रात पर गीत

उजाले और अँधेरे के प्रतीक

रूप में दिन और रात आदिम समय से ही मानव जिज्ञासा के केंद्र रहे हैं। कविताओं में रात की अभिव्यक्ति भय, आशंका और उदासी के साथ ही उम्मीद, विश्राम और शांति के रूप में हुई है। इस चयन में उन कविताओं को शामिल किया गया है; जिनमें रात के रूपक, प्रतीक और बिंब से जीवन-प्रसंगों की अभिव्यक्ति संभव हुई है।

साथी, सो न, कर कुछ बात

हरिवंशराय बच्चन

झिलमिलाती रात

महादेवी वर्मा

आँखों से अलख जगाने को

जयशंकर प्रसाद

जुगनू

हरिवंशराय बच्चन

दिया जलता रहा

गोपालदास नीरज

सो न सका

रमानाथ अवस्थी

दीपक जलता रहा रात भर

गोपाल सिंह नेपाली

अंधकार की खोल

देवेंद्र कुमार बंगाली

मेरे पथ में रात अँधेरी

गोपाल सिंह नेपाली

बीती विभावरी जाग री

जयशंकर प्रसाद

नौ लाख सितारों ने लूटा

गोपाल सिंह नेपाली

बाग़ों में टहलता अँधेरा

देवेंद्र कुमार बंगाली

टुकड़े-टुकड़े रात कटी है

देवेंद्र कुमार बंगाली

आज पहली बात

भारत भूषण

अँधेरे की लौ

देवेंद्र कुमार बंगाली

रात गए आँखों से

देवेंद्र कुमार बंगाली

(प्रिय) यामिनी जागी

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

कौन तम के पार

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला