अनफ़्रेम्ड : नाना पाटेकर : आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने!
दिनेश श्रीनेत
08 अक्तूबर 2026
नाना पाटेकर (1 जनवरी 1951–8 अक्टूबर 2026) हिंदी पॉपुलर सिनेमा के पहले और शायद आख़िरी एब्सर्ड किरदार थे। हमने दुःख और त्रासदी में डूबे दिलीप कुमार के समानांतर राज कपूर को देखा—भोला और ग़रीब, लेकिन नैतिक रूप से आस्थावान व्यक्ति। उनके हालात पर हम पहले हँसते हैं; फिर समझते हैं कि हँसी जिस स्थिति पर आई है, वह वास्तव में दुखद है। आगे एंग्री यंग मैन अमिताभ आए, जो निम्न या निम्न-मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं—ईमानदार, लेकिन व्यवस्था से पीड़ित।
यह शख़्स मेहनत करता है, मगर उसे न्याय नहीं मिलता। उसके सामने भ्रष्ट अमीर, सत्ताधारी और अपराधियों का गठजोड़ है। क़ानून पर उसका भरोसा ख़त्म हो चुका है। ख़ुद और परिवार का स्वाभिमान उसके लिए अहम है। वह न्याय चाहता है, लेकिन व्यवस्था उसे न्याय नहीं देती। अंततः वह न्याय न मिलने पर ख़ुद ही ‘पोएटिक जस्टिस’ के लिए आगे बढ़ता है। अमिताभ के किरदार से लोग इसलिए कनेक्ट होते थे, क्योंकि उन्हें लगता था : “जिस चीज़ के ख़िलाफ़ मैं बोल नहीं सकता, यह आदमी उसके ख़िलाफ़ लड़ सकता है।”
मगर अस्सी के दशक की एक सफ़ल, मगर ‘अंडररेटेड’ फ़िल्म में दर्शकों को मानसिक संतुलन खो बैठा एक पुलिसवाला सड़कों पर भागता नज़र आता है :
“अरे सिमेंट चोर, चल... कुचलने के सिवा और जानता ही क्या है तू... सत्ता में रहकर हज़ारों बोरी सीमेंट चाट गया। बोगस प्रतिष्ठान से लाखों रुपए हड़प कर गया। चल हट, तुझे जाने दूँगा? तू देश को गिरवी रख देगा... तुझे रोककर थोड़ी देर के लिए तो देश को बचा सकता हूँ...”
यह फ़िल्म थी ‘प्रतिघात’ जिसमें पहली बार दर्शकों ने एक ऐसा किरदार देखा, जो पूरे सिस्टम से फ़्रस्ट्रेट होकर पागल बन चुका है; मगर वह जो बोलता है, उसमें एक अनूठी विडंबना और कटाक्ष है। आगे चलकर इसी विडंबना और कटाक्ष ने नाना पाटेकर के किरदारों में अद्भुत मारकता पैदा की, लोग नाना का अंदाज़-ए-बयाँ देखने ही थिएटर में जाते थे। वह उनकी संवाद-अदायगी, देह-भाषा और ख़ास तरीक़े से लिखे गए एब्सर्ड संवाद का तालमेल था।
इससे पहले अमिताभ बच्चन का आम आदमी व्यवस्था से न्याय माँगता है और जब न्याय नहीं मिलता है तो वह सिस्टम के विरुद्ध विद्रोह करता है। नाना पाटेकर का आम आदमी व्यवस्था के बीच से गुज़रते हुए इस नतीजे पर पहुँच चुका है कि अब न्याय की उम्मीद ही नहीं की जा सकती। यह हताशा ही हक़ीक़त की आँखों में आँखे डालकर देखने का हौसला पैदा करती है; क्योंकि अमिताभ के समय में जो खोखला आदर्शवाद था, नाना के समय तक उसकी भी धज्जियाँ उड़ चुकी थीं। फ़िल्म ‘यशवंत’ में संगीत की लय पर नायक जब अपने संवाद बोलता है तो यह आसानी से समझा जा सकता है, वह किस तरह से लोगों की भावनाओं से सीधे जुड़ता है :
“सुबह घर से निकलो, भीड़ का एक हिस्सा बनो, शाम को घर जाओ, दारू पियो, बच्चे पैदा करो और सुबह तलक फिर एक बार मर जाओ... क्योंकि आत्मा और अंदर का इंसान मर चुका है। जीने के लिए घिनौने समझौते कर चुका है। हमारे चुने हुए कुत्ते हमें ही काटते हैं। हमारी ही बोटियाँ आपस में बाँटते हैं।”
रवि वासुदेवन अपनी किताब ‘द मेलोड्रामेटिक पब्लिक : फ़िल्म, फ़ार्म एंड स्पेक्टेटरशिप इन इंडियन सिनेमा’ में लिखते हैं, “नाना पाटेकर, जिन्होंने पहले थिएटर अभिनय का प्रशिक्षण लिया था, ने अपने सधे हुए शरीर और जोशीले, लयबद्ध संवाद-प्रक्रिया से मुख्यधारा के सिनेमा में एक नई अभिनय-शैली को जन्म दिया, जो एक तरह से ज़ुबानी हमले का काम करती है। वह अपने प्रतिद्वंद्वी पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियों और तीखे हास्य की बौछार करते हैं, जो पूरी तरह से तीखे और व्यंग्यात्मक हास्य से भरपूर होती है। दिलचस्प बात यह है कि इस अभिनय-शैली का प्रयोग बहुत अलग-अलग तरीक़ों से किया गया है। हालाँकि पाटेकर को अक्सर मर्दाना क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दक्षिणपंथी राजनीति (महाराष्ट्रवादी पार्टी, शिवसेना और व्यापक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर हिंदू दक्षिणपंथी राजनीति) से जोड़ा जाता है, लेकिन अभिनेता का पर्दे पर व्यक्तित्व इतना सीधा-सादा नहीं है।”
थोड़ा पीछे चलते हैं। राज कपूर का आम आदमी आज़ादी के बाद नेहरू के आदर्शवाद में जीता, व्यवस्था और शहर की विसंगतियों में फँसा हुआ मासूम आदमी है। ‘श्री 420’ जैसी फ़िल्मों में वह भ्रष्टाचार, लालच और सामाजिक असमानता को देखता है; लेकिन उसके भीतर दुनिया को बेहतर बनाने की उम्मीद अभी बची हुई है। उसका हथियार हास्य है, और वह व्यवस्था पर हँसते हुए भी वह मनुष्य पर भरोसा बनाए रखता है। इसके बाद अमिताभ का विजय आता है, जिसके भीतर मासूमियत की जगह ग़ुस्सा है। 1970 के दशक में राजनीतिक मोहभंग और सामाजिक असंतोष के बीच अमिताभ का ‘एंग्री यंग मैन’ अपने दौर के एक बड़े सामाजिक विद्रोह के प्रतीक के रूप में पहचाना गया।
ज्यादातर फ़िल्म इतिहासकारों और विश्लेषकों ने ‘दीवार’ को इसी राजनीतिक निराशा और 1970 के दशक के सामाजिक संकट के संदर्भ में समझा है। ‘दीवार’ का विजय भले अपराधी बन जाता है, लेकिन उसके भीतर न्याय की इच्छा बनी रहती है। सलीम-जावेद ने हमेशा उन कहानियों को इस तरह लिखा कि नायक के भीतर एक द्वंद्व बना रहे कि वह इस सिस्टम में अपनों से ही लड़ रहा है। जैसे ‘त्रिशूल’ का नायक जिस पूँजीवादी को उसी की भाषा में चुनौती देना चाहता है, वह उसका अपना पिता है। जिसके प्रति नफ़रत और कहीं गहरे अवचेतन में अपनेपन की मिली-जुली भावनाएँ हैं।
आम आदमी शायद अपने बॉस को जवाब नहीं दे सकता था, भ्रष्ट अधिकारी से नहीं लड़ सकता था, किसी बड़े व्यापारी या अपराधी से नहीं भिड़ सकता था; लेकिन विजय यह सब कर सकता था। दर्शक अपनी असमर्थता का समाधान नायक की शक्ति में देखता है। अमिताभ का ग़ुस्सा नैतिक था; व्यवस्था ग़लत थी, लेकिन न्याय की अवधारणा पर उनका विश्वास अभी कायम था। कालांतर में यही ‘एंग्री यंग मैन’ आम आदमी की लड़ाई से ऊपर उठता गया और ‘इंक़लाब’ जैसी फ़िल्मों में सीधे सत्ता का हिस्सा बनकर आम आदमी को न्याय दिलाने में जुट गया।
नाना पाटेकर के आने तक नायक का मनोविज्ञान बदल चुका था। ज़्यादातर मामलों में उनके पिता के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती, बल्कि वह माँ जो सलीम-जावेद की कहानियों में सामाजिक और नैतिक नियंत्रण की धुरी हुआ करती थी, नाना के यहाँ उससे जुड़ी भी कड़वी स्मृतियाँ ही बची हैं। नाना के किरदार कई बार अच्छे आदमी नहीं हैं। वे हिंसक हैं, कठोर हैं, अपराधी हैं, नैतिक रूप से समझौता किए हुए हैं और कई बार ख़ुद भी व्यवस्था का हिस्सा हैं। लेकिन उनमें एक चीज़ लगातार बची रहती है—सिस्टम के प्रति गहरा आलोचनात्मक भाव।
नायक के सामने सवाल यह नहीं है कि व्यवस्था अन्याय क्यों कर रही है, बल्कि यह कि व्यवस्था किसके लिए काम कर रही है? नाना सिस्टम की नैतिकता को ही संदिग्ध बना देते हैं। उनकी अभिनय-शैली में तनाव से भरा शरीर, अचानक फूटता संवाद, व्यंग्य, विडंबना से भरी हँसी और कड़वा हास्यबोध—इस पूरे मोहभंग को अभिव्यक्त करता है। रवि वासुदेवन ने अपने एक आलेख में नाना की शैली को ‘आयरॉनिक’, ‘इरेवरेंट विट’ (हास्य जो स्थापित सत्ता या परंपरा को बहुत ज़्यादा महत्त्व नहीं देता) और ‘गैलोज़ ह्यूमर’ (फाँसी के तख़्ते पर रचा गया हास्य यानी बहुत गंभीर, भयावह, दुखद या निराशाजनक परिस्थिति में भी मज़ाक़) से जोड़ा है।
‘क्रांतिवीर’ का वह लंबा मोनोलॉग याद करें तो यह गैलोज़ ह्यूमर आसानी से समझ में आ जाएगा :
“आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने? आप मुझे लटका देंगे, ज़ुबान ऐसी बाहर आएगी... आँखें बाहर आएँगी... थोड़ी देर लटकता रहूँगा, फिर ये मेरा भाई मुझे नीचे उतार देगा, फिर आप चर्चा करते घर चले जाओगे, खाना खाओगे सो जाओगे। नहीं तुम्हारी ज़िंदगी में कोई फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं... अँधेरे में रहने की आदत पड़ी है तुमको। ग़ुलामी करने की आदत पड़ी है। पहले राजा-महाराजाओं की ग़ुलामी की, फिर अँग्रेज़ों की, अब चंद ग़द्दार नेताओं की और ग़ुंडों की... धर्म के नाम पर ये तुम्हें बहकाते हैं... तुम एक दूसरे के गले काट रहे हो... काटो... काटो... ऊपर वाला भी ऊपर से देखता होगा तो उसे शर्म आती होगी... सोचता होगा मैंने सबसे ख़ूबसूरत चीज़ बनाई थी इंसान... नीचे देखा तो सब कीड़े बन गए कीड़े... रेंगते रहो, रेंगते रहो... सड़ते रहो और मरो... आए और गए... खेल ख़त्म।”
‘क्रांतिवीर’ का यह नायक अमिताभ के विजय से अलग है। नायक विजय कहा करता था कि मेरे साथ अन्याय हुआ है, जबकि प्रताप कहता है, “हमारे साथ अन्याय हो रहा है।” यह पॉपुलर कल्चर में एंटी हीरो की ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा है। यदि आप ग़ौर करें तो हमेशा नाना पाटेकर का निजी आक्रोश सार्वजनिक ग़ुस्से में बदल जाता है। वह ग़ुस्सा गंभीर और वीरतापूर्ण नहीं होता, उसमें हास्य, असुरक्षा, टूटन और मेलोड्रामैटिक भावुकता भी है। वह आदर्शवादी नहीं है, लेकिन पाखंडी भी नहीं है। वह सामने वाले को उसकी ही भाषा, उसके ही नैतिक दावों और उसके ही पाखंड के सामने खड़ा कर देते हैं।
आम नायकों से अलग यशवंत जो एक पुलिस वाला है; सट्टा लगाने वालों के भिड़ता नहीं है, मारपीट नहीं करता। उन्हें शब्दों से उधेड़ता है :
“इनका ख़ून चूसने की आदत पड़ी है ना तेरे को... और ये भी बेशर्म साले पूरे दिन की कमाई तेरे कटोरे में डालते हैं... नक़द में हारते हैं... उधारी में बेवड़ा पीते हैं... किसी के सामने बस न चले तो बीवी को मारते हैं... बच्चे भीख माँग रहे है रस्ते पे... साला तुमसे तो वो क़साई अच्छा बकरे को हलाल करता है और खुलेआम बेचता है। ये इस उम्मीद पे आज जीतेंगे, कल जीतेंगे, परसों जीतेंगे... रोज़ हारते हैं और तू हमेशा जीतता है। एकतरफ़ा जुआ यह ठीक नहीं। ये देख जुआ इसे बोलते हैं असली रिवॉल्वर। पाँच गोलियाँ अंदर एक गोली बाहर। ये देख... ये देख... चल लगा। चला... सब तेरा। जीतेगा बचेगा सब तेरा। नंगा हो के जाऊँगा। कपड़े उतार कर जाऊँगा...”
यह थी नाना पाटेकर की ख़ूबी। राज कपूर के पास हास्य, करुणा और मासूमियत थी अमिताभ के पास ग़ुस्सा, शक्ति और न्याय की आकांक्षा; नाना के पास व्यंग्य, आक्रोश, असुरक्षा और मोहभंग था। उन्होंने व्यवस्था के प्रति दबे ग़ुस्से को एक मानवीय, विडंबनापूर्ण और एब्सर्डिटी से भरी आवाज़ में बदल दिया। लोग आज भी उससे कनेक्ट होते हैं।
मोहभंग, पाखंड, सत्ता से चिढ़, असहायता और उस असहायता पर एक ‘सिनिकल हँसी’ की ज़रूरत शायद हर दौर में है।
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