राजस्थान के रचनाकार

कुल: 100

भक्तिकाल के निर्गुण संत। दादूपंथ के संस्थापक। ग़रीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना के गुरु।

मीरा

1498 - 1546

भक्तिकाव्य में कृष्ण भक्ति शाखा का चर्चित नाम। राज परिवार में जन्म लेकर भी रजवाड़ों में किए जा रहे स्त्री-शोषण के विरुद्ध खड़ी कवयित्री।

रीतिकाल के अंतिम प्रसिद्ध कवि। भाव-मूर्ति-विधायिनी कल्पना और लाक्षणिकता में बेजोड़। भावों की कल्पना और भाषा की अनेकरूपता में सिद्धहस्त कवि।

सुपरिचित कवयित्री। कविताओं में उपस्थित संगीतात्मक वैभव के लिए उल्लेखनीय।

सुपरिचित कवि-लेखक और अनुवादक। ‘बहनें’ शीर्षक कविता के लिए चर्चित।

रीतिबद्ध कवि। नायिकाभेद के अंतर्गत प्रेमक्रीड़ा की सुंदर कल्पनाओं के लिए प्रसिद्ध।

'राधावल्लभ संप्रदाय' से संबंधित। भाव-वैचित्र्य और काव्य-प्रौढ़ता के लिए विख्यात।

भक्तिकालीन निर्गुण संत। स्वामी रामानंद के शिष्य। आजीवन खेती-बाड़ी करते हुए भक्ति-पथ पर गतिशील कृषक-कवि।

सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित।

विश्नोई संप्रदाय के संस्थापक। पर्यावरणविद् और वैष्णव भक्ति के पोषक कवि।

जसनाथ

1482 - 1506

गोरखनाथ के शिष्य और जसनाथी संप्रदाय के संस्थापक। वाणियों में सगुण-निर्गुण में अभेद के पक्षधर।

मारवाड़ के राजा और रीतिकालीन कवि आचार्य। अलंकार निरूपण ग्रंथ 'भाषा भूषण' से हिंदी-संसार में प्रतिष्ठित।

सुपरिचित कवि और गद्यकार। ‘एक शराबी की सूक्तियाँ’ के लिए लोकप्रिय।

साहित्य की प्रेमाख्यान परंपरा के कवि। लोक कंठ में व्याप्त 'ढोला-मारू रा दूहा' प्रसिद्धि का आधार ग्रंथ।

इस सदी के दूसरे दशक में ठीक से पहचाने गए हिंदी के बेहद महत्त्वपूर्ण कवि-लेखक। बच्चों के लिए भी लेखन।

रज्जब

1567 - 1690

भक्तिकाल के संत कवि। विवाह के दिन संसार से विरक्त हो दादूदयाल से दीक्षा ली। राम-रहीम और केशव-करीम की एकता के गायक।

समादृत कवि। प्रगतिशील लेखक संघ से संबद्ध।

चरनदास की शिष्या। प्रगाढ़ गुरुभक्ति, संसार से पूर्ण वैराग्य, नाम जप और सगुण-निर्गुण ब्रह्म में अभेद भाव-पदों की मुख्य विषय-वस्तु।

श्री रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक। वाणी में प्रखर तेज। महती साधना, अनुभूति की स्वच्छता और भावों की सहज गरिमा के संत कवि।

रीतिकाल के आचार्य कवियों में से एक। भरतपुर नरेश प्रतापसिंह के आश्रित। भावुक, सहृदय और विषय को स्पष्ट करने में कुशल कवि।

नई पीढ़ी के कवि। गद्य-लेखन और फ़ोटोग्राफ़ी में भी सक्रिय।

वृंद

1643 - 1735

रीतिकालीन नीतिकवि। सूक्तिकार के रूप में स्मरणीय।

नई पीढ़ी के कवि। काव्य-शिल्प के लिए उल्लेखनीय।

जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह ने 'ब्रजनिधि' उपनाम से काव्य-संसार में ख्याति प्राप्त की. काव्य में ब्रजभाषा, राजस्थानी और फ़ारसी का प्रयोग।

'चरणदासी संप्रदाय' के प्रवर्तक। योगसाधक संत। जीवन-लक्ष्य साधने हेतु कृष्ण-भक्ति के साथ अष्टांग योग पर बल देने के लिए स्मरणीय।

'चरनदासी संप्रदाय' से संबंधित संत चरणदास की शिष्या। कविता में सर्वस्व समर्पण और वैराग्य को महत्त्व देने के लिए स्मरणीय।

सुपरिचित कवयित्री और गद्यकार।

हिंदूवादी कवि। महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा ‘विरुद छहतरी’ के लिए स्मरणीय।

उत्तर भारत में 'निरंजनी संप्रदाय' के संस्थापक। वाणियों में हठयोग और रहस्यवाद की छाप। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण।

सूफ़ी संत, नीतिकार और रासो-काव्य के रचयिता। ब्रजभाषा पर अधिकार। वस्तु-वर्णन के लिए दोहा और सोरठा छंद का चुनाव।

नई पीढ़ी से संबद्ध लेखक, गीतकार और संगीतकार।

सुपरिचित आलोचक। अनुवादक और संपादक के रूप भी सक्रिय। समय-समय पर काव्य-लेखन भी। जनवादी लेखक संघ से संबद्ध।

रासो काव्य परंपरा के अंतिम कवियों में से एक। प्रबंध काव्य 'हम्मीर रासो' से प्रसिद्ध।

रीतिकाल के नीतिकवि। हिंदी के पहले संबोधन काव्य के रचयिता। 'राजिया' को संबोधित सोरठों के लिए समादृत।

रीतिकालीन कवि। वीरकाव्य के रचयिता।

रीतिकालीन कवि। साहित्य शास्त्र के प्रौढ़ निरूपण के लिए विख्यात।

इस सदी में सामने आईं हिंदी की प्रमुख कथाकार। समय-समय पर काव्य-लेखन भी।

किशनगढ़ (राजस्थान) नरेश। प्रेम, भक्ति और वैराग्य की साथ नखशिख की सरस रचनाओं के लिए ख्यात।

सुप्रसिद्ध हिंदी-राजस्थानी कवि-लेखक और संपादक। ‘आशा बलवती है राजन्’ सहित कविता और गद्य की कई किताबें प्रकाशित।

नई पीढ़ी के कवि।

सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक। कहन की नई शैली के लिए उल्लेखनीय।

नई पीढ़ी के कवि।

रीतिकाल के सरस-सहृदय आचार्य कवि। कविता की विषयवस्तु भक्ति और रीति। रीतिग्रंथ परंपरा में काव्य-दोषों के वर्णन के लिए समादृत नाम।

वास्तविक नाम ‘बनी-ठनी’। कविता में शृंगार का पुट। नायिका-भेद के लिए स्मरणीय।

‘मिले बस इतना ही’ शीर्षक कविता-संग्रह के कवि। कम आयु में दिवंगत।

भक्तिकाल के निर्गुण संतकवि। वाणियों में प्रेम, विरह, और ब्रह्म की साधना के गहरे अनुभव। जनश्रुतियों में संत दादू के अवतार।

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