होती और अपराध भी। लेकिन जान-बूझकर मैंने ऐसा नहीं किया। यदि करता, तो वह पॉलिटिशियन का प्रोपेगैंडा होता, लेकिन पुस्तक नहीं होती।
विभिन्न कारणों से बंगला भाषा में इस प्रकार की पुस्तक कोई नहीं लिखता। जब मैंने इसे लिखा और प्रकाशित किया, तब उसके सारे परिणामों को जानबूझकर ही ऐसा किया था। भारत में छोटे-छोटे बहानों पर जब बिना मुक़दमे के अथवा मुक़दमे का दिखावा करके कारावास, निर्वासन आदि का सिलसिला निरंतर चलता ही रहता है; तब मुझे इससे मुक्ति मिलेगी, अर्थात् राजपुरुष केवल मेरे प्रति ही क्षमाशील बने रहेंगे ऐसी दुराशा मुझे नहीं थी। आज भी नहीं है। उनके पास समय की कोई कमी नहीं है; इसलिए पहले या बाद में क्या होगा, इससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। यह मैं जानता हूँ और इसे जानने का कारण भी मेरे पास है। लेकिन यह सब रहने दें। यह मेरा व्यक्तिगत मामला है। लेकिन बंगाल के एक लेखक के रूप में अगर मैंने अपनी पुस्तक में असत्य का आश्रय नहीं लिया है और फिर भी राजरोष के कारण मुझे दंड भोगना पड़े तो भोगना ही पड़ेगा, चाहे मैं उसे मुँह बंद करके सहूँ या आँसू बहाकर। लेकिन क्या विरोध करना आवश्यक नहीं है? विरोध करने का भी यदि दंड हो तो उसके विरुद्ध फिर से विरोध करना आवश्यक है, ऐसा मैं मानता हूँ। अन्यथा परोक्ष रूप से बाहुबल को ही न्यायसंगत मान लिया जाता है। इसी कारण मैं विरोध चाहता था। मैंने दंड के विषय में नहीं सोचा था और न ही यह कल्पना की थी कि विरोध के बल पर यह पुस्तक फिर प्रकाशित हो सकेगी।
चोरी या डकैती के अपराध में अगर जेल हो जाए, तो उसके लिए भी हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है। लेकिन यदि वह आवेदन अस्वीकार ही हो जाए, तब दो वर्ष की जगह तीन वर्ष की सजा क्यों हुई—इस बात को लेकर विलाप करना उचित नहीं है।
राजबंदी जेल में दूध, छेना और मक्खन नहीं पाते; अथवा मुसलमान क़ैदियों को मुहर्रम के ताज़िये के लिए पैसे मिलते हैं तो हमें दुर्गोत्सव के लिए ख़र्च क्यों नहीं मिलता, इस प्रकार की शिकायत करते हुए पत्र लिखकर अख़बारों में रोना-धोना मुझे लज्जाजनक लगता है। लेकिन यदि मोटे भात के बदले जेल-अथॉरिटी घास खाने की व्यवस्था करे, तो शायद उनकी लाठियों की मार से उसे भी चबाना पड़े, लेकिन जब तक घास का वह गोला गले में अटककर प्राण न रोक दे, तब तक उसके अन्यायपूर्ण होने के विरुद्ध विरोध करना भी मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ।
लेकिन यह पुस्तक मेरी अकेले की लिखी हुई है, इसलिए इसकी ज़िम्मेदारी भी अकेले मेरी है। जो बात कहना उचित समझता हूँ; उसे मैं कह सका हूँ या नहीं, असल बात यही है। अँग्रेज़ सरकार की क्षमाशीलता पर मेरा कोई भरोसा नहीं था। मेरी समूची साहित्य-साधना भी इसी प्रकार की रही है। जिसे उचित समझा, वही लिखता चला गया। आपने लिखा है कि हमारे देश के राजा तथा प्राच्य और पाश्चात्य देशों की अन्य राजशक्तियों में किसी में भी अँग्रेज़ सरकार जैसी सहिष्णुता नहीं है। इस बात को अस्वीकार करने का अनुभव मेरे पास नहीं है। लेकिन यह मेरा प्रश्न ही नहीं है। मेरा प्रश्न यह है कि यदि अँग्रेज़ राजशक्ति के पास इस पुस्तक को जब्त करने का जस्टिफ़िकेशन है, तो पराधीन भारतवासी के लिए उसके विरुद्ध प्रोटेस्ट करने का जस्टिफ़िकेशन भी उसी प्रकार है।
मुझे लगता है कि आपने मेरे प्रति यह अन्याय किया है कि मानो मैं दंड से बचने के भय से ही विरोध का तूफ़ान खड़ा करना चाहता था और उसी बहाने अपने को बचाकर निकल जाना चाहता था। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। यदि देश के लोग विरोध नहीं करेंगे, तो मुझे करना ही होगा। लेकिन वह हो-हल्ला करके नहीं, एक और पुस्तक लिखकर।
आप लंबे समय से देश के कार्य में लगे हुए हैं। देश के बाहर का आपका अनुभव भी अत्यंत व्यापक है। अगर आप केवल मुझे इतना ही आदेश देते कि इस प्रकार के प्रचार में देश का वास्तविक मंगल नहीं है, तो वही मेरे लिए सांत्वना का कारण होता। तब मैं समझता कि मनुष्य से भूल होती है, मुझसे भी भूल हुई है।
मैंने यह पत्र आपके प्रति किसी प्रकार का विरोध-भाव लेकर नहीं लिखा है। जो कुछ मन में आया, वही निःसंकोच आपको बता दिया। मन में यदि किसी प्रकार का मैल होता, तो मैं चुप ही रह जाता। मैं वास्तव में सही रास्ते की खोज कर रहा हूँ। इसी कारण सब कुछ छोड़-छाड़कर निर्वासन में बैठा हूँ। धन-सामर्थ्य और समय कितना चला गया, यह किसी को बताने की बात नहीं। जीवन के दिन भी अब समाप्ति की ओर आ पहुँचे हैं। अब मन में सचमुच कुछ सार्थक कर गुज़रने की बहुत तीव्र इच्छा होती है।
उत्तेजना अथवा अवज्ञा के कारण इस पत्र की भाषा अगर कहीं कठोर हो गई हो, तो मुझे क्षमा करेंगे। आपके बहुत-से भक्तों में मैं भी एक हूँ। इसलिए अपने शब्दों या व्यवहार से आपको लेशमात्र भी दुःख पहुँचाने की बात मैं सोच भी नहीं सकता।
इति—
२ फाल्गुन, १३३३
सेवक
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय
~
दूसरी ओर, चित्तरंजन दास—शरतचंद्र के प्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व थे। उन्हीं के आह्वान पर शरतचंद्र प्रत्यक्ष राजनीति में आए। वर्ष 1921 में वह हावड़ा जिला कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। बहुत लंबे समय तक वह इस पद पर आसीन रहे।
क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम के साथ भी शरतचंद्र के आत्मीय संबंध थे। शरतचंद्र के अनेक निबंधों में व्यक्त विचार नज़रुल इस्लाम की प्रबंध-चिंता और सामाजिक दृष्टि से गहरे साम्य रखते हैं। दोनों के लेखन में अन्याय, सामाजिक असमानता, रूढ़ियों और मनुष्य की स्वतंत्रता के प्रश्नों को लेकर एक समान संवेदनशीलता दिखाई देती है। स्वाभाविक ही है कि जब दो समानधर्मी और समान रूप से चिंतनशील रचनाकार अपने समय और समाज को एक ही मानवीय दृष्टि से देखते हैं, तो उनके विचारों की दुनिया भी अनेक स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़ जाती है। शरतचंद्र और नज़रुल के संबंधों में यही वैचारिक आत्मीयता विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
रवींद्रनाथ के साथ शरतचंद्र के विचारों में भी समानता दिखाई देती है। दोनों का ‘चरख़ा-विरोध’ कई दृष्टियों से एक-दूसरे के निकट था। यद्यपि तब तक शरतचंद्र कांग्रेस के अध्यक्ष बन चुके थे, फिर भी उन्होंने ‘चरख़े’ के संबंध में लिखा था—“हमारे यहाँ खेतिहर और गरीब घरों की स्त्रियाँ सुबह से रात तक कठिन परिश्रम करती हैं। उसी के बीच यदि आधे घंटे का समय भी मिल जाए और महात्मा का आदेश बताकर उनके हाथ में चरख़े की मुठिया थमा दी जाए, तो वे सो जाती हैं। उन्हें दोष नहीं दे सकता। शायद सचमुच इसकी आवश्यकता नहीं है; बस इतना कह देना ही पर्याप्त है, शायद इसी कारण ऐसा होता है।”
‘भविष्यत् बंगसाहित्य’ निबंध में शरतचंद्र ने मुख्यतः साहित्यिक वातावरण की चर्चा की है। ‘सत्य और मिथ्या’ निबंध में उन्होंने विभिन्न घटनाओं के माध्यम से इसी बात का विश्लेषण किया है। यहाँ उन्होंने इसी को भविष्य के साहित्य-सृजन के लिए उपयुक्त वातावरण निर्मित करने की पूर्वशर्त के रूप में देखा है। लेखक के अनुसार, “हमारे साहित्य में नई चीज़ देने की गुंजाइश नहीं है। यूरोप की बात लीजिए। उनके पास चर्च है, नेवी है, आर्मी है। उनके बीच स्वतंत्र मेल-जोल है, आनंद है। हमारे यहाँ न इधर जाने की गुंजाइश है, न उधर जाने की।”
हमारे इस देश में एक दौर ऐसा भी था जब राजद्रोही ठहराए जाने की आशंका को सिर पर रखकर साहित्य-साधना करनी पड़ती थी। इस स्थिति में शरतचंद्र का मानना था, “राजनीति में, धर्म में, सामाजिक आचार-व्यवहार में जिस दिन हमारे हाथ बँधे और पैर सिकुड़े हुए नहीं रहेंगे, जिस दिन आनंद के भीतर से लिख पाना संभव होगा; उसी दिन फिर साहित्य-सृजन का दिन लौट आएगा।”
आज शरतचंद्र को पढ़ना उस मनुष्य को पढ़ना है, जिसे समाज बार-बार हाशिये पर धकेलता है और जो हर बार अपनी कहानी लेकर लौट आता है। शरतचंद्र के रचे पात्र आज भी हमारे आस-पास हैं—बस उनके नाम बदल गए हैं, उनकी बेचैनियाँ अब तलक वही हैं। शायद यही किसी लेखक की सबसे बड़ी उम्र है कि वह अपने समय से निकलकर दूसरे समय की बेचैनी में दाख़िल हो जाए। आज बंगाल बदल रहा है, उसकी राजनीति और उसके समाज की भाषा भी बदल रही है, सत्ता बदल चुकी है; लेकिन मनुष्य के भीतर का प्रेम, अपमान, अकेलापन और प्रतिरोध अब भी वैसा ही है। शायद इसलिए शरतचंद्र आज भी हमारे बीच हैं, क्योंकि बंगाल की कहानी बदलती रहती है; पर मनुष्य की कहानी वहीं लौट आती है, जहाँ शरतचंद्र उसे छोड़ गए थे।
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