अनफ़्रेम्ड : हिंदी साहित्य और सिनेमा की इन गुमनाम कड़ियों को जानते हैं आप?
दिनेश श्रीनेत
22 अक्तूबर 2026
सत्तर के दशक के आरंभिक वर्ष हिंदी साहित्य और सिनेमा के बीच संबंधों के लिहाज़ से सबसे उल्लेखनीय साल माने जा सकते हैं। भारतीय सिनेमा में नए प्रयोग हो रहे थे। प्रयोग करने वाले ज़्यादातर निर्देशक पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट से निकले थे। उन्होंने दुनिया भर का श्रेष्ठ, प्रयोगधर्मी और सरोकारों वाला सिनेमा देखा था और अपनी भाषा में कुछ वैसा ही करना चाहते थे। इस तरह के प्रयोगों के लिए उन दिनों समकालीन हिंदी साहित्य में एक उर्वर भूमि तैयार हो चुकी थी। एक तरफ़ 50 और 60 का दशक मोहभंग का समय था, वहीं दूसरी तरफ एक शिक्षित मध्यवर्ग का उदय हो चुका था, जिसके जीवन की अपनी जटिलताएँ थीं। शहरीकरण, नौकरी और नए जीवन-मूल्यों के कारण परिवारों और रिश्तों की पुरानी संरचनाएँ बदल रही थीं। व्यक्ति परिवार और समाज के बीच अकेला पड़ने लगा था। उसकी कुंठाएँ, समझौते, असफलताएँ और रोज़मर्रा का तनाव इस नए लेखन का विषय बन रहे थे। इससे पहले हिंदी की रचनाओं में कोई स्पष्ट सामाजिक संदेश या नैतिक निष्कर्ष होता था; मगर नई कहानी में जटिलता, अनिश्चितता और अंतर्विरोध अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए। पात्र न तो पूरी तरह अच्छे होते थे, न बुरे, वे परिस्थितियों में उलझे सामान्य मनुष्य थे।
यही वजह है कि 1970 से लेकर 1975-76 तक एक के बाद एक कई फ़िल्में आईं, जिन्होंने नई कहानी को अपना आधार बनाया या फिर इससे पहले की उन रचनाओं को फ़िल्मांकन के लिए चुना गया, जिन्होंने बीते दौर के आदर्शवाद को या तो पूरी तरह से उतार फेंका था या उन पर बहस छेड़ दी थी। मोहन राकेश की कहानी पर मणि कौल की ‘उसकी रोटी’ (1969), निर्मल वर्मा की कहानी पर कुमार शाहनी की ‘माया दर्पण’ (1972), राजेंद्र यादव की कहानी पर बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ (1969), मन्नू भंडारी की कहानी पर बासु की ‘रजनीगंधा’ (1974) और कमलेश्वर की रचनाओं पर बनी गुलज़ार की फ़िल्में ‘आँधी’ (1975) और ‘मौसम’ (1975) ...इन सबकी अक्सर चर्चा होती है, मगर इसी दौरान हिंदी की साहित्यिक रचनाओं पर कुछ ऐसी फ़िल्में आईं, जिनका कोई लेखा-जोखा नहीं मिलता। इन सभी फ़िल्मों के निर्देशक भी अचर्चित रह गए। ज़्यादातर एक या दो फ़िल्मों के बाद गुमनामी में खो गए। ऐसा क्यों हुआ होगा, इसकी एक बड़ी वजह यह समझ में आती है कि इन निर्देशकों ने बासु चटर्जी या गुलज़ार के मुक़ाबले अपने समय से आगे की बोल्ड कहानियों और थीम पर काम किया। जिसके लिए हिंदी सिनेमा में कोई स्वीकार्यता नहीं थी, न दर्शकों में न ही फ़िल्म-प्रेमियों और सिनेमा के जानकारों में। न ही इन निर्देशकों की मणि कौल और कुमार शाहनी की तरह फ़िल्म महोत्सवों तक पहुँच थी। ये अपने दौर के साहसी प्रयोग थे, जो शायद अपनी विषय-वस्तु और निर्माण तथा वितरण से जुड़ी असंगतियों की वजह से असफल रहे।
जिस दौर में इस तरह की फ़िल्में बन रही थीं, कई चर्चित निर्देशक हिंदी की क्लासिक कहानियों में सिनेमा की संभावनाएँ तलाश रहे थे। उनकी निगाह उन कहानियों पर गई; जो लिखी तो पहले गई थीं, मगर वे अपनी संवेदना में आधुनिक दौर की रचनात्मकता और विमर्श के क़रीब थीं। इस क्रम में मृणाल सेन की निगाह पड़ी प्रेमचंद की कहानी ‘कफ़न’ पर—जिस पर आधारित उनकी फ़िल्म ‘ओका ऊरी कथा’ (1977) आई। इसी दौरान एक और निर्देशक रमेश गुप्ता ने जैनेंद्र कुमार के उपन्यास ‘त्यागपत्र’ पर फ़िल्म बनाने का फ़ैसला किया। ‘ओका ऊरी कथा’ तो आज भी यूट्यूब पर देखी जा सकती है, मगर ‘त्यागपत्र’ का अब कोई पता नहीं है। यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी और मुझे याद है बचपन में रेडियो पर इसके कमर्शियल आया करते थे। इसका एक गीत भी उन दिनों अक्सर सुनने को मिलता था, “ये सिंदूरी शाम / छेड़ती है मन के तार / जी करता है उड़कर पहुँचूँ / दूर गगन के पार...” इस गीत को गाया था दिलराज कौर ने और संगीत था अजय स्वामी का। अब इसे यूट्यूब पर सुना जा सकता है।
फ़िल्म के पोस्टर लिखा मिलता है, “अ वुमन्स रिवोल्ट, अ मैन्स डिलेमा ऑफ कॉन्शियंस”। इंटरनेट पर इस फ़िल्म का नाम और रिलीज-डेट तो मौजूद है, मगर इस फ़िल्म के निर्देशक तक का नाम नहीं है। फ़िल्म के एक पोस्टर से पता लगता है कि इसके निर्देशक रमेश गुप्ता थे। उल्लेखनीय है कि रमेश गुप्ता ने पुणे के फ़िल्म संस्थान में निर्देशन का प्रशिक्षण लिया था। इससे पहले वह बासु चटर्जी की फ़िल्मों ‘सारा आकाश’ (1969) और ‘उस पार’ (1974) में मुख्य सहायक के रूप में काम कर चुके थे। इस फ़िल्म को नेशनल फ़िल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन से आर्थिक सहायता भी मिली थी।
‘त्यागपत्र’(1978) में मृणाल के जटिल चरित्र को सिनेमा के पर्दे पर उतारना आसान न था; इसके लिए विद्या सिन्हा का चयन किया गया, जो उस समय तक ‘मिडल ऑफ़ द रोड’ सिनेमा का प्रमुख चेहरा बन चुकी थीं। विद्या सिन्हा सादगी में रचे-बसे अपने रूप और किसी आइसबर्ग की तरह अपने व्यक्तित्व के कारण हमेशा अलग दिखती थीं। हमेशा ऐसा लगता था कि जितनी वह सामने दिख रही हैं, उससे कहीं कहीं ज़्यादा अभी सामने आना बाक़ी है। ऐसी विद्या सिन्हा को ‘त्यागपत्र’ की नायिका मृणाल के रूप में देखने का अपना एक आकर्षण रहा होगा। क्योंकि ‘मृणाल हिंदी साहित्य की पहली आधुनिक स्त्री है जो नैतिकता की परंपरागत मान्यता को सिरे से ख़ारिज करती है।’
जैनेंद्र कुमार ने ‘त्यागपत्र’ की मृणाल के रूप में एक विद्रोही स्त्री चरित्र प्रस्तुत किया था। कथा-नायक उस चरित्र से सीधे संबद्ध नहीं है, लेकिन वह असंबद्ध भी नहीं है। मृणाल नायक की बुआ है और दोनों के बीच एक अबोला स्नेह व प्रेमासक्त संबंध है। मृणाल की यात्रा ‘ख़ुद से, आकाश से, बादल से, तारों से, हवा से प्रेम करती’ एक युवती के रूप में शुरू होता है। प्रेम अपनी पूर्णता की तरफ नहीं पहुँचता है। उसे एक वैवाहिक जीवन में धकेल दिया जाता है, जो पूरी तरह से असफल साबित होता है। मृणाल विद्रोह तो नहीं करती, मगर वह एडजस्ट भी नहीं करती। वह एक विवाहेतर संबंध की तरफ़ बढ़ती है। इस रिश्ते में भी उसे छल हाथ लगता है। अंत में शराबी, जुआरी, भिखारियों, वेश्याओं जैसे समाज के हाशिये पर पहुँचे लोगों के बीच उसके जीवन का अंत होता है। हमें यह याद रखना होगा कि ‘त्यागपत्र’ उपन्यास 1937 में प्रकाशित हुआ था। उसकी नायिका अपने तन की ज़रूरतों के बारे में उपन्यास में अकुंठ भाव से कह रही है, ‘तन दे सकूँगी शायद वह अनिवार्य हो।’
वापस कमलेश्वर की लिखी तीनों लापता फ़िल्मों की तरफ चलते हैं। लगभग आधी सदी तक गुमनामी के अँधेरे में खोई ‘बदनाम बस्ती’ के दुर्लभ प्रिंट मिलने के बाद एक अच्छी बात यह हुई कि यह दोबारा से सिनेमा-प्रेमियों और संग्रहकर्ताओं के बीच चर्चा में आ गई। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि जिस दौर में यानी 1971 में जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी तो सारी दुनिया में क्वियर आंदोलन अपने उभार पर था। फ़िल्म-मेकर और क्यूरेटर शाइ हेरेडिया कहते हैं, “मैंने इसके बारे में कभी नहीं सुना था। इंडियन सिनेमा के इनसाइक्लोपीडिया में भी इसका ज़िक्र नहीं था। यह चीज़ों को मिटाए जाने और इतिहास कैसे बनता है, इसके बारे में बहुत कुछ बताता है।”
‘हंस’ में धारावाहिक रूप से ‘बदनाम बस्ती’ के नाम से ही प्रकाशित यह उपन्यास सरनाम (नितिन सेठी) के बारे में है, जो उत्तर प्रदेश में ट्रक ड्राइवर के रूप में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। अतीत में वह एक डाकू रहा है। उसके जीवन में बाँसुरी (नंदिता ठाकुर) नाम की एक युवती है, जिसे उसने अपने एक साथी लुटेरे से बचाया था, लेकिन वह एक युवा पुरुष घरेलू पुरुष शिवराज (अमर कक्कड़) की ओर आकर्षित हो जाता है। इस तरह एक अस्थायी प्रेम-त्रिकोण उभरता है।
दो साल पहले ‘द गार्डियन’ में इस फ़िल्म पर प्रकाशित अपने लेख में सिनेमा और थिएटर समीक्षक रियान गिल्बे लिखते हैं, “सिर्फ़ किरदार ही नहीं हैं जो परंपरा को चुनौती देते हैं। जो दर्शक फ़्रेंच न्यू वेव, निकोलस रोग या इंडिया के फ़िल्म्स डिवीज़न के एक्सपेरिमेंटल काम को जानते हैं, वे इस बिखरे हुए स्ट्रक्चर से परेशान नहीं होंगे, जो समय और यादों में आगे-पीछे होता रहता है। शायद दर्शक इस अनोखे विज़ुअल टेक्सचर के लिए तैयार नहीं थे, जिसमें घुलने के अंदर घुलना, क्रैश-ज़ूम से फ़्रीज़-फ़्रेम में जाना और स्प्लिट-स्क्रीन सीक्वेंस शामिल हैं; जिसमें एक्शन का एक हिस्सा रुक जाता है, जबकि दूसरा चलता रहता है।”
बिना कोई निशान छोड़े मिट गई गिरीश रंजन की ‘डाक बंगला’ (1974) भी ऐसी ही एक दुर्लभ फ़िल्म है। सत्तर के दशक में ‘डाक बंगला’ जैसी फ़िल्में साहित्य और सिनेमा के बीच एक अलग रास्ता तलाश रही थीं। यह कमलेश्वर के कथा-संसार को दृश्य माध्यम में समझने का एक ऐसा अवसर देती है, जिसके बारे में पर्याप्त चर्चा कभी हो नहीं पाई। फ़िल्म से जुड़ी प्रचार सामग्री और दूसरे ब्योरे तो इंटरनेट आर्काइव में मौजूद हैं, जिन्हें तुलसी रिसर्च सेंटर फ़ॉर इंडियन स्टडीज की वेबसाइट पर देखा जा सकता है, मगर इसकी ओरिजिनल कॉपी और निर्माण से जुड़े अनेक विवरण अब भी खोजे जाने बाक़ी हैं।
डाक बंगला ठहरने की जगह है, घर नहीं। लोग वहाँ आते हैं, कुछ समय बिताते हैं और फिर चले जाते हैं। फ़िल्म में इस रूपक के साथ एक ऐसी स्त्री का जीवन सामने आता है, जिसके संबंधों में स्थायित्व और सुरक्षा का अभाव है। पुरुष उसके जीवन में आते-जाते हैं, लेकिन उसकी अपनी भावनात्मक जरूरतें, अकेलापन और पहचान के सवाल बने रहते हैं। यहाँ स्त्री के जीवन को अक्सर पुरुषों की इच्छाओं, आर्थिक विवशताओं और सामाजिक नैतिकता के आधार पर परिभाषित किया जाता है। कमलेश्वर के कथा-संसार की विशेषता है कि वे निजी संबंधों को सामाजिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखते। किसी व्यक्ति के जीवन में जो कुछ घट रहा है, वह केवल उसका निजी चुनाव नहीं होता; उसके पीछे सामाजिक संरचना, असमानता और प्रचलित रूढ़ियाँ भी काम कर रही होती हैं। इस लिहाज़ से ‘डाक बंगला’ को आज देखने का अर्थ उस समय के स्त्री-विमर्श, संबंधों की अस्थिरता और सामाजिक नैतिकता के प्रश्नों को फिर से पढ़ना भी है।
नव-फ्रायडवादी मनोविज्ञानी कार्ल गुस्ताफ़ युंग ने एक मनोग्रंथि को इलेक्ट्रा कॉम्पलेक्स का नाम दिया था, जिसमें लड़की के भीतर अनजाने ही अपने पिता से अत्यधिक लगाव और प्रेम पैदा हो जाता है। उसे फिर अपने जीवन में आने वाला कोई भी पुरुष पूर्ण नहीं दिखता। वह किसी पुरुष के साथ सहज नहीं हो पाती। इसे किसी कथा-कहानी या फ़िल्म की विषय-वस्तु बनाना आज भी मुश्किल है, तो क़रीब 50 साल पहले कितना मुश्किल रहा होगा। शिवेंद्र सिन्हा ने 1971 में एक अद्भुत फ़िल्म बनाई थी। फ़िल्म का शीर्षक था—‘फिर भी’। यह समांतर सिनेमा की बस शुरुआत ही थी। हर दौर के लिहाज़ से मुश्किल इस विषय पर बनी शिवेंद्र सिन्हा की फ़िल्म ‘फिर भी’ की नायिका का एक मोनोलॉग है, “पापा, क्यों सब लोग मिलकर, मुझे तुमसे अलग करना चाहते हैं? मुझे और पुरुषों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। अगर तुम मेरे साथ नहीं रह सकते तो मुझे यहाँ से इन सब लोगों से दूर कहीं और ले चलो। अब तो मम्मी अकेली नहीं रही। अब तो बस मैं ही अकेली रह गई हूँ। मुझे इस तरह अकेली मत छोड़ दो पापा!”
यह फ़िल्म सुमी यानी सुमन (बैंबी) की कहानी कहती है, जो अपने पिता की स्मृतियों से अपने जीवन के ख़ालीपन को भर रही है। वह अपनी माँ उर्मिला (उर्मिला भट्ट) के साथ मुंबई महानगर में रहती है। किशोरवय में सुमन के पिता अमिताभ (देवेन श्रीवास्तव) की एक दुर्घटना में मौत हो जाती है। अब वह एक एक टेलीफ़ोन एक्सचेंज में नौकरी करती है और बचे वक़्त में अपनी माँ को ख़ुश रखने का प्रयास करती है। पिता उसकी यादों में बहुत गहराई से बसे हैं। ख़ाली वक़्त में वह उनकी तस्वीर देखती है, उनका ओवरकोट और हैट लगाकर आईने में ख़ुद को देखती है, उनकी डायरी पढ़ती है और अकेले में पिता से बातें भी करती है।
निर्देशक शिवेंद्र सिन्हा ने इस फ़िल्म में मन के भीतर चल रही उलझनों को बड़ी ख़ूबसूरती से फ्रीज़ शॉट, निगेटिव और मोंताज़ के ज़रिए स्क्रीन पर दिखाया है। ख़ास तौर पर बैकग्राउंड में आवाज़ों का बहुत ही रचनात्मक इस्तेमाल किया गया है। अविजीत घोष अपनी किताब ‘40 रीटेक्स, बॉलीवुड क्लासिक्स यू मे हैव मिस्ड’ में जब भारतीय सिनेमा की कुछ अचर्चित फ़िल्मों के बारे में लिखते हैं तो इस फ़िल्म को शामिल न कर पाने पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं। अपनी भूमिका में वह कहते हैं, “दुर्भाग्यवश मैं इस फ़िल्म का प्रिंट नहीं पा सका। हालाँकि मुझे यक़ीन है कि यह कहीं पर अवश्य मौजूद होगा। इस फ़िल्म से जुड़े लोगों से संपर्क करने के मेरे प्रयास असफल रहे। शिवेंद्र सिन्हा कुछ साल पहले चल बसे। अभिनेत्री उर्मिला भट्ट की कुछ साल पहले हत्या हो गई। मुझे अभिनेता प्रताप शर्मा से मिलने की उम्मीद थी। दुर्भाग्य से उन्होंने 2011 में अंतिम साँसें लीं। उनकी बेटी से ई-मेल के ज़रिये संपर्क करना चाहा मगर बात बनी नहीं।”
दुर्भाग्य यह है कि इन तमाम फ़िल्मों की मूल प्रति, समकालीन समीक्षाओं और निर्माण संबंधी दस्तावेज़ों की सीमित उपलब्धता के कारण इनके सिनेमाई शिल्प और प्रभाव पर कोई निर्णायक बात कहना कठिन है। इसके बावजूद ऐसी फ़िल्मों की खोज और चर्चा ज़रूरी है, क्योंकि इनके बिना हिंदी साहित्य और सिनेमा के रिश्ते का इतिहास अधूरा रहेगा।
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