हम पहाड़ पर नहीं, बल्कि ख़ुद पर विजय पाते हैं।
आप कभी भी इतने बूढ़े नहीं होते हैं कि कोई और लक्ष्य निर्धारित न कर सकें या कोई नया सपना न देख पाएँ।
कछुआ तभी आगे बढ़ता है, जब अपनी गर्दन बाहर निकालता है।
जितना हम अपने कर्मों को निर्धारित करते हैं, उतना ही हमारे कर्म हमें निर्धारित करते हैं।