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लैंडस्केप

lainDaskep

नरेंद्र जैन

नरेंद्र जैन

लैंडस्केप

नरेंद्र जैन

और अधिकनरेंद्र जैन

     

     

    नवीन सागर के लिए

    अरसे बाद उल्लेख किया
    गया उसका
    जो अब ढल चुका दुर्लभ प्रजाति में
    स्मृति के अनुकूल एक चेहरा
    उसके लैंडस्केप नज़र में उभरने लगे

    ठीक इसी वक़्त धाराप्रवाह बोल रहा होगा
    वहीं कहीं ज़िक्र चेखव का

    शहर के रास्ते और गली-कूचे
    उसके रंगों से होकर गुज़रते
    छज्जे पर टँगे रंग-बिरंगे वस्त्र
    वृक्ष की डाल से लटकी जामुनी पतंग
    टीले पर फहराता सफ़ेद ध्वज

    चेहरों के बजाय उभरता
    एक विराट क्षेत्रफल
    संयोजन के बजाय
    चीज़ें बिखरीं यहा-वहाँ
    उसके कमरे का वह दरवाज़ा
    जिस पर लगाया गाढ़ा रोगन
    गर्मियों में फूट पड़ता
    वह स्मृतियों में खुलता दरवाज़ा
    रंगों की बौछार
    जहाँ अब भी जारी है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : नरेंद्र जैन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अच्युतानंद मिश्र द्वारा चयनित

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