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देह पर गीत

देह, शरीर, तन या काया

जीव के समस्त अंगों की समष्टि है। शास्त्रों में देह को एक साधन की तरह देखा गया है, जिसे आत्मा के बराबर महत्त्व दिया गया है। आधुनिक विचारधाराओं, दासता-विरोधी मुहिमों, स्त्रीवादी आंदोलनों, दैहिक स्वतंत्रता की आवधारणा, कविता में स्वानुभूति के महत्त्व आदि के प्रसार के साथ देह अभिव्यक्ति के एक प्रमुख विषय के रूप में सामने है। इस चयन में प्रस्तुत है—देह के अवलंब से कही गई कविताओं का एक संकलन।

किसे भूल जाऊँ?

शंभुनाथ सिंह

तन को चाहे जितना छू लो

विनोद श्रीवास्तव

हमारी देह का तपना

विनोद श्रीवास्तव

सहज सरल करना चाहे थे

चित्रांश वाघमारे

तन के पार

शंभुनाथ सिंह

हिन्दवी उत्सव 2026

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