जयपुर के रचनाकार

कुल: 27

भक्तिकाल के निर्गुण संत। दादूपंथ के संस्थापक। ग़रीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना के गुरु।

रीतिकाल के अंतिम प्रसिद्ध कवि। भाव-मूर्ति-विधायिनी कल्पना और लाक्षणिकता में बेजोड़। भावों की कल्पना और भाषा की अनेकरूपता में सिद्धहस्त कवि।

सुपरिचित कवयित्री। कविताओं में उपस्थित संगीतात्मक वैभव के लिए उल्लेखनीय।

सुपरिचित कवि और गद्यकार। ‘एक शराबी की सूक्तियाँ’ के लिए लोकप्रिय।

रज्जब

1567 - 1690

भक्तिकाल के संत कवि। विवाह के दिन संसार से विरक्त हो दादूदयाल से दीक्षा ली। राम-रहीम और केशव-करीम की एकता के गायक।

समादृत कवि। प्रगतिशील लेखक संघ से संबद्ध।

श्री रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक। वाणी में प्रखर तेज। महती साधना, अनुभूति की स्वच्छता और भावों की सहज गरिमा के संत कवि।

नई पीढ़ी के कवि। काव्य-शिल्प के लिए उल्लेखनीय।

जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह ने 'ब्रजनिधि' उपनाम से काव्य-संसार में ख्याति प्राप्त की. काव्य में ब्रजभाषा, राजस्थानी और फ़ारसी का प्रयोग।

सुपरिचित कवयित्री और गद्यकार।

नई पीढ़ी से संबद्ध लेखक, गीतकार और संगीतकार।

रीतिकालीन कवि। वीरकाव्य के रचयिता।

रीतिकालीन कवि। साहित्य शास्त्र के प्रौढ़ निरूपण के लिए विख्यात।

रीतिकाल के सरस-सहृदय आचार्य कवि। कविता की विषयवस्तु भक्ति और रीति। रीतिग्रंथ परंपरा में काव्य-दोषों के वर्णन के लिए समादृत नाम।

‘मिले बस इतना ही’ शीर्षक कविता-संग्रह के कवि। कम आयु में दिवंगत।

‘निज कवि धातु बचाई मैंने’ शीर्षक कविता-संग्रह के कवि। लोक-संवेदना के लिए उल्लेखनीय।

भक्तिकालीन संत। कृष्णदास पयहारी के शिष्य और नाभादास के गुरु। रसिक संप्रदाय के संस्थापक। शृंगार और दास्यभाव की रचनाओं के लिए स्मरणीय।

समादृत कवि-आलोचक। लोक-संवेदना और सरोकारों के लिए उल्लेखनीय।

'भारतेंदु मंडल' के कवियों में से एक। कविता की भाषा और शिल्प रीतिकालीन। 'काशी कवितावर्धिनी सभा’ द्वारा 'सुकवि' की उपाधि से विभूषित।

रीतिकाल के नीतिकवि।

सुपरिचित कवि। 'स्मृतियों में बसा समय' शीर्षक से एक कविता-संग्रह प्रकाशित।

आठवें दशक के कवि। प्रगतिशील लेखक संघ से संबद्ध।

सुपरिचित हिंदी कवि, कला-आलोचक, शौक़िया छायाकार, संपादक और चित्रकार।

सुपरिचित कवि। गद्य-लेखन में भी सक्रिय।

नई पीढ़ी की कवयित्री।

सुपरिचित कवि। बाल-साहित्य-लेखन में भी सक्रिय।

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